संगीत का संसार गन्धर्व की स्मृतियों से सदा ही गमकता रहा है। कालजयी साधक की विरासत के आसपास रसिकों की विनम्र उपस्थिति इस विश्वास को लौटा रही है कि स्वाधीनता में ही नया और अनूठा है। वह परम्परा है, रूढ़ि नहीं। पं. कुमार गन्धर्व ने निर्भय होकर नवाचार की राह थामी। रुचि और रंजकता का नया परिवेश तैयार किया। 
गन्धर्व के प्रयोगों की वे शिल्पी रही हैं। मंच पर उनका गान-साहचर्य भी एक ललित अनुभव होता। दिलचस्प यह कि इस पूरे रूपक की पीठिका उनकी बेटी विलक्षण गायिका कलापिनी कोमकली की स्मृतियों में जब सजीव होती है, तो कुमार गन्धर्व के होने का अर्थ खुलता है। संगीत अनुरागी और सामाजिक कार्यकर्ता संदीप नाईक के लिए कुमारजी की तपोभूमि भानुकुल और उनका संगीत कुल सदा ही कौतुहल तथा प्रीति में बिंधा रहा। इसी मोह के चलते कुमारजी, वसन्धुरा, कलापिनी और भुवनेश के बीच उनकी जिज्ञासाएँ संवाद के सूत्र में लयबद्ध होती रहीं। इस बार कुमारजी की बेटी कलापिनी की यादों को उन्होंने कुरेदा तो लड़कपन की जुबानी मासूमियत की एक अलहदा कहानी चहक उठी। यह कहानी एक छतनार वृक्ष की जड़ों में लौटने की कहानी है। संगीत के महानायक के संस्कार, सबक़ और महान स्वीकार की पटकथा है। 







बेटी की स्मृतियों में 'कालजयी' पिता

वार्तालेख - संदीप नाईक



    मैं दुनिया के उन चुनिन्दा सर्वश्रेष्ठ लोगों में से हूँ जिसे दुनिया के श्रेष्ठ अभिभावक मिले। मेरे पिता संगीतकार थे, मेरी माँ बेहतरीन गायिका थी। घर संगीतज्ञों, साहित्यकारों से भरा रहता था। देवास में उस समय कोई होटल नहीं थे। जो भी इधर से गुज़रते या प्रस्तुतियाँ देने आते या सीखने को आते, वे हमारे घर रहते। घर बड़ा है और आज भी लोग होटल के बजाय हमारे इस सुकून वाले परिसर में रहना पसन्द करते हैं जिनसे हमारे संगीत का नाल बँधा है। इस तरह से मैं देखती कि गणेश उत्सव में प्रस्तुतियाँ देने के बाद भी देर रात घर भोजन होता और फिर बाबा के कमरे में गप्प के साथ फिर गाना होता। बाबा और आई कमरे में रियाज़ करते रहते। घण्टों नोट्स लेते और संगत कलाकारों के साथ अभ्यास करते रहते। मैं बहुत छोटी थी और यह सब देखकर मुझे चिढ़ होती कि मेरे माँ-बाप मेरे साथ समय क्यों नहीं देते? जब मल्हार स्मृति मन्दिर में देर रात गा चुके हैं तो फिर अलसुबह तक घर में गाना गाने का क्या औचित्य है? और मुझे लगता की संगीत के ही कारण मैं उपेक्षित हूँ। मुझे सुबह उठकर स्कूल जाना है, पढ़ाई करनी है और दीगर काम करने हैं पर यह सब कोई नहीं सोचता। बस इसी से मुझे संगीत से चिढ़ हो गई और मैंने अपना ध्यान पढ़ने में लगाया। उन्ही दिनों पुस्तकालय से अमर चित्र कथाएँ पढ़ना शुरू की। आई हर शनिवार-रविवार को इन्दौर संगीत की कक्षाएँ लेने जाती थीं तो मेरा उनसे एक ही आग्रह रहता कि बस स्टेण्ड से 'अमर चित्र कथा' ले आएँ। इन चित्र कथाओं से मैंने जाना कि भारत की संस्कृति, विरासत, वैभव, विविधता क्या चीज़ हैं। उन्होंने ज्ञान का झरोखा खोलने में मदद की। उन्हें अच्छा लगा। उन्होंने मुझे सीधे राहुल सांस्कृत्यायन लिखित 'वोल्गा से गंगा' पकड़ा दी, मैंने बहुत धैर्य से पढ़ी और समझा कि एक आदमी कितना वृहद् काम कर सकता है। बाद में मैंने राहुल जी का सम्पूर्ण साहित्य तो पढ़ा ही तोलस्तोय, गोर्की, अन्ना केरेनिना, युद्ध और शान्ति, धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता' जैसी ढेरों किताबें पढ़ डाली।
    मुझे क्रिकेट का बहुत शौक़ था। कान में रेडियो लगाकर अपने कमरे में मैं कमेंट्री सुना करती थी। एक दिन बाबा ने कहा कि तुझे लॉग ऑफ़, स्पिन या गुगली समझता है क्या? यदि नहीं तो इन्हें समझ। मुझे हमारे घर आने वाले हमारे पारिवारिक चिकित्सक डॉक्टर कजवाडकर से मिलवाया जो क्रिकेट के प्रकाण्ड पण्डित और सुनील गावस्कर के मुरीद थे। उन्होंने मुझे सुनील गावस्कर की जीवनी 'सनी डेज़' लाकर दी जिसे पढ़कर मैं रोमांचित हो उठी और क्रिकेट की दुनिया से मेरा प्रेम बढ़ा। इस तरह घर में संगीत से दूर रहकर मैंने अपनी साहित्य और क्रिकेट की दुनिया बना ली थी। स्कूल की पढ़ाई के साथ यह सब समानान्तर चल रहा था। बाबा ने मराठी में महाभारत के आठ-दस खण्ड लाकर दिए। हर खण्ड लगभग तीन सौ चार सौ पृष्ठ के थे। मैंने बहुत बारीक़ी से पढ़े और आख़िरी अध्याय आज तक नहीं पढ़ा। ऐसा कहते हैं कि इसे घर में नहीं पढ़ना चाहिए। अब देखो कब जीवन मौक़ा देता है कि इसे कहीं और पढ़ सकूँ। महाभारत ने मेरी दृष्टि को विस्तार दिया और यह कह सकती हूँ कि महाभारत जैसी विपुल साहित्यक ग्रन्थ संसार में कहीं कभी नहीं लिखी गई होगी। जब महाभारत पढ़ लिया तो इसके साथ जुड़े कर्ण-कुन्ती और तमाम उन चरित्रों को लेकर लिखे गए सभी हिन्दी, मराठी, अँग्रेज़ी की किताबों को पढ़ा जिसमें श्रीकृष्ण थे या कर्ण या कौरव या पाण्डव या भीम या इससे जुदा हुए ययाति या पूरे भक्ति काल के कवि फिर वे तुकाराम हो, ज्ञानदेव, कबीर या मीरा, दादू या रसखान और यह सब मुझे समृद्ध कर रहा था। बाबा खुश थे कि संगीत ना सही पर कुछ तो है जहाँ मेरा मन लग रहा है और मैं सीख रही हूँ।
    किशोरावस्था के दिनों की बात है बाबा और आई मिलकर 'त्रिवेणी' नामक कार्यक्रम की तैयारी कर रहे थे। उठते-बैठते मुझे त्रिवेणी के सारे पद और बन्दिशें याद हो गई। मैंने आई को एक दिन सुनाई तो वे बहुत खुश हुई। आई ने यह बात बाबा को बताई और कहा कि अपनी पिनी को त्रिवेणी कण्ठस्थ हो गई है। बाबा बोले "अरे वाह! मुझे भी सुनाओ।" मैं स्कूल से लौटी ही थी। रसोई में टेबल के पास बाबा बैठे थे और मैं खड़ी थी। वही खड़े होकर मैंने बाबा को त्रिवेणी सुना दी। पहले पद से लेकर आख़िरी में भैरवी तक गाकर सुना दिया। बाबा देर तक देखते रहे। उसके बाद की कहानी ही अलग है। आई फिर मुझे अपने शिष्यों के साथ बिठाने लगी। बाबा के कमरे में लोग आते तो कहती, "जाकर बैठ, सुन और समझ।" मुझे समझ कुछ नहीं आता पर वो बातचीत अद्भुत होती थी। आई शिष्यों के साथ जब अभ्यास कराती तो लगता मैं थोड़ा बेहतर गाती हूँ क्योंकि मेरा सुर लग रहा है, ताल ठीक लग रहे हैं। बन्दिश याद है मुझे, तानपुरा साध लेती हूँ और राग-रागिनियों की समझ बाक़ी से थोड़ी बेहतर है।





फ़िल्मों के गाने सुनने में शौक़ बढ़ा। अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला रेडियो पर कान में लगाकर अपने पढ़ाई के कमरे में सुनती थी। धीरे-धीरे संगीत मेरी नसों में घुसता चला गया, पढ़ाई के साथ मैं संगीत का नियमित अभ्यास करने लगी और फिर मैं इस तरह से संगीत में आई। संगीत के कार्यक्रमों में जाना मुझे उस उम्र में बहुत बोरिंग लगता था पर गणेशोत्सव के कार्यक्रमों में बाबा एक दिन नृत्य का दिन ज़रूर रखते थे जिसमें प्रस्तुति देने बिरजू महाराज आए, दमयन्ती जोशी आई, गोपीकृष्ण जी आए, माधवी मुद्गल के साथ बड़े-बड़े नर्तक आए। इससे कार्यक्रमों में जाने में रुचि जागी। मेरी माँ ने बचपन से हमें यह बता दिया था कि बाबा अपनी विधा में बहुत बड़े हैं और यह जितनी जल्दी समझ लो अच्छा रहेगा। अनचाहे मैं गुनगुनाने लगी थी। माँ और बाबा के साथ सीखने लगी।
    हमारे समय में हमें कुछ मालूम नहीं होता था कि आगे क्या करना है, जैसा कि आज की पीढ़ी बहुत फोकस्ड है कि इंजीनियर बनना है, डॉक्टर बनना है या सिविल सर्विस में जाना है। बचपन में बाबा के कमरे में किशोरी जी, भीमसेन जोशी, जसराज जी, श्रीराम पुजारी जी, अशोक वाजपेयी जी, पु.ल. देशपाण्डे जैसे बड़े लोगों को संगीत, कला व संस्कृति पर बात करते हुए देखा है। समझ में क्या आता था, यह नहीं मालूम, पर जो भी चल रहा है वह बहुत रोचक है यह पक्का था। चौबीसों घण्टे संगीत के संस्कार पड़े थे इसीलिए आज कुछ करने और कहने की हिम्मत होती है। मुझे यह अफ़सोस है कि मैंने बहुत देरी से सीखना शुरू किया। हमें जो भी पूछना होता था वो माँ से पूछते थे क्योंकि बाबा से बहुत छोटे-छोटे प्रश्न नहीं पूछ सकते थे। ऐसे में माँ ने गुरु की और माँ की भूमिका एक साथ निभाई और हमें तैयार किया। मैं, माँ और बाबा के साथ तानपुरा लेकर बैठती थी। उनके साथ यात्रा पर मालूम हुआ कि किस तरह अभ्यास करते हैं, नोट्स बनाते हैं, अपना होम वर्क करके जाते हैं। जो व्यक्ति उम्र के नौवें वर्ष से गा रहा हो वो जीवन के आख़री क्षण तक प्रस्तुति की तैयारी को लेकर बहुत गम्भीर रहा। उन्होंने कोई आडम्बर नहीं पाला। हमेशा सफ़ेद कुर्ते-पाजामें रहे, बाद में मैंने उन्हें सिल्क के रंग-बिरंगे कुर्ते पहनाए और उनके पहनावे में बदलाव किया।
    हर समय एक जैसा नहीं होता। कुमार जी के पहले का समय और कुमार जी के बाद का समय बहुत अलग था। कुमार गन्धर्व आज संगीत के स्वाधीन रचना संसार में साहस और मर्यादा के मानक हैं। कलापिनी की शिराओं में इसी गन्धर्व की विरासत का वास है।










( 'रंग संवाद' में प्रकाशित आलेख) 



















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