कला जीवन में अनुशासन लाती है - सुचित्रा हरमलकर से अपूर्वा बैनर्जी की बातचीत


कला जीवन में अनुशासन लाती है

सुचित्रा हरमलकर



लखनऊ, जयपुर और बनारस की रंगभूमि में उपजे और उन्मेष का बहुरंगी विराट रचते कथक का एक कुनबा हिन्दुस्तान के मध्यांचल में भी वजूद में आया। ज़मीनी बँटवारे को दरकिनार करें तो यह मध्यप्रदेश के दरबारी दौर में पनपा और परवान चढ़ा रायगढ़ कथक घराना कहलाया। नृत्य प्रेमी-कलावन्त महाराजा चक्रधर ने अपनी रियासत में उस समय जिन कुशल नर्तकों को खोजा और गढ़ा उनमें पं. कार्तिकराम और उनके बेटे पं. रामलाल दक्ष कलाकार हुए। पिता-पुत्र के इस युगल ने अपनी इस बहुमूल्य विरासत का मान रखा। योग्य उत्तराधिकारियों की पीढ़ी का निर्माण किया। गुरू-शिष्य परम्परा का एक बिरवा मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक उपवन में जब रोपा गया तो उम्मीद की कोंपलें हरिया उठीं। चक्रधर नृत्य केन्द्र के अहाते उठती घुँघरूओं की आवाज़ों में भविष्य की आहटें थीं। सिद्ध गुरूओं को संस्कारी शिष्य मिले। तालीम, तैयारी और नई तासीर में ढली ऐसी ही नृत्यांगना सुचित्रा ने सबका ध्यान बाँटा। यह अस्सी का दशक था। आज की शिखर नृत्यांगना सुचित्रा हरमलकर तब सुचित्रा डाकवाले थी। अदम्य उर्जा से छलछलाती दैहिक उमंगों में यह तरूणी रायगढ़ का सारा सौन्दर्य समेटती लय-गतियों का वितान रच रही थी। प्रतिभा ने पंख पसारे तो यह उड़ान देश-देशान्तर तक गई। गुरूओं से मिले ज्ञान और सबक सुचित्रा की मौलिकता का आधार बने। यह थाती उनकी शख़्सियत में बोलती है। सुचित्रा को इस बात का फ़क़्र है कि रायगढ़ घराना अन्य लखनऊ, जयपुर और बनारस की अपेक्षा छोटी समय यात्रा के बावजूद आज मुख्य धारा में है। 'रंग संवाद' के लिए इस ख़ास बातचीत में अपूर्वा बैनर्जी के सवालों से गुज़रते हुए वे इसी गौरव-गाथा को सुना रही हैं। 



अपूर्वा बैनर्जी: कथा कहने वाले कथक कहलाए। आज के सन्दर्भ में कथक की भूमिका को आप किस तरह देखती हैं?
सुचित्रा हरमलकर: कथा आज भी कही जाती है पर उसका स्वरूप बदल गया है। कथा कहने के दो तरीक़े होते हैं एक सामान्य तरीक़ा कि कथा कहना और दूसरा उस पात्र, उस चरित्र को जीना अर्थात कथा को धारण करना, उन्हें धारक कहा जाता है। आज यह रूप अधिक प्रचलित है। गत भाव, कवित्त, अभिनय, ठुमरी के माध्यम से हम शिव पार्वती, कृष्ण राधा जैसे चरित्रों को व्यक्त करते हैं। कथक यों तो उत्तर भारत की शास्त्रीय नृत्य शैली है लेकिन आज देशभर में लोकप्रिय है। हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा की वाहक है। ख़ासियत यह भी कि लोकधर्मी होने के कारण आज भी लोग इस नृत्य से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं।

जीवन का बड़ा सफ़र आपने नृत्य और मंच के साथ तय किया, इतने वर्षों बाद पलटकर शुरुआती समय को देखना कैसा लगता है?
- मेरी यात्रा बहुत दिलचस्प और अनूठी रही। ऐसे कई पड़ाव आए जिनके बारे में सोच कर मुझे लगता है कि ईश्वर तय करता है कि इस संसार में किसे, किस तरह की भूमिका निभानी है। माता-पिता शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े थे। इसलिए शुरू से माहौल पढ़ाई का था तो कभी नृत्य या दूसरे शौक़ को लेकर अलग से सोचा नहीं पर स्कूल आते-जाते रास्ते में पड़ते एक संगीत विद्यालय से आती घुँघरूओं की आवाज़ आकर्षित अवश्य करती थी। शौक़ के तौर पर वहाँ सीखने जाने लगी पर कुछ समय बाद छोड़ दिया। 
कक्षा आठवीं में रीवा में ही 'झनकार' नामक संस्था में पिता के कहने पर कथक सीखने लगी और शौक़िया कार्यक्रमों में प्रस्तुति देने लगी। उसी दौरान कथक की कुछ बारीक़ियाँ भी सीखने का मौक़ा मिला। फिर संयोग बना कम आयुवर्ग के विद्यार्थियों के लिए इलाहाबाद में आयोजित एक राष्ट्रीय नृत्य और संगीत प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का। इसका श्रेय जाता है मेरे पहले गुरू एटी बागची जी को। वह प्रतियोगिता आसान नहीं थी, उसमें अप्रचलित तालों पर प्रस्तुति देनी होती थी, पर जब प्रस्तुति दी तो बहुत सराहना और प्रोत्साहन मिला। वहीं पहली बार जयपुर घराने की नृत्यांगना काजल मिश्र का नृत्य देखा, कई कलकत्ते के नामी कलाकार उसका हिस्सा बने थे और मुझे लगा कि मैंने तो अभी कुछ ठीक से जाना ही नहीं है कथक को, इस नृत्य का विस्तार और इसका कौशल तो कहीं आगे है। लम्बा अन्तराल आया। तीन साल बाद चक्रधर कला केन्द्र का स्कॉलरशिप फार्म पिता के कहने पर भरा और कई नामी कलाकारों के बीच अपनी प्रस्तुति दी। यही वह मोड़ था, जहाँ से मैंने कथक को गम्भीरता से लिया। लगभग 50 प्रतियोगियों में से पाँच कलाकारों में मैं प्रथम स्थान पर रही जिसे स्कॉलरशिप और प्रशिक्षण के लिए चुना गया था। यहीं मुझे गुरू कार्तिक रामजी मिले जिनके लिए बागची सर अकसर कहते थे कि उनसे सीखोगी तो नाम कमाओगी। लोग तारीफ़ से झोली भर देंगे। संयोग साकार हुआ। सात साल कार्तिकरामजी का गुरू सानिध्य मिला। 



प्रशिक्षण के बाद आगे एक कलाकार के बतौर सुचित्रा का जन्म कैसे हुआ?
- यह 1984 की बात है, जब दिल्ली में आयोजित शरच्चन्द्रिका उत्सव के तीन दिवसीय आयोजन में पहली प्रस्तुति देने का अवसर मिला। यह मध्य प्रदेश के किसी कलाकार की पहली प्रस्तुति थी। उस आयोजन में युवा नए कलाकार को 15 मिनिट का, उससे वरिष्ठ कलाकार को 20 मिनिट और अधिक वरिष्ठ कलाकार को अपनी प्रस्तुति के लिए 30 मिनिट का समय दिया जाता था। अपने नाम का पत्र आना और सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाना ही मेरे लिए अद्‌भुत क्षण था, फिर नृत्य के लिए पोशाक तैयार करने, छोटे बालों को किसी तरह सँवारने से लेकर प्रस्तुति तक मैं बहुत रोमांचित थी। मंच पर मुझे कभी डर नहीं लगता। मंच पर मैं बिल्कुल अलग नई सुचित्रा होती हूँ। उस प्रस्तुति ने मुझे बहुत लोकप्रियता दिलाई और उत्साहित भी किया। नृत्य विशेषज्ञ सुनील कोठारी जी ने नेशनल हेराल्ड में लिखा कि मध्यप्रदेश अब कथक के लिए तैयार है। फिर उनका यह कहना कि तुम्हारे नृत्य में कार्तिक राम जी दिख रहे हैं, मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी। 
संयोग कुछ ऐसा बना कि श्री राम संेटर से निकल रहे थे तो बिरजू महाराज गुरूजी से बोले, "इस लड़की में कुछ अलग बात है, इसे अच्छे से सिखाइए।" सारंगी वादक लतीफ़ खाँ साहब ने प्रशंसा की। दिल्ली जाकर मैंने महसूस किया कि हम यदि कथक की शैशव अवस्था में हैं तो दिल्ली में कथक प्रौढ़ अवस्था में है। इन्हीं क्षणों ने कलाकार की अहमियत बेहतर तरीक़े से समझाई, जि़म्मेदारी को और गहरा किया। खैरागढ़ विश्वविद्यालय से मैंने एम.ए. किया। यहीं लगभग ढाई वर्ष तक अध्यापन कार्य करते हुए कई प्रस्तुतियाँ भी दी। इस माहौल में सीखा भी बहुत और बतौर कलाकार ख़ुद को परिपक्व भी किया। अपने रियाज़ के साथ-साथ कई युवा कलाकारों को प्रशिक्षण दिया। 

घरानों का अपना इतिहास रहा है। आप रायगढ़ घराने से जुड़ी रहीं। अन्य घरानों से यह घराना किस तरह भिन्न है?
- कोई भी घराना अपनी शैली और परम्परा में रूप धारण करता है। इस घराने के प्रवर्तक राजा चक्रधर सिंह थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने बन्दिशें तबले या पखावज पर नहीं, प्रकृति में जो ध्वनियाँ हैं, उन्हें लेकर निर्मित की। अन्य घरानों से दीगर यहाँ हर बन्दिश का एक नाम है जैसे गजविलास, दलबादल आदि। इस तरह नामकरण किया गया कि एक चित्र उपस्थित हो जाए। इन बन्दिशों में ध्वन्यात्मकता और दृश्यात्मकता का अद्‌भुत मेल है। उनके रहते हुए चार दरबारी नर्तक तैयार हुए- कार्तिक राम जी, कल्याण दास महंत, पं. फित्तू महाराज, बरमनलाल जी। बड़े गुरूजी नहीं रहे, छोटे गुरू जी अब बिलासपुर में निवास करते हैं अब पहले जैसी बात तो नहीं रही, पर अभी भी वहाँ प्रशिक्षण दिया जाता है।
इन्दौर शहर को आप किस तरह महसूस करती हैं, आपके जीवन का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण हिस्सा यहीं बीत रहा है।
- असल में कथक के लिए आगे की पीढ़ी तो मैंने इन्दौर आकर ही तैयार की। खैरागढ़ में अध्यापन कार्य करने के बाद विवाह होकर इन्दौर आई। ससुर और पति ने वैसा ही माहौल दिया, सुविधा दी जो एक कलाकार को चाहिए। यहीं आकर 1991 में मैंने अपने गुरू के नाम से कार्तिक कला केन्द्र की स्थापना की। यही कोशिश आज तक कर रही हूँ कि इस घराने की सुन्दरता और मौलिकता को अपनी शिष्याओं के माध्यम से विस्तार दूँ।

गुरू कार्तिक राम जी को किस तरह याद करती हैं?
- गुरूजी के नृत्य में उनका उपज अंग मज़बूत पक्ष था। उनका कथक कथा पर आधारित नहीं होता था। उसमें शुद्ध कला और अभिनय पक्ष रहता था। उन्होंने अन्दाज़ और शैली पर अधिक कार्य किया जैसे छेड़ का अन्दाज़, कलई का अलग-अलग प्रयोग। उनकी प्रस्तुति में मुक्त भाव रहता था, वह बे-लौस नृत्य करते थे। फिर हमेशा देख्या, परख्या और सीख्या पर विश्वास करते थे। उनकी दैहिक उपस्थिति नहीं है, पर मेरी कला के हर रूप में उनकी उपस्थिति है।
एक लम्बे समय से आप प्रशिक्षण दे रही हैं और कई जगह प्रस्तुति दे चुकी हैं। आपने कथक में किस तरह नए प्रयोग किए?
- कथक नृत्य शैली एकल प्रयोगधर्मी कला है। अपने नृत्य प्रशिक्षण के दौरान मैंने किसी भी समूह प्रस्तुति में हिस्सा नहीं लिया था लेकिन भोपाल में रहते हुए बड़े कलाकारों की कोरियोग्राफ़ी और उनकी सामूहिक प्रस्तुतियों ने मुझे आकर्षित किया। सन् 1995 में मैंने शिव स्तुति से कोरियोग्राफ़ी शुरू की जिसें 6 लड़कियों ने महाराष्ट्र साहित्य सभा के स्वर्ण जयन्ती अवसर पर प्रस्तुत किया था, सहयाद्री चैनल पर इसका प्रसारण भी हुआ फिर 2003 में नारी शक्ति पर आधारित नृत्य नाटिका अनुकृति का निर्देशन करने का पहला अवसर आया। इसकी संकल्पना पूर्व लोक सभा अध्यक्ष विदुषी सुमित्रा महाजन ने की थी। संगीत, अभिनय, निर्देशन, वेशभूषा हर पक्ष को देखते हुए इसे तैयार करना चुनौतीपूर्ण था पर इसकी सफलता ने मुझे आत्मविश्वास दिया। मैं आगे भी इस तरह प्रयोग करती रही। 



इस तरह की नृत्य संरचना के लिए आपकी रचनात्मक  प्रक्रिया क्या रहती है?
- मेरी कोशिश रहती है कि दर्शक और अपनी कला के बीच ऐसा संतुलन बना सकूँ कि उसकी सम्प्रेषणीयता भी बनी रहे और कला का मूल आस्वाद भी दर्शकों तक पहुँचे। यह निर्भर करता है कि आप किन के मध्य अपनी प्रस्तुति दे रहे हैं। कई बार, कई कलाकार हमारे दर्शक होते हैं, कई बार आम जनता के बीच प्रस्तुति देनी होती है।  नृत्यांगना उमा शर्मा ने एक बार हमारी प्रस्तुति देखकर कहा कि रायगढ़ घराने की ख़ूबियाँ और उसकी सुन्दरता जयपुर और लखनऊ घराने की तरह ही जन-जन तक पहुँचनी चाहिए। इस तरह हमारी कोशिश भी यही है कि प्रशिक्षण द्वारा, तमाम आयोजनों के माध्यम से इस घराने को लोग जानें। आज नई पीढ़ी में पूर्वा पंडित, योगिता गडीकर, आशिमा कोतवाल, निवेदिता पंडया, शाश्वती वालावलकर, फाल्गुनी जोशी, प्रीति राजगुरू रायगढ़ घराने की नृत्य शैली में काफ़ी अच्छा काम कर रही हैं।

गुरू शिष्य परम्परा को आज आप किस तरह देखती हैं?
- इस परम्परा की कोई बराबरी नहीं। कोई विकल्प नहीं। आज संस्थागत शिक्षण प्रणाली लोकप्रिय है। विद्यार्थी तैयार हो रहे हैं, पाठ्यक्रम, डिग्री और नाम के साथ रोज़गार भी जुड़ गया है और इससे कला जन-जन तक पहुँची है। उसका दायरा बढ़ा, लेकिन यदि एक कलाकार के तौर पर विकसित होना है, आगे तक जाना है, नृत्य की बारीक़ियाँ सीखना है, तो गुरू-शिष्य परम्परा से ही सम्भव है। यहीं शिष्य सिर्फ़ कला नहीं, गुरू का सान्निध्य पाता है, उनकी रचना प्रक्रिया से, उनकी सोच से, उनके नज़रिए से परिचित होता है। कला के साथ उसे बरतने का अनुभव इसी सान्निध्य में मिल सकता है। एक ठुमरी, दो भाव या कुछ ताल सीखकर आप सही नर्तक नहीं बन सकते और न कला के साथ न्याय कर सकते हैं।

तकनीक के दौर में शास्त्रीय नृत्य की प्रासंगिकता को किस तरह देखती हैं?
- कथक की बल्कि शास्त्रीय नृत्य की प्रासंगिकता तो पूरी तरह है और रहेगी। ये नृत्य तो हमारी संस्कृति और परम्परा के परिचायक हैं। कथक में समय के साथ कई नए प्रयोग हुए, यह समसामयिक है और परम्परा को लेकर आगे बढ़ती शैली है। कथक में जैसा खुलापन है, ग्रहणशीलता है, उसके लिए समय की  कोई भी चुनौती बड़ी नहीं है। 

लोक और शास्त्र का नृत्य में किस तरह संयोग देखती हैं?
- दोनों नृत्य अलग हैं पर आपस में लयबद्ध हैं। हमारे गुरूजी के नृत्य में छत्तीसगढ़ की लोक कला के तत्त्व दिखते थे। उनके हाथ फेंकने का, हाव-भाव का जो उन्मुक्त अन्दाज़ था, वह लोकनृत्य की ही देन है। लोकतत्त्व कला को जीवन्त रखता है, इसलिए उसका समावेश तो होना चाहिए। मैंने ख़ुद कथक नृत्य और मालवी लोक नृत्य को लेकर फ्यूजन तैयार किया है।

आपके लिए पुरस्कार की क्या अहमियत है?
- कोई भी पुरस्कार या सम्मान कलाकार के समर्पण, उसकी प्रतिभा और सतत रियाज़ का फल होता है। आगे और बेहतर करने के लिए प्रेरित तो करता है पर साथ ही कलाकार को सन्तुष्टि और पहचान भी मिलती है। उसके शिष्य प्रेरित होते हैं। उनका अपने गुरू के प्रति सम्मान बढ़ता है, कहीं न कहीं गम्भीरता भी आती है। शिखर सम्मान मुझे मिला, तो ख़ुशी तो थी ही, वह समय याद आया कि कभी हम फूल माला की ट्रे लेकर मंच पर खड़े होते थे और सोचते थे कि कुछ ऐसा करें कि कोई हमारे लिए भी इस तरह माला लाए। 

कला और जीवन के बीच किस तरह का अन्तरसम्बन्ध आप महसूस करती हैं?
- कला और जीवन मेरे लिए तो एक दूसरे के पर्याय हैं। कला से मनुष्य संवेदनशील बनता है, अनुशासित होता है, उसका धैर्य विकसित होता है, वह कला से जुड़कर अपनी पहचान पाता है। मनुष्य को किसी न किसी कला को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए। 

- apoorva.banerjee@dalycollege.org 

रंग संवाद (अप्रैल-जून 2025) में प्रकाशित



































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