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 संगीत का संसार गन्धर्व की स्मृतियों से सदा ही गमकता रहा है। कालजयी साधक की विरासत के आसपास रसिकों की विनम्र उपस्थिति इस विश्वास को लौटा रही है कि स्वाधीनता में ही नया और अनूठा है। वह परम्परा है, रूढ़ि नहीं। पं. कुमार गन्धर्व ने निर्भय होकर नवाचार की राह थामी। रुचि और रंजकता का नया परिवेश तैयार किया।  गन्धर्व के प्रयोगों की वे शिल्पी रही हैं। मंच पर उनका गान-साहचर्य भी एक ललित अनुभव होता। दिलचस्प यह कि इस पूरे रूपक की पीठिका उनकी बेटी विलक्षण गायिका कलापिनी कोमकली की स्मृतियों में जब सजीव होती है, तो कुमार गन्धर्व के होने का अर्थ खुलता है। संगीत अनुरागी और सामाजिक कार्यकर्ता संदीप नाईक के लिए कुमारजी की तपोभूमि भानुकुल और उनका संगीत कुल सदा ही कौतुहल तथा प्रीति में बिंधा रहा। इसी मोह के चलते कुमारजी, वसन्धुरा, कलापिनी और भुवनेश के बीच उनकी जिज्ञासाएँ संवाद के सूत्र में लयबद्ध होती रहीं। इस बार कुमारजी की बेटी कलापिनी की यादों को उन्होंने कुरेदा तो लड़कपन की जुबानी मासूमियत की एक अलहदा कहानी चहक उठी। यह कहानी एक छतनार वृक्ष की जड़ों में लौटने की कहानी है। संगीत के महानायक के सं...

ख़ुद की तलाश का ज़रिया रहा अभिनय : पापिया दासगुप्ता

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  ख़ुद की तलाश का ज़रिया रहा अभिनय पापिया दासगुप्ता रंगमंच पर अपनी रौबदार आमद लिए लगभग आधी सदी तक सक्रिय रहने वाली अभिनेत्री पापिया दासगुप्ता ने जीवन के रंगमहल को अलविदा कह दिया। बंगाल उनकी सरज़मीं   रही और भोपाल कर्मभूमि। अभिनय उनका जुनून था , आत्मा की पुकार था। रंगमंच से लेकर रेडियो तक जाने कितनी कहानियाँ और किरदार उनकी अदायगी में ढलते रहे। कुछ दिन पहले ख़ासे इसरार के बाद उन्होंने लम्बी बातचीत की हामी भरी। गुजि़श्ता सुनहरा दौर याद किया और आज के सूरते - हाल पर भी अपनी राय ज़ाहिर की। पापियाजी के रंग योगदान का सादर सुमिरन करते हुए साझा है उनसे हुई विनय उपाध्याय की यह वार्ता।   कैसा लगता है अतीत से गुफ़्तुगू करते हुए। वो दौर ... ये दौर ...?? मेरे लिये जीवन के सभी पड़ाव महत्वपूर्ण हैं। मैं किसी भी कालखण्ड को बेहतर या कमतर नहीं मानती। जीवन में सभी काल का महत्वपूर्ण , पर अलग - अलग योगदान रहता है। मेरी रंगयात्रा की गति धीमी जरूर हुई ...