कला: जीवन का उत्सव- विनय उपाध्याय
कला: जीवन का उत्सव विनय उपाध्याय " हुस्न बेकार है , अगर कोई सराहने वाला न हो"। यह शायराना जुमला एक दफ़ा शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र ने एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए बड़े ही कलात्मक अदा में इस्तेमाल किया था। शास्त्रीय संगीत की गूढ़-गंभीर प्रस्तुति , श्रोताओं की रुचि अरुचि और उसके असर-बेअसर पर उनके अपने तर्क थे। कहना था कि राग से अगर बैराग हो जाए और श्रोता बीच महफ़िल से उठकर जाने लगे तो गायक को गाना बंद कर देना चाहिए। काशी के बुजुर्ग गान मनीषी के इस वक्तव्य ने संगीत ही नहीं , सृजन की बहुतेरी विधाओं के आसपास फैले आस्वाद के धरातल को नई नजर से देखने का कौतूहल जगाया। उस मर्म को छूने का छोर दिया जिसके सहारे रचना के बुनियादी उसूलों के पास जाया जा सकता है। आकाशवाणी भोपाल ने ' कला आस्वाद ' के विविध आयामों पर एक परिसंवाद रखा। इस लेखक के साथ ही कवि प्रेमशंकर शुक्ल और शिल्पकार शंपा शाह भी उसके प्रतिभागी थे। साझा वार्ता में सृजन के आस्वाद का वह फ़लसफ़ा खुला जहाँ संवेदना की अहमियत कई नए अर्थ लिए सामने आती है। क्या रहस्य है कि एक रचनाकार के चित्त में अनुभूति की ...