ख़ुद की तलाश का ज़रिया रहा अभिनय : पापिया दासगुप्ता

 

ख़ुद की तलाश का ज़रिया रहा अभिनय

पापिया दासगुप्ता



रंगमंच पर अपनी रौबदार आमद लिए लगभग आधी सदी तक सक्रिय रहने वाली अभिनेत्री पापिया दासगुप्ता ने जीवन के रंगमहल को अलविदा कह दिया। बंगाल उनकी सरज़मीं रही और भोपाल कर्मभूमि। अभिनय उनका जुनून था, आत्मा की पुकार था। रंगमंच से लेकर रेडियो तक जाने कितनी कहानियाँ और किरदार उनकी अदायगी में ढलते रहे। कुछ दिन पहले ख़ासे इसरार के बाद उन्होंने लम्बी बातचीत की हामी भरी। गुजि़श्ता सुनहरा दौर याद किया और आज के सूरते-हाल पर भी अपनी राय ज़ाहिर की। पापियाजी के रंग योगदान का सादर सुमिरन करते हुए साझा है उनसे हुई विनय उपाध्याय की यह वार्ता।

 

कैसा लगता है अतीत से गुफ़्तुगू करते हुए। वो दौर... ये दौर...??

मेरे लिये जीवन के सभी पड़ाव महत्वपूर्ण हैं। मैं किसी भी कालखण्ड को बेहतर या कमतर नहीं मानती। जीवन में सभी काल का महत्वपूर्ण, पर अलग-अलग योगदान रहता है। मेरी रंगयात्रा की गति धीमी जरूर हुई पर किसी रंगशाला में प्रवेश करते समय वही जोश और आनन्द का अनुभव रहा। मंच के इस पार हूँ या उस पार, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब रंगकर्मियों के साथ बैठती हूँ तो अनायास ही पुरानी बातें छिड़ जाती हैं। मजेदार यादें, और ग़लतियों को याद कर ठहाके लगाते हैं। नये युवा रंगकर्मियों के साथ अपने अनुभव बाँटने में भी मज्जा आता है। नाट्य विद्यालय के नौसीखिये प्रशिक्षार्थी, गुजरे जमाने के प्रामटिंग के और डायलॉग भूलने के क्रिस्से सुनकर खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं। लाईव म्यूज़िक की गलतियों के किस्से भी कम मजेदार नहीं हैं। सभी यादें बचपन की मधुर यादों की तरह हैं, जिन्हें सुनाते या याद करते समय मैं फिर से उन्हीं पुराने अनुभवों से गुजरती हूँ। वो सुनहरा दौर मेरी यादों में अमिट है।

कला के प्रति नैसर्गिक लगाव और संस्कार आपके भीतर हैं लेकिन क्या बांग्ला पृष्ठभूमि आपके कलाकार को गढ़ने में महत्वपूर्ण रही है?

रंगमंच के संस्कार मुझे विरासत में मिले। मैं इसी परिवेश में पली बढ़ी। होश संभालते साथ मैंने अपने पंचेन्द्रियों से इनको ग्रहण किया था। घर में साहित्य, संगीत, नाटक और अन्यान्य विविध कलाओं का माहौल था। हमारा परिवार प्रवासी बंगाली परिवार रहा, पर थे तो हम जन्मजात बंगाली ही। सो बंगाली कला प्रेम से अछूते नहीं थे। बांग्ला साहित्य का जबरदस्त प्रभाव, साथ ही रंगमंच से लगाव, ऊपर से घर वालों का प्रोत्साहन, और चाहिये क्या था? मेरी दादी लेखिका थीं। माता, पिता, चाचा, मौसियाँ सभी नाटक और नृत्य संगीत के क्षेत्र में पारंगत थे। मैं तीसरी पीढ़ी की कलाकार रही। हमारी चौथी पीढ़ी में बेटा भास्कर, पठन-पाठन, लेखन और बेटी शिल्पी सिनेमा शिल्प से जुड़े हैं। आशा है आगे भी यह सिलसिला चलता रहेगा। प्रसंगतः उल्लेखनीय है, मेरी बहू संगीता लेखिका है और पोती, छोटी सी दीया बैले कलाकार है लंदन में।

आप इलाहाबाद से भोपाल आई और भोपाल के रंग परिवेश से एक अंतरंग रिश्ता बना। उस दौरान भोपाल के रंगमंच की क्या दशा और दिशा थी?

1966 में शादी के बाद भोपाल आई। शुरू-शुरू में बहुत ख़ालीपन महसूस करती थी। साल भर, स्कूल कॉलेज, यूनिवर्सिटी में प्रोग्राम करते हुये व्यस्त रहती थी। यहाँ, नये माहौल में कुछ भी करने का मौक़ा नहीं मिल रहा था। नाटक भी बहुत कम होते थे। देखने तक का मौका नहीं मिलता था। मेरे रुझान को देखते हुये मुझे पहला ब्रेक, मेरे बड़े भाई समान, बेनूदा (श्री बेनू गांगुली) ने दिया। मैंने एक बांग्ला नाटक में अभिनय किया। और मुझे जिन लोगों से प्रोत्साहन मिला, उनमें प्रमुख थे तरुण भादुड़ी और इंदिरा भादुड़ी, शशांक मुखर्जी और प्रज्ञा मुखर्जी।

मेरा भोपाल का पहला अभिनय, पता नहीं कैसे, तत्कालीन मंत्री तथा कवि विठ्ठल भाई पटेल ने देखा था और उन्होंने उस समय के जाने माने नाट्य निर्देशक, भाऊ साहब खिरवड़कर से उसका जिक्र किया। मैं भाऊ साहब के 'रंगायन' से जुड़ी। उस समय भोपाल में गिने चुने नाट्यकर्मी ही थे, जिनमें अधिकतर महाराष्ट्रीयन कलाकार थे। अधिकतर मराठी नाटकों के हिन्दी अनुवाद ही मंचित होते थे। संवाद अदायगी में मराठी का पुट होता था। अभिनय के क्षेत्र में अति अभिनय के प्रति झुकाव था। शायद इसीलिये उन दिनों मेरा स्वाभाविक शैली का अभिनय लोगों ने पसन्द किया था।

कला और रंगमंच को लेकर बंगाल जहाँ बहुत समृद्ध है वहीं, हिन्दी रंगमंच ने एक लंबा सफर तय कर खुद को खड़ा किया है। आपने दोनों से नातेदारी बनाई। अपने अनुभव साझा करें...

भोपाल में आकर मेरी रंगयात्रा बांग्ला नाटकों से शुरू हुई। दो या तीन सालों के बाद मैंने हिन्दी नाटकों में काम करना शुरू किया। पर यहाँ मैंने देखा कि बांग्ला नाट्यकर्मियों के मुक़ाबले हिन्दी नाटकों के कलाकार ज्यादा अनुशासित हैं। समय की पाबन्दी, संवादों को याद करना या निर्देशक की बातों को मानने और उसे क्रियान्वित करने में वे ज्यादा तत्पर रहते हैं। मुझे काम के प्रति यह समर्पण भाव बहुत अच्छा लगा, और धीरे-धीरे मैंने बांग्ला नाटकों में काम करना कम कर दिया।

जिस वक्त आप रंगमंच पर सक्रिय हुई उस समय महिला रंगकर्मियों के प्रति समाज और थिएटर की निगाह कैसी थी?

उन दिनों भोपाल में महिला रंगकर्मियों का टोटा था। लड़कियाँ इस क्षेत्र में आने में झिझकती थीं। मामा, चाचा, दादाओं के पहचान के बिना लोग घर की लड़कियों को नाटक में काम करने नहीं देते थे। अगर राजी हो भी गये, तो ले जाने और छोड़ने की शर्त के साथ। अंतरंग दृश्य तो दूर, हाथ तक पकड़ने की सख्त मनाही थी। निर्देशक भी इन दृश्यों से बचते बचाते नाटक की परिकल्पना करते थे। डायलॉग भले ही बुलवा लो, पर नो एक्शन प्लीज़!

आपको एक महिला रंगकर्मी होने के नाते अपने सपनों, संघों और नई चुनौतियों से किस तरह जूझना पड़ा?

नहीं, मुझे कोई खास उलझनों का सामना नहीं करना पड़ा। कई महिला कलाकारों से समस्याओं के बारे में सुना करती थी। पर मुझे कभी कोई बुरा अनुभव नहीं हुआ। हमारे रंगायन में हम सब एक परिवार की तरह थे। कभी कोई किसी से दुर्व्यवहार नहीं करता था। सभी साथी कलाकार, समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। भाऊ साहब हर किसी को दल में शामिल नहीं करते थे। काफ़ी सोच-समझकर ही लेते थे।

दर्शकों से मुझे हमेशा सम्मान और प्रोत्साहन मिला। उस जमाने में सिर्फ गणमान्य दर्शक ही नाटक देखने आते थे। साधारण जन में नाटक का प्रचलन नहीं था। शायद यह पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव था कि थियेटर ईलीट वर्ग और सिनेमा आम जनता के मनोरंजन का साधन था। बाद में एक बार हमने उर्दू अकादमी की तरफ़ से 'अमीर खुसरो' नाटक का मंचन किया। सुना था, भोपाल के सिटी इलाके में रहने वाली जनता जिन्होंने कभी नाटक नहीं देखा था, उनके लिये वह नाटक खेला गया।

जिन निर्देशकों के साथ बहुतायत में आपने काम किया उनमें मनोहर आशी का नाम प्रमुख से लिया जाता है। इस रचनात्मक आपसदारी का कृपया खुलासा करें। इसके अलावा उन निर्देशकों के अनुभव भी साझा करें जिनकी गहरी छापें आपके जेहन पर पड़ीं?

शुरुआती दिनों में मैं केवल भाऊ साहब के नाटकों में काम करती थी। पर बाद में मैंने लगभग सभी शीर्षस्थ निर्देशकों के साथ काम किया। उनमें कारन्त जी, बंसी कौल, एम.के. रैना, बृजमोहन शाह और प्रशान्त खिरवड़कर का नाम प्रमुख है। पीटर ब्रुक के वर्कशॉप में भी मैंने प्रशिक्षण पाया। सभी से बहुत कुछ सीखा। पर कारन्त जी को मैं विशेष श्रद्धा करती थी। उनसे मैंने थियेटर की बहुत सारी बारीकियाँ सीखी थीं।

आप भूगोल की प्राध्यापक रही हैं। क्या इस विषय की आपकी कला में सहभागिता रही?

भूगोल पढ़कर, मैंने देश और विदेश को जाना, पहचाना। विभिन्न संस्कृतियों को जाना। लोगों में प्रचलित परम्पराओं और आचार आचरण के भौगोलिक कारणों को जाना। यह भूगोल के प्रति रुचि का ही फल था कि मुझमें भ्रमण की इच्छा जागृत हुई। देश विदेश में भ्रमण कर, विभिन्न लोगों और उनके आचार आचरणों को जाना। इस तरह समझ का प्रसार होने पर विभिन्न चरित्रों में मैं अपने को सहजता से ढाल पाती हूँ।

आपने कहानियों को लेकर भी काम किया है। एक नैरेटिव शैली है और दूसरी नाट्य शैली। दोनों में क्या अंतर है? किसे बेहतर मानती हैं?

दोनों ही शैलियों का अपना-अपना महत्व है। नैरेटिव शैली में सारा बोझ अपने कन्धे पर ढोना पड़ता है। नाट्य शैली में यह भार साझा हो जाता है।

एकल प्रस्तुतियों की ओर आपका कैसा और कब रुझान हुआ? अब तक कितनी प्रस्तुतियाँ दीं? क्या अब भी किसी नयी एकल अभिनय प्रस्तुति का मन है?

एकल प्रस्तुति तैयार करने का मन बहुत पहले से था। पर मौका नहीं मिला था। कारगिल युद्ध के बाद, युद्ध की विभीषिका और त्रासदी के कई नमूनों से मेरा साक्षात्कार हुआ। उसके बाद मैंने अपनी पहली एकल प्रस्तुति 'एक लापता सैनिक की माँ' के जरिये युद्ध सम्बन्धी कई प्रश्नों के जबाव ढूँढने की कोशिश की। इस एकल नाटक की कई प्रस्तुतियाँ विभिन्न शहरों और प्रतिष्ठानों में कीं। मुझे यू.जी.सी. के तरफ से एक प्रोजेक्ट भी मिला जिसके तहत कई गर्ल्स कॉलेजों में भी मैंने प्रस्तुति दी। अजमेर के सोफ़िया कॉलेज में एक ही शाम दो प्रस्तुतियाँ दीं। एक छात्राओं के लिये, और आधे घन्टे बाद ही वहाँ चल रहे एक सम्मेलन में आये हुये ईसाई पादरियों और ननों के लिये प्रस्तुति दी। इस नाटक की कुल तीस प्रस्तुतियाँ हुई। मैंने महसूस किया कि अभिनय किसी भी कलाकार की आत्मतलाश का एक रास्ता है। मेरे लिये भी ख़ुद को जानने और अपनी शख़्सियत को तराशने का सबसे कारगर माध्यम रहा।

आपने रेडियो रूपकों में भी हिस्सा लिया है। सुना है कि विवेकानंद पर केन्द्रित एक रेडियो शो बना रही हैं। रेडियो रूपक और रंगमंच में जो तकनीकी फ़र्क है क्या वह अभिव्यक्ति के स्तर पर विषय वस्तु के प्रभाव में भी फ़र्क ला देता है?

मैंने रेडियो में 40-42 सालों तक काम किया। मंचीय नाटक और रेडियो नाटकों में काफ़ी फ़र्क है। मंच पर पूरे शरीर, भाव, और वचन से संवाद अदायगी होती है। पर रेडियो में सिर्फ आवाज के सहारे, चरित्र और भावों को व्यक्त करना पड़ता है। स्वरों का उतार चढ़ाव और साँसों का खेल है रेडियो नाटक। आजकल मैं स्वराज संस्थान के एक प्रोजेक्ट- 'युग प्रवर्तक विवेकानंद' का काम कर रही हूँ। उसकी स्क्रिप्ट तैयार की है मैंने। शोधपरक काम है। इसे तैयार करते वक्त मैंने भी बहुत कुछ जाना है इन अद्भुत ज्ञानी महापुरुष के बारे में।

रेडियो एक श्रव्य माध्यम मात्र है, उसमें नाटकीयता और विभिन्न जानकारियाँ देना आसान नहीं। मंच पर दर्शक देखकर और सुनकर चीज़ों को समझते हैं। पर मंच का दायरा भी सीमित होता है। कुछ ही पलों में अलग अलग स्थानों में दर्शकों को ले जाना संभव नहीं होता। जो रेडियो में आवाज संगीत और इफेक्टों के जरिये संभव हो पाता है। दोनों माध्यमों के स्क्रिप्ट में भारी अन्तर होता है। दोनों में अलग-अलग तरीके से भावों को अभिव्यक्त करना पड़ता है। मंच पर जहाँ एक नजर भर डालकर काफ़ी कुछ व्यक्त कर सकते हैं, रेडियो में उसी भाव को शब्दों के सहारे बताना पड़ता है। खैर, दोनों ही माध्यमों में अभिनय के सहारे चरित्रों को उकेरना पड़ता है।

गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य पर आपने ख़ूब काम किया। क्या अनुभव है आपका?

रबीन्द्रनाथ ठाकुर तो एक सागर हैं। कितना ही उनका साहित्य पढ़ लें नाटक गाने कर लें, या गा लें, नृत्य नाटिकाओं का प्रस्तुतिकरण कर लें, फिर भी लगता है उस सागर में डूबना तो दूर, पाँव की उंगलियाँ भी भिगो नहीं पाई हूं। हर महापुरुष के जयन्ती वर्ष में कार्यक्रमों की बाढ़ जाती है। रवीन्द्रनाथ की रचनाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ उन्हें समझकर और ज्यादातर उन्हें बिना समझे, अपना-अपना इन्टरप्रिटेशन प्रस्तुत करते हैं। टैगोर को बहुत गहराई से समझा जाना चाहिये। गीत और नृत्य का भी उनका अपना स्टाईल था, जो काफ़ी चिन्तन मनन के बाद उन्होंने रचा था। बहुत ही परिष्कृत और सूक्ष्म हास-परिहास है, जिन्हें उसी रूप में प्रस्तुत करने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

आजकल टैगोर की रचनाओं के साथ कई प्रयोग हो रहे हैं। जैसे उनके पात्रों को मयूरभंज या पुरुलिया के छाऊ शैली में प्रस्तुत करना या उनकी कहानियों को तोड़-मरोड़कर मंचन करना आदि। कुछ प्रस्तुतियों को आज के माहौल के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है। कुछ प्रयोग तो ठीक लगते हैं पर ज्यादातर कैरीकेचर सा प्रतीत होता है। मैं पूर्णतः परम्परावादी नहीं हूँ, मुझे भी नये प्रयोग अच्छे लगते हैं। पर अति से मुझे परहेज है।

भारत भवन रंगमंडल का जमींदोज होना और राज्य नाट्य विद्यालय का उदित होना... आपकी प्रतिक्रिया?

भारत भवन रंगमंडल का विलय, हिन्दी नाटकों के लिये सुनामी का कहर जैसा था और नाट्य विद्यालय का उदित होना, उस खण्डहर पर नई इमारत के बनने जैसा है।

आप इतने लंबे समय तक रंगमंच पर काम करती रही हैं आपके मन में कभी निर्देशक बनने की अकुलाहट नहीं हुई?

अभिनय के साथ साथ निर्देशन का काम भी मैं करती रही। चेखव के दो नाटकों का हिन्दी रुपान्तरण कर मैंने उनका मंचन किया।

घर, परिवार नौकरी, और एक उम्र के साथ जुड़ी हुई अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने की फ़ितरत। इन सबके बीच में हाड़-तोड़ मेहनत माँगने वाले थियेटर के प्रति आपकी गहरी आसक्ति पूरी की। क्या अब संतुष्ट हैं?

घर, परिवार, नौकरी तथा रंगमंच, सभी मेरे लिये समान महत्वपूर्ण रहा। रंगमंच में जितना समय देना चाहिये था दिया। इसके लिये मैं अपने पति रवि दासगुप्ता की आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे इस जुनून को समझा और हमेशा मुझे सहयोग दिया। बच्चों ने भी बड़े होने पर मेरा साथ दिया। मुझे सन्तोष है कि मेरे बच्चे समाज में प्रतिष्ठित हैं। नौकरी भी मैंने पूरी ईमानदारी के साथ की। मेरे विद्यार्थी जब क़ामयाब होकर, मेरा आशीर्वाद लेने आते हैं तो मेरी आँखें भर आती हैं। वे ही मेरी पूंजी हैं, मेरी कमाई हैं।

आपने बच्चों के लिए भी काम किया है। माना ये जाता है कि बच्चों के लिए रंगकर्म को लेकर बड़े रंगकर्मी सक्रिय नहीं रहे जैसे हबीब तनवीर, बंसी कौल, कारंत। और आज के रंगकर्मी प्रायः बच्चों के लिए आगे नहीं आते। गर्मी की छुट्टियों में अंशकालीन कार्यशालाओं की होड़ मची रहती है। पर नियमित रूप से कार्य नहीं हो रहे इस बारे में क्या राय है?

मैंने बच्चों के साथ कई काम किये हैं। पर अधिकतर बांग्ला में। नाटक, नृत्य नाटिका, संगीत, नृत्य सभी विधाओं में काम किया है। उनमें प्रमुख हैं- अलीबाबा, चन्डालिका, चित्रांगदा, रुपक नाटक "हजबरल" आदि। मैंने देखा कि आजकल बच्चे, पढ़ाई में इतने व्यस्त रहते हैं कि इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिये इनके पास समय ही नहीं है। उनके माता पिता भी समय निकालकर उन्हें रिहर्सल के लिये नहीं ला पाते हैं। बच्चे बिचारे तो पढ़ाई, ट्यूशन कोचिंग, कम्प्यूटर के बोझ तले दबे पड़े हैं। कब आयेंगे नाटक, नाच या गानों की रिहर्सल में?

आजकल बहुत जल्दी निर्देशक बन जाने की फ़ितरत कलाकारों पर हावी है। ज्यादातर रंगकर्मी परियोजना केन्द्रित रंगकर्म के लिये आगे आये हैं। आप इस उत्साह को किस तरह से देखती हैं?

आजकल के भोगवादी समाज में, हर काम को पैसे से जोड़कर देखा जाता है। नाटक ही क्यों अछूता रहे? और फिर आजकल नाटक करना बहुत महंगा हो गया है। हॉल, लाईट, पोशाक, पब्लिसिटी सभी में पैसा लगता है। इसलिये शायद परियोजनाओं की तलाश रहती है। चलो इसी तरह अगर रंगकर्म का प्रवाह जारी रहे तो क्या बुराई है? काम अगर स्तरीय हो तो कोई बात नहीं।

भोपाल इस समय तीन या चार पीढ़ी के रंगकर्मियों की छावनी है। लेकिन इन पीढ़ियों के बीच एक सार्थक सृजनात्मक संवाद की कमी महसूस की जाती है। सब बँटे बँटे से... क्या आपके दौर में भी ऐसा ही था?

भोपाल में पहले के मुकाबले, रंगकर्मियों की एक बहुत बड़ी फ़ौज है। पर जैसा कि आपने कहा- पुरानी और नई पीढ़ी के कलाकारों में तादात्म्य नहीं है। आज के नाटकों में पुराने कलाकार कम ही काम करते दिखते हैं शायद देखने भी नहीं जाते। दोनों पीढ़ियों को अपना-अपना मौन भंग कर आगे आना चाहिये। इससे सम्पूर्ण नाट्य जगत का भला होगा। हमारे समय में हम जब मंच पर होते थे तो कई पीढ़ी, मंच के पीछे का काम सम्भालते थे। यानि किसी किसी तरह हम सब जुड़े थे।

किसी भी कला को सच्ची आलोचना की दरकार भी होती है। एक सम्यक विश्लेषण जो नाटक के पहलुओं पर ज़रूरी विमर्श हो क्या यह पूर्ति ठीक से हमारे समय में हो पायी है?

पहले, हर नाटक की प्रस्तुति के बाद, शहर के बुद्धिजीवी मिलकर बैठते थे। आलोचनाएँ होती थीं। सवाल जवाब होते थे। बाहर के नाट्य दलों की प्रस्तुतियों के बाद अगले दिन सुबह रवीन्द्र भवन के ऊपरी हॉल में, या और कहीं इस प्रकार का जमावड़ा होना, आम बात थी। बाल के खाल निकाले जाते थे। उन बहसों और चर्चाओं से हमने बहुत कुछ सीखा, जाना। निर्देशक भी सुझावों पर अमल करते थे। आजकल तो यह पक्ष देखने को ही नहीं मिलता। सभी निरासक्त हो गये हैं। किसी को किसी दूसरे की प्रस्तुति से जैसे कोई सरोकार ही नहीं रह गया।

नाटक विचार और मनोरंजन से भरपूर कला है। यह सामाजिक जागरण की एक लोकतांत्रिक विधा है। आज इसकी सार्थकता कितनी और कैसी है?

नाटकों के सामाजिक महत्व पर प्रश्न ही नहीं उठता। नाटक तो समाज का ही दर्पण है। सभी नाटकों में, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, कोई कोई सामाजिक महत्व का सन्देश जरूर होता है। अगर ईमानदारी से नाटकों में समाज की विसंगतियों को प्रस्तुत किया जाये तो दर्शक अवश्य ही उद्वेलित होते हैं। हमें तो कई नाटकों में यह अनुभव हुआ है। 'व्यक्तिगत' नामक नाटक के लगभग हर प्रदर्शन के बाद कई महिला दर्शकों ने मुझसे कहा कि उन्होंने नाटक में उनके अपने जीवन की परछाई देखी है। और अब वे उन परेशानियों का मुकाबला डटकर करेंगी।

नाटकों के साथ समाज के हर वर्ग का जुड़ना जरूरी है, जो वास्तव में हो नहीं पाता। टी.वी. और सस्ते सिनेमा का मोह त्यागना सहज नहीं। आम जनता के जीवन में आजकल इतनी समस्याएँ हैं कि वह शायद और किसी गम्भीर विचारणीय विषयों से दूर रहना चाहता है। हर कोई सामाजिक समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं है। सब अलग-थलग रहकर, अपने व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने में ही व्यस्त हैं।

मैं तो लोक संस्कृति को बहुत ही समृद्ध मानती हूँ। अपने जीवन में, जहाँ भी मौक़ा मिलता है, उन्हें अपनाने में नहीं हिचकती। चाहे वह गृहसज्जा हो या पहनावा, लोककला की झलक मुझे अच्छी लगती है। लोकनृत्य और लोकगीतों से बेहद लगाव है। लोकशैली के कई नाटकों में भागीदारी की है। असल में हमारे देश की आबोहवा में लोक संस्कृति ही जँचती है। हमारे यहाँ इतनी गर्मी और धूल है कि कार्पेट कहाँ बिछायें? हाँ समय के साथ हमारे रहन सहन में कई पाश्चात्य प्रभाव घुल मिल गये हैं। पर उन चीजों को ही अपनाना चाहिये जिनसे जीवन आसान बन जाये। अंधा अनुकरण हमेशा अच्छा नहीं होगा। सभी पहलुओं में संतुलन बनाकर चलना जरूरी है। लोक कलाओं को अपनाने पर अपनी एक अलग पहचान बनती है।

 

संवाद में सहभागी एकता गोस्वामी


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