धरती के छन्द गाती आवाज़ : मालिनी अवस्थी - विनय उपाध्याय


धरती के छन्द गाती आवाज़ : मालिनी अवस्थी

विनय उपाध्याय 




समय के पन्नों पर लिखी एक किताब है जीवन। सुनी-अनसुनी कितनी ही आवाज़ें इसमें पैबस्त हैं। पुरखों की स्मृतियाँ यहाँ गीत-गाथाओं में गमकती हैं। मालिनी अवस्थी धरती के उन्हीं छन्दों को गाती-गुनगुनाती वो आवाज़ है, जहाँ इस धरोहर की सुरीली धड़कनें सुनी जा सकती हैं। यहाँ शब्द की परम्परा मनुष्यता को गाती है। संस्कृति के ये सुहाने रंग सौंधी महक लिए वादियों में बिखर जाते हैं। हिन्दुस्तान का यह स्त्री कण्ठ बोले गए शब्द की सांस्कृतिक यात्रा पर निकला एक ऐसी बटोही है जो गाते-गुनगुनाते ख़ुद एक किताब में बदल जाता है। उनके कण्ठ से फूटा, हृदय से निकला और अधरों से छलकता लोक राग इसी सच की गवाही बनता है। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘विश्वरंग’ महोत्सव के दौरान जब पुस्तकों का एक बड़ा क़ाफ़िला चार राज्यों में निकला तो मालिनी इस अनुष्ठान के समापन समारोह में पूरी आस्था से पेश आयीं।

अवध की मिट्टी-पानी और हवाओं की कोख से निकलकर जीवन के आँसुओं और मुस्कानों को ज़ुबान देने वाले सैकड़ों गीत जब मालिनी के गले का गहना बन जाते हैं तो आशंकाओं का अँधेरा काफ़ूर हो जाता है। विरासत अपने भविष्य पर मुस्कुरा उठती है कि उसने अपना सच्चा उत्तराधिकारी हासिल कर लिया है। मालिनी अवस्थी एक ऐसी ही सुरीली आश्वस्ति के साथ धरती के छन्द गुनगुना रही हैं। कभी किसी सभागार की चार-दीवारी में, कभी आसमान तले भीड़ भरे जलसे के मंच पर, कभी दूरदर्शन के किसी चैनल पर, तो कभी अपनों के बीच किसी छोटी महफ़िल में। आवाज़ और अन्दाज़ के निरालेपन के बीच मालिनी की पेशकश यक़ीनन सुनने वालों पर कश्मिाई असर करती है। बोली की मिठास, मन के अहसास, धुनों का सरल-तरल मिज़ाज जब लय-ताल के सुन्दर ताने-बाने के बीच मालिनी के अन्तरंग में उतरता है तो वह हमारी तहज़ीब की आवाज़ बन जाती है। आवाज़ का यह असर अब सरहदों के फ़ासले पूरता देश-दुनिया में फैल रहा है। शोहरत और ईनाम अब मालिनी की कलाकार शख़्सियत के साथ हो लिए हैं। पद्मश्री की उपाधि और अनेक ईनाम तथा अलंकरणों ने इस गायिका के हुनर और कोशिशों के साथ अवध के लोक संगीत की थाती का मान बढ़ाया है। मंच और मंच परे मालिनी के साथ इस दोहरी संगत में उनके सांस्कृतिक मानस को, उनकी मानवीय सम्वेदना को अनेक बार पढ़ा गुना। कला के लोक से लेकर राजनीती रंगभूमि तक मालिनी की तीसरी आँख वो सब कुछ निहारती रही है जो इस समय को नए असर में ढाल रही है।




लखनऊ में जन्मी मालिनी का संगीत के प्रति लड़कपन से ही रुझान रहा। इसी आग्रह के चलते उन्होंने भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय (लखनऊ) से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। गायिकी में निखार और व्यावहारिक पहलुओं के मार्गदर्शन के लिए मूर्धन्य गायिका गिरिजा देवी की शागिर्द बनीं। तालीम और अभ्यास की पूँजी लेकर मालिनी ने जब सार्वजनिक सभाओं में दस्तक दी तो उनकी मीठी-मदिर और ठेठ मिट्टी की सौंधी गन्ध से महकती गायिकी ने हज़ारों श्रोताओं को उनका मुरीद बना लिया। भारत के अनेक लोक उत्सवों और कुम्भ-मेलों के आमंत्रण मिले। एनडीटीवी इमेजिन रियलिटी शो ‘जुनून’ के ज़रिए मालिनी जी की गायिकी का ठेठ पारम्परिक अन्दाज़ सरहद पार के मुल्कों को भी रास आया। 

मालिनी का मानना है कि हमें पुरखों से मिली इस अमृत धारा को प्रदूषित होने से बचाना है। लोक गीतों का दरिया बहता रहे। इसकी हिफ़ाज़त के फर्ज़ को अदा करने का काम हम कलाकारों का है। हमें इस अनमोल सौग़ात पर गर्व करना चाहिए। वे कहती हैं कि श्रुति और स्मृति की परम्परा के साथ ये गीत सदियों का रास्ता पार करते पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम तक पहुँचे हैं। ये गीत हमारी संस्कृति के जागरूक पहरेदार हैं। ज़िन्दगी की भूली-बिसरी तस्वीरों, यादों-बातों, क़िस्सों-कहानियों और संस्कारों की रौशनी में जगमगाते हमारे सच्चे और खरे अनुभवों का दस्तावेज़ हैं। शायद ही कोई बिरादरी हो, जहाँ लोक गीतों का चलन न हो क्योंकि इनके बिना मन का आँगन सूना है। 

हमारे यहाँ ज्ञान परम्परा श्रुति और स्मृति की रही है। जो किताब से आज हम पा रहे हैं वो हमारी पुरखिनों ने, हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभव से बरसों पहले पा लिया, संजो लिया। लोक आख्यान हों, लोक चित्र हों, लोक गीत हों, लोक कथाएँ हों, इनके माध्यम से ही नैतिक मूल्यों और विश्वासों को पाया। संग्रहित भी किया। इनको स्मृति और आचरण में जिया भी। किताबें तो बहुत बाद में आयीं। 




“छापक पेड़ छिउलिया” हिरनी का अमर सोहर है। इस गीत में पूरी कथा है। ढाक के पेड़ के नीचे हिरनी और हिरन हैं। वह हिरन को उदास देखकर पूछती है- ‘‘क्या तुम्हारा चारा सूख गया? क्या जल सूख गया? क्या बात है?’’ हिरनी कहती है- “मेरे हिरन, आज राजा के यहाँ छठी है राम की, और तुमको मार डाला जाएगा। उफ्फ!! कितना मर्म स्पर्शी। संवेदना भीग उठती है। यह साहित्य नहीं तो फिर क्या है? आगे देखिए- दूसरी कड़ी में यही आता है कि हिरनी कौसल्या के पास जाकर कहती है- “मेरा हिरन तो चला गया है, मुझे अब उसकी खाल दे दो। शेष जीवन मैं इसी की खाल देखकर काट लूँगी”। अब कौशल्या कहती है- “अरे जाओ रे हिरनी, आपन घरे जाऊ हो”। हिरनी अब तुम अपने घर जाओ। खाल की तो मैं खंजनी बनवाऊँगी। इस खंजनी से जो ध्वनि आयेगी उससे मेरा राम कितना मुदित होगा। जाओ, जाओ अपने घर जाओ। इस गीत का अन्त यहाँ पर है “जब जब बाजेला अनहद”। जब-जब उसकी अनहद की ध्वनि निकलती है, हिरनी भर-भर आँसू, अकुला जाती है उस ध्वनि को सुनकर। 

आप सोचिये, ये शिशु के जन्म पर गाया जाने वाला सोहर है। आपके मन में सहज एक भाव उठता है कि इसमें कहीं पर जन्म का वर्णन नहीं है। जन्म हो रहा है लेकिन उस जन्म की आड़ में इतना बड़ा अन्याय किसी जीव के संग हो रहा है। हमें सिखाने-बताने की पूर्वजों की मंशा इस गीत में उभर रही है कि ऐसा अनाचार एक बार हुआ था। ध्यान रहे, तुम्हारे साथ न हो। तुम अपना उत्सव मनाओ लेकिन किसी और का अमंगल करके न मनाना। तो लोक साहित्य जीवन के आदर्श मूल्यों का सहज बखान है। 

लोक की ज्ञान परम्परा में गीतों का या लोक साहित्य की किसी भी विधा का महत्व अनमोल है। हर लोक गीत एक किताब है। हम सिद्ध वचनों के देशवासी हैं। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय है।





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