आभा विराट की (रबीन्द्रनाथ के चित्र) - यामिनी राय, अनुवाद: उत्पल बैनर्जी
आभा विराट की
रबीन्द्रनाथ खाँटी यूरोपियन विषयवस्तु लेकर चित्र
बनाया करते हैं। इसलिए हमें उनके चित्रों को समझने के लिए सबसे पहले आधुनिक
यूरोपीय चित्रकला के वास्तविक उद्देश्य और समस्याओं को समझना होगा।
एक प्रसिद्ध यूरोपीय मूर्तिकार ने एक बार अपनी
समसामयिक मूर्तिकला पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर इन मूर्तियों को पहाड़ से
नीचे फेंक दें तो हो सकता है टूट-फूट कर इनमें थोड़ी बहुत जीवंतता आ जाए। यानी
यूरोप की शिल्पकला के विशुद्ध सच की अभिव्यक्ति उस आदिम युग में ही हो गई थी। तब
शिल्प पर सभ्यता का आवरण चढाने की कोशिश नहीं की गई थी, तब फ़ोटोग्राफ़िक फ़िडेलिटी की ओर लोगों का रुझान भी नहीं
बढ़ा था। विषयवस्तु के सामान्य लक्षण जिस आवेग को जगाते हैं, उसे पूरी तरह उघाड़ कर व्यक्त करना ही उद्देश्य था।
परिणामस्वरूप जब किसी गुफ़ा के प्रागैतिहासिक चित्र में किसी घोड़े को देखता हूँ
तो मुझे समझ में आता है वह घोड़ा ही है,
लेकिन
घोड़े या इस इस घोड़े के साथ मिलान करके देखने लायक़ त्रुटिहीन वर्णन उसमें नहीं
है। यानी घोड़े का केवल मूल स्वरूप है। फिर सभ्यता जितनी आगे बढ़ती गई लोगों का
रुझान रियलिज्म की ओर बढ़ता गया। मनुष्य को अपने नग्न शरीर को लेकर कुंठा हुई तो
उसने कपड़े और गहनों का आविष्कार किया और इससे रोज ही कृत्रिमता का बोझ बढ़ता चला
गया। कलाकारों को भी ठीक इसी तरह ख़ालिस भावावेगों से कुंठा होने लगी तो अपने
निर्माण को त्रुटिहीन करने की कोशिश, पॉलिश करने की कोशिश की
ओर ही वे ध्यान देने लगे। पॉलिश की जाने लगी लेकिन रचना के प्राण प्रायः दब ही गए।
गठन और गढ़न खो गया। सभ्यता की विडंबना की वजह से कला हाँफने लगी। इसलिए आज के
कलाकारों ने ही इस रियलिज्म के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया है। 'पॉलिश करना छोड़ो,
जीवंतता
की फ़िक्र करो', यह हुई उनकी बात।
तो फिर क्या प्रागैतिहासिक चित्रों और आज के शिल्प
में कोई फ़र्क़ नहीं है? ज़रूर है, कारण कि यह है इसका
इतिहास, इसके उद्देश्य में भ्रांति भले
ही रही हो, लेकिन यह पूरी तरह अर्थहीन नहीं
है। इसकी वजह यह है कि एक तरह से इसका एक बहुत बड़ा शिक्षामूलक मूल्य भी है।
प्रागैतिहासिक चित्र अवचेतना के स्तर पर थे;
उस समय के
शिल्पियों को जिस सत्य का आभास हुआ था वह नितांत ही आकस्मिक था। पहाड़ से लुढ़क कर
किसी मूर्ति को यदि जीवंतता मिल जाए तो वह भी आकस्मिक ही होगा। इस अवचेतन और
आकस्मिक सत्य को चेतनाके स्तर पर लाना ही आधुनिक कलाकार का उद्देश्य है, और इसे साकार करने में शिल्प के इतिहास का धारावाहिक अनुभव होना
लगभग अनिवार्य हो जाता है। यानी जितने दिनों से कला रियलिज्म के भ्रांत मोह में
भटक रही है, उतने दिनों में भटकते रहने के
मामले में बहुत सारे अनिवार्य अनुभव संचित हुए हैं; जैसे कि चित्रकारी के रंग और सामंजस्य वाला मामला। एकमात्र इसी अनुभव के दम पर
ही प्रागैतिहासिक कला के उद्देश्य को अवचेतन के स्तर पर लाया जा सकता है। इसलिए हम
देखते हैं कि आज यूरोप में जो लोग प्रागैतिहासिक चित्रकारी की ओर ध्यान दे रहे हैं, उनमें से लगभग सभी ने पहले-पहल रियलिस्टिक विषयवस्तु को दखल
करने के लिए कितनी मेहनत की थी; जबकि दिलचस्प बात यह है
कि इनका उद्देश्य इसी रियलिस्टिक चित्रकारी को ही तोड़ना था। पिकासो, मर्डिस इन सभी का यही उद्देश्य था, और होता क्यों न?
जो क़ानून
को तोड़ना चाहता है उसे पहले क़ानून के बारे में पुख्ता जानकार होना ही पड़ता है।
रबीन्द्रनाथ के चित्रों के विषय में एक ज़बरदस्त चीज
हुई है। उन्हें कला के इतिहास के मध्यवर्ती स्तरों के संबंध में किसी तरह का अनुभव
नहीं था। ऐसे मामलों में पतन अनिवार्य ही है,
लेकिन
सबसे बड़ा विस्मय यह है कि वैसा हुआ नहीं। उनके श्रेष्ठ चित्रों को देखकर हम सोच
ही नहीं सकते कि उन्होंने इस क्षेत्र में अभी- अभी क़दम रखा है। उनकी इस
अनुभवहीनता के छिप जाने की एकमात्र व्याख्या मुझे उनकी कल्पना की असामान्य छन्दोमय
शक्ति में दिखाई देती है। फिर चाहे वह रेखा की बात हो या फिर रंग की बात हो, सब कुछ उन्होंने इसी कल्पनाशक्ति से ही हासिल किया है; उनके यहाँ अनभिज्ञता-जनित कमी ढूँढना एक विडम्बना ही होगी।
लेकिन कल्पना की प्रबलता हर समय एक जैसी तथा सजग नहीं रहती, और दुर्बलता का मौक़ा देखकर कभी-कभी शायद उनकी अनभिज्ञता ने
सिर भी उठाया है। जैसे ‘असम्बद्ध' सिरीज के कुछ चित्रों
में सब कुछ एक समान रूप से चित्रित करने के बाद नाक या आँख के समय ब्रश चलाते हुए
वे साधारण रियलिस्टिक स्ट्रोक दे बैठे। हालाँकि किसी कलाकार की चर्चा करते हुए
उनकी श्रेष्ठ रचना को लेकर ही बात की जानी चाहिए, और रबीन्द्रनाथ के श्रेष्ठ चित्रों में दमदार कल्पना की चौकसी में अनभिज्ञता
पास फटक ही नहीं पाई है।
इसके अलावा रियलिज्म की यह जो छुअन है उससे क्या
आधुनिक यूरोपियन कला पूरी तरह बचकर निकल पाई है? मुझे तो लगता है कि आज तक भी वह ऐसा नहीं कर पाई है। हम पिकासो को ही लें।
कितना तोड़ा-मरोड़ा है उन्होंने; कितने जी-जान से वे
डाइमेन्शन के साथ जूझ रहे हैं। लेकिन उनमें रियलिज्म की छुअन लग ही रही है। एक बार
देगस अपने से आधुनिक लोगों की एक चित्र प्रदर्शनी देखने गए। वहाँ उन्होंने कहा था-
"मुझे इनमें कुछ भी नयापन तो दिखाई नहीं दे रहा। मैंने तो चाहा कि मैं एक
पूरा, साबुत प्याले का चित्र बनाऊँ और
ये लोग तोड़-फोड़ कर साबुत प्याला बना रहे हैं। तो फिर नयापन कहाँ है?" यह बात काफ़ी हद तक सच है। सच मतलब, उसकी रियलिस्टिक चित्रकला और अतिआधुनिक यूरोपीय चित्रकला के
नज्जरिये में कोई फ़र्क नहीं है। मुझे लगता है कि चाहे वह चीन हो, जापान हो, समूची दुनिया में
कलाकारों का नज़रिया एक ही है, व्यतिक्रम केवल भारतीय
कला में है। रियलिज्म की छुअन से इस तरह कोई और नहीं बच सका है। पुराण का एक
भावचित्र लीजिए जटायु के साथ यथार्थ के पक्षी का कोई संबंध नहीं है, इसके जन्म का इतिहास भी अनोखा है, वहाँ पर भी रियलिज्म की छुअन नहीं लगी है। लेकिन क्या जटायु
को आप जरा भी नहीं पहचान पाते हैं? निश्चित रूप से पहचान
पाते हैं। लेकिन कल्पनालोक का पक्षी है,
उसमें
रियलिज्म की छुअन जरा भी नहीं है। मुझे लगता है जिस दिन आधुनिक चित्रकार अपनी कला-साधना
के विभिन्न स्तरों के अनुभवों का उपयोग कर पौराणिक जगत की निश्चयता और स्वच्छंदता
को चित्रित कर सकेगा, उसी दिन आधुनिक यूरोपीय
कला का आदर्श परिपूर्ण हो सकेगा। मेरा विश्वास है कि आज चित्रकला इसी तरह के
पौराणिक जगत के निर्माण की दिशा में अग्रसर है। रबीन्द्रनाथ के चित्रों के प्रति
मेरे मन में श्रद्धा उनकी ताक़त की वजह से है, छन्द की वजह से उनमें विराट रूप बोध का जो विराट आभास मिलता है, उसकी वजह से। आजकल मुझे आपत्ति के स्वर सुनाई देते हैं कि
इन चित्रों में एनॉटॉमी का अभाव है। लेकिन मुझे लगता है कि आजकल के चित्रों में
एनॉटॉमी का बोध अगर सचमुच कहीं हैं तो वह केवल इन्हीं चित्रों में है। कारण कि
चित्रों के लिए एनॉटॉमी की जरूरत असल में है ही कितनी ? यह शास्त्र कलाकार को शरीर के विषय में केवल जानकारी देगा, इससे ज्यादा वह और क्या देगा? शरीर के लिए हड्डियों का मुख्य उद्देश्य होता है शरीर को गिरने से रोकना, उसको खड़ा रखना, सतेज और मजबूत बनाए
रखना। हम जिस चित्रकला की चर्चा कर रहे हैं क्या उसमें यह सतेज होने का भाव सबसे
अधिक नहीं है? रबीन्द्रनाथ के द्वारा बनाए
चित्रों में जब मनुष्य को देखता हूँ तो मुझे लगता है कि वह यूँ ही नहीं गिर पड़ेगा, लगता नहीं है कि वह हवा के झोंकों से हिल रहा है। मुझे
साफ़-साफ़ उस आदमी का वजन महसूस होता है,
सतेज वह
सिर उठाए खड़ा है। रबीन्द्रनाथ के चित्र जो शक्तिशाली बन पड़े हैं, वे इन्हीं हड्डियों की वजह से ही है, छन्द के गठन की वजह से ही हैं।
मान लीजिए दो चित्रकार विशुद्ध कल्पना के सहारे एक
लड़की का चित्र बनाना चाहते हैं, अर्थात दोनों ही देखे
हुए व्यक्ति का चित्र नहीं बनाना चाहते। एक चित्रकार उस अदेखे को नितांत घरेलू
अंदाज में बना रहा है, वहाँ कल्पना का प्रसार
नहीं है और दूसरा चित्रकार लड़की का चित्र बना रहा है, हालाँकि वह भी बिना देखे ही बना रहा है लेकिन वह उसे देखने
की सीमारेखा के भीतर लाने की कोशिश ही नहीं कर रहा। वहाँ कल्पना का उन्मुक्त
प्रसार साफ़-साफ़ दिखाई देता है, वृहत् के दर्शन होते
हैं। इसे मैं थोड़ा समझाकर कहता हूँ। पोर्ट्रेट को देखकर बनाया जाता है, वैज्ञानिक पोर्ट्रेट को देखकर बता सकता है कि मॉडल चित्रकार
से कितने फुट दूर, कितने इंच नीचे बैठा था, उजाला किस ओर से आ रहा था वगैरह-वगैरह। मैं जब देख-देख कर
किसी व्यक्ति का चित्र बनाता हूँ तब जब तक उसका चेहरा बनाता हूँ तब तक केवल उसका
चेहरा ही देखता हूँ, और कुछ नहीं देखता, और जब शरीर का निचला हिस्सा बना रहा होता हूँ तो फिर उस समय
चेहरे की ओर नहीं देखता, केवल निचला हिस्सा
देखता हूँ। एक व्यक्ति दस फुट दूर खड़ा होता है तो उसे किसी और ढंग से देखता हूँ, अगर वह सौ फुट दूर हो तो वह ढंग कुछ और होता है, लेकिन वही व्यक्ति जब नज़र से ओझल हो जाता है, तब भी क्या मैं उसे
नहीं देखता? मैं तब भी तो उसे
देखता हूँ। उसे संपूर्णता में देखता हूँ, उसकी उन आँखों से अदेखे चित्र को बनाना ही भारतीय चित्रकला की विशेषता है।
रबीन्द्रनाथ के चित्रों में यही विशेषता उभर आई है। रबीन्द्रनाथ आज के व्यक्ति हैं, इसलिए उनमें पौराणिक जगत की कोई खास स्थिरता या
निश्चयता नहीं है। इसी वजह से उनके चित्रों में यह विशेषता उनकी व्यक्तिगत कल्पना
की लीला में ही अभिव्यक्त होती है।
रबीन्द्रनाथ के चित्रों को लेकर मेरी उनसे एक बार चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा
था- "यहाँ मेरे पास आर्ट स्कूल से पढ़कर प्राप्त की हुई विद्या तो है नहीं, मेरे चित्र संभवतः पूरे नहीं बन पाते।" ग्यारह
साल स्कूल में पढ़ने के बाद भी कई बार लड़के मूर्ख ही रहते हैं। दूसरी और जो कभी
स्कूल के पास भी नहीं फटके, ऐसे लड़कों के मुँह से ज्ञान की बातें सुनता हूँ। चित्रों के मामले में भी ऐसा
ही हुआ है।







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