हर लोक गीत एक किताब है - लोक गायिका मालिनी अवस्थी से विनय उपाध्याय की वार्ता

विश्व पुस्तक दिवस 


हर लोक गीत एक किताब है

लोक गायिका मालिनी अवस्थी से विनय उपाध्याय की वार्ता




समय के पन्नों पर लिखी एक किताब है जीवन। सुनी-अनसुनी कितनी ही आवाज़ें इसमें पैबस्त है। पुरखों की स्मृतियाँ यहाँ गीत-गाथाओं में गमकती हैं। काग़ज़ की पोथियाँ तो नहीं, पर मन की किताब ज़रूर इन पूर्वजों के पास रही जहाँ जीवन के हर जटिल सवाल का समाधान और सबक था। विश्व पुस्तक दिवस पर उन चलते-फिरते किताब-घरों की याद हो आयी है जिसे लोक ने आज भी अनमोल धरोहर की तरह अपनी आत्मा में अँजोर रखा है। मालिनी अवस्थी धरती के उन्हीं छन्दों को गाती-गुनगुनाती वो आवाज़ है, जहाँ इस धरोहर की सुरीली धड़कनें सुनी जा सकती हैं। यहाँ शब्द की परम्परा मनुष्यता को गाती है। संस्कृति के ये सुहाने रंग सौंधी महक लिए वादियों में बिखर जाते है। मालिनी का मानना है कि हर लोक गीत एक किताब है। वे बोले गए शब्द की सांस्कृतिक यात्रा पर निकली एक ऐसी बटोही हैं जो गाते-गुनगुनाते ख़ुद एक किताब में बदल जाती हैं। ‘विश्वरंग पुस्तक यात्रा‘ के उत्सव में उनके कंठ से फूटा, हृदय से निकला और अधरों से छलकता लोक राग इसी सच की गवाही बना। इस अवसर पर हुई उनसे एक छोटी सी ‘पुस्तक वार्ता’।

विनय उपाध्यायः पुस्तक की अहमियत को तो मालिनीजी नकारा ही नहीं जा सकता। इधर जीवन ने कुछ ऐसी करवट ली है कि किताबें तो हैं, पर उन्हें पढ़ने वाले सिमट रहे हैं। ‘पुस्तक यात्रा’ ने एक नई उम्मीद जगाई है। आप इस अभियान का एक हिस्सा बनीं, स्वागत है।

मालिनी अवस्थी : हमने जिस वक्त होश संभाला, तब एक ऐसे परिवेश में हमको जीवन का बोध हुआ है जहाँ पुस्तकें हमारे जीवन का बहुत अहम हिस्सा रही हैं और आज तक हैं। एक बार जिसको किताबों की आदत पड़ जाए तो वह आदत कभी जाती नहीं। लेकिन दुर्भाग्यवश आज हम ऐसे वक्त में जी रहे हैं जब इन्टरनेट का बोलबाला है। कागज़ पर जो अक्षर हैं उनको आँखों से लेकर दिल में उतार लेने की बजाय अब पाम (हथेली) पर, स्क्रीन पर देखने-पढ़ने की आदत हो गयी है। फिर भी शुक्र है कि हिन्दी पढ़ी जा रही है। अक्षर पढ़े जा रहे हैं। कोई भी ज़रिया हो लेकिन अच्छा है कि कम से कम लोग पढ़ें तो। इस दृष्टि मुझे लगता है कि एक सार्थक और अभूतपूर्व अभियान है विश्वरंग पुस्तक यात्रा।

आप बता रहे थे कि यह काफिला कारागार तक भी पहुँचा और बंदियों ने वहाँ इसका स्वागत किया। पुस्तक यात्रा को आप वृद्धाश्रम तक लेकर गये हैं। मुझे लगता है इस तरह कभी किसी ने सोचा नहीं होगा। यह अनोखी पहल है।

 

सच है कि बीहड़ है टेक्नोलॉजी का इन दिनों, लेकिन अगर आज भी सक्षम अगुवाई की जाए तो लोग अच्छे प्रयासों में आपके साथ खड़े होते हैं। विशेषकर छोटे शहर-क़स्बों और गाँवों में पुस्तकों का क़ाफ़िला लोगों से अटा रहा। पुस्तक यात्रा की परिकल्पना निजी शैक्षणिक संस्थान रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय और उसके सहयोगी संस्थानों ने चार राज्यों में की। अभूतपूर्व उत्साह देखने मिला। बहरहाल, किताबों से आपकी सोहबत कब हुई? उनसे जुड़ी कुछ यादें साझा करें।

- मुझे लगता है, हर भारतीय परिवार में एक समय किताबों को पढ़ने का माहौल हमेशा से रहा। हम भी इसी परिवेश में बड़े हुए। हमारे ताऊ जी थे। ताऊ जी की बेटियाँ हमसे उम्र में दस बरस बड़ी थीं। उनके हाथों में हमने हमेशा श्रेष्ठ साहित्य देखा। शायद साहित्यिक किताबें पढ़ने की वो उम्र नहीं थी मेरी पर उस उम्र में हमने सारे प्रमुख साहित्यकारों को पढ़ा। जब मेरी, माँ ने मुझे किताबों के साथ देखा तो वे खुश हुई। मुझे याद आता है कि पहली किताब मैंने उस समय जो पढ़ी वो बंगला के कथाकार की थीं। रबीन्द्रनाथ टैगोर और शरद बाबू का साहित्य पढ़ा। छोटी-छोटी कहानियाँ थीं। हिन्द पॉकेट बुक ने उन्हें छापा था। पचास, साठ, सत्तर पृष्ठों की कहानियाँ हो जाती थी। वे अनुवाद होते थे हिन्दी में, क्योंकि मूलतः  साहित्य बांग्ला में था। फिर जो प्रेम जागा तो बहुत सारा पढ़ डाला। इस क्रम में धर्मवीर भारती जी की ‘गुनाहों का देवता’ और फिर प्रेमचंद के उपन्यास। तो पढ़ने का व्यसन सा हो गया। मेरी माँ एमए हिन्दी में थी। मुझे आज भी याद है कि उन्होंने देखा कि मैं खरीद कर पढ़ने लगी हूँ, बहनों के संग कथाकारों को जानने लगी हूँ तो बहुत ख़ुश हुई। कुछ लेखकों के बारे में उन्होंने बताया। वो हमारे सिलेबस में थे, तो एक अलग कौतूहल और सम्मान लेखकों के प्रति मन में रहा। तो वहाँ से लेकर अज्ञेय और फिर निर्मल वर्मा, मालती जोशी, सूर्यबाला, शिवानी, चित्रा मुद्गल सबको पढ़ा। ये सत्तर-अस्सी का दशक था। तो पढ़ने का चाव और संस्कार लगातार बना रहा।


 

आपके पूरे व्यक्तित्व में साहित्यिक संस्कार झलकता भी है। आपके होंठों से हिन्दी का जो सुरीला वैभव झरता है उसका प्रांजल पवित्र प्रवाह मन के भीतर तक बहा चला आता है। आप तो लोकगायिका हैं। शब्द संस्कृति की ही संवाहक हैं। लोक साहित्य से याद आया कि ज्ञान की दो परम्पराएँ भारत में रही हैं- एक वाचिक परंपरा और दूसरी लिखित परम्परा। और क्या ही अद्भुत बात है कि शब्द को हमारे देश में ब्रह्म माना गया है। सिख समुदाय तो ग्रन्थ की ही पूजा करता है। ‘गुरुग्रंथ साहिब’ की, यानी पुस्तक ही उनका इष्ट है। शब्द को ही ईश्वर और इबादत माना जाता है।

- बिलकुल यह अद्भुत बात है हमारे यहाँ विनय जी। ये आप भी जानते हैं और हमारे दर्शक श्रोता भी जानते होंगे कि किताबों से एक तो आपकी चीज़ों को समझने, देखने की समझ विकसित होती है। अनुभव आपका समृद्ध होता है। एक अक्षर पढ़ कर उस चित्र को समझने की कल्पना आपके सामने साकार होती है। वो एक बहुत अद्भुत देन है पुस्तकों की। कमाल देखिए कि कोई भी लोक गीत आप उठाएँ ऐसा लगता है कि एक लोक गीत पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। दस पंक्तियों का लोक गीत जिसको शायद कहीं डॉक्यूमेंट न किया गया हो वो हमारे पुरखों की स्मृति में रचा-बसा रहा और श्रुति के सहारे आगे की पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहा। जनजातीय समुदाय के गीत हों, हमारा घरेलू संगीत हो, संस्कार गीत हों, शिशु के जन्म पर गाया जाने वाला सोहर हो, हर गीत कोई कहानी ही कहता है। यदि कथा को पढ़ने की दृष्टि है तो आप लोक गीत को वास्तव में कथा ही समझेंगे। लोक गीत एक किताब ही है।

कृपया किसी गीत का उदाहरण दीजिए जिसमें कथा-आख्यान को समझा जा सकता है।

- “छापक पेड़ छिउलिया” हिरनी का अमर सोहर है। इस गीत में पूरी कथा है। ढाक के पेड़ के नीचे हिरनी और हिरन हैं। वह हिरन को उदास देखकर पूछती है- ‘‘क्या तुम्हारा चारा सूख गया? क्या जल सूख गया? क्या बात है?’’ हिरनी कहती है- “मेरे हिरन, आज राजा के यहाँ छठी है राम की, और तुमको मार डाला जाएगा। उफ्फ!! कितना मर्म स्पर्शी। संवेदना भीग उठती है। यह साहित्य नहीं तो फिर क्या है? आगे देखिए- दूसरी कड़ी में यही आता है कि हिरनी कौसल्या के पास जाकर कहती है- “मेरा हिरन तो चला गया है, मुझे अब उसकी खाल दे दो। शेष जीवन मैं इसी की खाल देखकर काट लूँगी”। अब कौशल्या कहती है- “अरे जाओ रे हिरनी, आपन घरे जाऊ हो”। हिरनी अब तुम अपने घर जाओ। खाल की तो मैं खंजनी बनवाऊँगी। इस खंजनी से जो ध्वनि आयेगी उससे मेरा राम कितना मुदित होगा। जाओ, जाओ अपने घर जाओ। इस गीत का अंत यहाँ पर है “जब जब बाजेला अनहद”। जब-जब उसकी अनहद की ध्वनि निकलती है, हिरनी भर-भर आँसू, अकुला जाती है उस ध्वनि को सुनकर।

आप सोचिये, ये शिशु के जन्म पर गाया जाने वाला सोहर है। आपके मन में सहज एक भाव उठता है कि इसमें कहीं पर जन्म का वर्णन नहीं है। जन्म हो रहा है लेकिन उस जन्म की आड़ में इतना बड़ा अन्याय किसी जीव के संग हो रहा है। हमें सिखाने-बताने की पूर्वजों की मंशा इस गीत में उभर रही है कि ऐसा अनाचार एक बार हुआ था। ध्यान रहे, तुम्हारे साथ न हो। तुम अपना उत्सव मनाओ लेकिन किसी और का अमंगल करके न मानना। ... तो लोक साहित्य जीवन के आदर्श मूल्यों का सहज बखान है।


 

अद्भुत! अप्रतिम!! देखिये कि विरासत कैसे आगे बढ़ती हुई उतराधिकार तक पहुँचीं। आप जैसी गायिकाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है कि यदि किताबों के पास न जाया सके तो कम से कम ऐसे चलते-फिरते लोक के विश्वविद्यालय पास तो जाया ही जा सकता है।

- ये बात जो आपने कही, सच है। हमारे यहाँ ज्ञान परम्परा श्रुति और स्मृति की रही है। जो किताब से आज हम पा रहे हैं वो हमारी पुरखिनों ने, हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभव से बरसों पहले पा लिया, संजो लिया। लोक आख्यान हों, लोक चित्र हों, लोक गीत हों, लोक कथाएँ हों, इनके माध्यम से ही नैतिक मूल्यों और विश्वासों को पाया। संग्रहित भी किया। इनको स्मृति और आचरण में जिया भी। किताबें तो बहुत बाद में आयीं।

आप दस्तावेज़ की बात कर रही थीं। यूँ तो वाचिक माध्यम से हमारे पास ज्ञान पहुँचा है। दरअसल ज्ञान और स्मृति को एक दूसरे का पर्याय ही कहा जाता है। संयोग की बात है कि जिस ‘विश्वरंग पुस्तक यात्रा’ में प्रसंगवश आप भोपाल आयी हैं उसमें दो किताबें माथुर चतुर्वेदी समाज में प्रचलित संस्कार गीत और उनके एक सौ पच्चीस वर्षों के सामजिक बदलाव पर लोक संस्कृति की अध्येता विनीता चौबे प्रस्तुत कर रही हैं।

- पहले तो मैं बहुत-बहुत बधाई दूँगी विनीता जी को इन दो पुस्तकों के लिए। माथुर समुदाय में बहुत कमाल की संगीत की परम्परा रही है। इस बिरादरी से हमारे परिवारों के बहुत अच्छे मित्र रहे हैं। उनके यहाँ गाने-नाचने की सामूहिक परंपरा रही है। लड़कियाँ बचपन में ही उस ओर ढल जाती हैं। घरेलू संगीत का अद्भुत भण्डार है उनके पास। मुझे भी उत्सुकता है उस पुस्तक को देखने की। देखिये, इस श्रृंखला की पहली कड़ी तो यही है कि डॉक्यूमेंटेशन हो। पुस्तक के रूप में यह सामने आए। दूसरी सबसे बड़ी बात जो मुझे लगती है, जहाँ तक मेरी समझ है, माथुर समाज की ये किताब अपेक्षाकृत खड़ी बोली के निकट है। मैंने उन गीतों को सुना है। इसीलिए जानती हूँ। ‘छापक पेड़ छिउलिया’ किसी को पता नहीं होगा की ढ़ाक के पेड़ की छतनार है, छाया है उसके नीचे हिरनी खड़ी है। ये इतने ठेठ शब्द हैं कि जो आज देशज समाज से जुड़ा व्यक्ति नहीं है तो वो अर्थ से अनभिज्ञ रह जाएगा। आवश्यकता है कि इन गीतों को जनसाधरण तक पहुँचाया जाए। जैसे हम दूसरी भाषाओं की पुस्तकों का अनुवाद करते हैं, इन लोकगीतों का भी हम कहीं न कही जनसामान्य के लिए अनुवाद करके भी यदि प्रस्तुत करें तो वो जान पायेंगे कि कितनी अद्भुत थाती के हम सब वारिस हैं। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इनको आगे लेकर चलें। विनय जी, सबसे बड़ी ज़रूरत है अनुशासन और संकल्प की है, कि भई, इसको तो गाना ही है। साथ में बैठना ही है। एक बहू ने एक कड़ी पकड़ी तो दूसरी बहू को दूसरी कड़ी उठानी ही है। पहले कोई मना नहीं कर सकता था। दादी या कोई अन्य महिला ढोलक लेकर बैठ गयी तो औरतें बैठेंगी ही और वो अनुशासन से सीखती चली जाती थी। आज दुर्भाग्य से वो अनुशासन नहीं है। हम उसको धिक्कारते हैं। पता नहीं क्यूँ? मुझे लगता है कि नयी पीढ़ी तक ले जाने के लिए जितनी भी श्रुति परम्परा की चीज़ें हैं उन पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए। वनवासी समुदाय आज भी अपनी इस धरोहर के प्रति सजग है। 


आपकी पहल इस दिशा में क्या और कैसी है?

- विनय जी, आप तो मेरी कई सभाओं के उद्घोषक रहे हैं। आपने तो मुझ पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखा भी है। देखा- महसूस किया होगा कि मैं जब भी गाती हूँ, जो गाती हूँ, उसकी व्याख्या करके गाती हूँ और उसको आज के धरातल की कसौटी पर गाती हूँ। मेरा एक कार्यक्रम था लखनऊ के अम्बेडकर नगर में। जब मैं गा रही थी तो मैंने वहाँ ‘रेलिया बैरन‘ गाया। मैंने श्रोताओं को बताया कि एक समय अयोध्या का हिस्सा था ये ज़िला। बाद में कटकर अलग बना। मुझे याद है, यहाँ पर रेलवे की बड़ी लाइन नहीं थी, लोग बस से जाते थे। जब रेल आई पहली-पहली बार तो उस समय का वो कौतुहल मुझे याद है। ये सौ साल पुराना गीत है। इसको गाते-सोचते मैं पुराने समय को याद करती हूँ। हमारी सिद्ध पीठिका पर बैठी पुरखिनें थी, उनकी जगह खुद को रख के हम देखते सोचते हैं और उन श्रोताओं को भी उसी वातावरण में ले जाते हैं। तो बात कुछ बनती है। लोक की ज्ञान परंपरा में गीतों का या लोक साहित्य की किसी भी विधा का महत्व अनमोल है। हर लोक गीत एक किताब है। हम सिद्ध वचनों के देशवासी हैं। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय है।








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