अनंत को पुकारता गंधर्व का गान - विनय उपाध्याय
अनंत को पुकारता गंधर्व का गान
विनय उपाध्याय
किसी वृक्ष की ऊँचाई उसके धराशायी होने के बाद ही नापी जा सकती है।...इस जुमले के सतही अर्थ और आशयों से परे यदि किसी तपस्वी-साधक के जीवन व्यापी सृजन और चिंतन को तौलें तो समुद्र की अथाह जलराशि का सैलाब दिखाई देता है। कुमार गंधर्व हमारे संगीत समय का ऐसा ही बिरला सच हैं। 8 अप्रैल को आज से सौ बरस पहले उनका जन्म हुआ और 12 जनवरी 1992 को उनका देहांत हुआ। लगभग सत्तर बरस के जीवन में इस गानयोगी ने जो सोचा, रचा और जिया वो कंठ संगीत का सुनहरा अध्याय बन गया।
पिछले बरस जन्म शताब्दी के निमित्त उनकी सुरीली स्मृतियों के पाठ जीवंत होते रहे। किसी सपने की दरार में, किसी शब्द-स्वर की सुनी-अनसुनी अंतर्ध्वनियों में गंधर्व के होने की तस्दीक होती रही। भूलने और बिसार दिए जाने वाले इस दौर में कुमार बेसाख्ता याद आते रहे तो इसकी बड़ी वजह यह कि खींच दी गयी रूढ़ियों की लकीरों को लांघकर अपनी मौलिकता का स्वायत्त संगीत परिसर उन्होंने निर्मित किया। खेलने-कूदने और माँ की गोद में मचलने वाली लड़कपन की उम्र में पिता की उंगली थामे वे कराची तक की सैर कर आए। इस बाल गंधर्व की प्रतिभा पर जब ज़माना मुग्ध हुआ तो पिता ने होनहार बेटे के हुनर को तराशने प्रो. बी.आर. देवधर जैसे गुणी गुरू को उन्हें सौंप दिया। कर्नाटक और महाराष्ट्र की आबो हवा में परवरिश पाकर इस प्रतिभा को ऐसे पंख लगे कि मंच और महफिलें रौशन होने लगी।
फिर आखिरी सांस तक सुर का संग साथ ना छूटा। इस यात्रा के ओर-छोर को नापना तो यहाँ संभव नहीं है। उनके साथ जुड़ी घटनाओं और प्रसंगों के गुजरते हुए वे किसी अजायबघर की तरह लगते हैं। अपनी इसी रहस्यमयता के चलते उन्होंने संगीत की आलोचना और असहमतियों को दरकिनार करते हुए अपने विचार और चिंतन से संगीत की अपार संभावनाओं के दरवाजे़ खोले। स्वर और भाव-रस के मौलिक सौन्दर्य की हिमायत करते हुए राग का पुराविष्कार किया। गायन की गहराइयों में नई वैचारिक चमक को पहचाना। ख़याल गायन से इतर भक्ति के भाव संगीत की निर्मलता और लोक संगीत की मधुर अनुगूँजों में आत्मीयता की परख की। इस साधना में लयलीन होकर उन्होंने इस सच को पाया कि प्रकृति और मनुष्य के बीच संगीत की जो आंतरिक परस्परता है, वही गायन का चरम है। कबीर के निर्गुण में लीन कुमारजी का कंठ इसी सत्य की गवाही देता है। 1947 में बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। मुंबई को अलविदा कहना पड़ा। तब मध्यप्रदेश के मालवांचल के छोटे से क़स्बे देवास में ‘भानुकुल’ उनका बसेरा बना। मालवा के लोक संगीत ने कुमारजी को मोह लिया।
राग-रागिनियों के सिद्ध कंठ में मालवा की रस-भीगी गागर छलक उठी। प्रयोग की नयी ज़मीन से मटियारी गंध उठी तो रसिकों की आत्मा खिल उठी। यूँ कुमारजी ने शास्त्र और लोक की आपसदारी की नई नज़ीर पेश की। ऋतुचक्र ने उनके भीतर कुछ ऐसी अंगड़ाई ली कि गीत वर्षा, हेमंत गीत, गीत बसंत, मालवा की लोक धुनों से लेकर तुलसी सूर, कबीर, मीरा, तुकाराम जैसे संत कवियों की रचनाओं पर संगीत रूपक तैयार किए। उन्हें अनेक सभाओं में प्रस्तुत किया। मालवती, अहिमोहिनी, गौरी वसंत और लगन गंधार जैसे राग उनके कंठ में अवतरित हुए।
विवादित होते हुए भी कुमारजी की साधना अलक्षित नहीं हुई। स्वीकार, समर्थन, प्रशंसा और पुरस्कारों ने उनके यश में इज़ाफ़ा किया। मध्यप्रदेश की सरकार ने उन्हें कालिदास सम्मान और भारत सरकार ने पद्मभूषण तथा पद्मविभूषण की उपाधि से विभूषित किया। इस नश्वर संसार में देह का अवसान सुनिश्चित है पर आवाज़ें कभी मरती नहीं। कुमार गंधर्व अमरता का वरदान पाने वाली ऐसी ही विरली आवाज़ थे जहाँ रमते हुए मन की पवित्रता और बेचैनियों का गुबार हमेशा धुलता रहेगा। अनंत को पुकारता रहेगा गंधर्व का गान।




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