साँपों की बस्ती में खिला 'गुलाब' - विनय उपाध्याय

 

                                                                                                                                                                                      चित्र : वीरेन्द्र राठौर 
 
                                                                                                                                                                                                                                                     



" एक बार मेरी माँ ने मेरे पिताजी से पूछा कि मेरी बच्ची का पेट आप कैसे भरते हैं क्योंकि अभी यह खाना तो खा नहीं सकती। मेरे पिताजी के कहा कि गाँव की औरतें साँपों को जो दूध पिलाती हैं उसमें से बचा हुआ दूध मैं इसे पिला देता हूँ। हुआ ये कि जब मैं ढाई साल की हुईतब बीन और ढपली के बजते ही नाचने लग जाती थी। कभी साँपों को गले में पहन लेती थीकभी उनके ऊपर गिर जाती थी। मैं साँपों के साथ नाचते-नाचते अचानक बड़ी हो गयी। सांप ही मेरे गुरु हैं और उन्हीं से मुझे इस नृत्य की प्रेरणा मिली है।"



ये एक ऐसी औरत की कहानी है जिसने अपनी बलखाती देह में लय-ताल का वो तिलिस्म रचा जो रंगीले राजस्थान को देखने की नई नज़र देता है। .... ये है- गुलाबो बाईजो साँपों को पालकरउनका खेल दिखाकर उन्हीं के ज़रिये सदियों से अपनी रोज़ी की जुगाड़ करने वाली बिरादरी की नुमाइंदगी करती है। यायावर सपेरों के खानदान की यह बेटी कला के रंगमंच पर एक दिन सितारा बनकर उभरेगीयह सिर्फ़ उसकी किस्मत को मालूम था। इस सच पर हैरत भी होती है और फ़क्र होता है कि कभी गुमनामी के अंधेरों में गुजर करने वाली गुलाबो के नाम के साथ अब पद्मश्री की मानद उपाधि का तमगा जुड़ गया है। यही नहींगुलाबो के साथ जुड़ा कालबेलिया नृत्य यूनेस्को द्वारा नामित विश्व धरोहर की सूची में दर्ज हो चुका है। बेशुमार दुश्वारियों और हिकारत के लम्बे दौर गुज़ारकर क़ामयाबी और शोहरत की बुलंदियों को छूने वाली इस जाँबाज़ और जुनूनी कलाकार की संघर्ष यात्रा पर पिछले दिनों विस्तार से बातचीत हुई। गुलाबो ने बहुत से उन अनजाने पहलुओं और वाकयों को खुलासा कियाजिन्हें जाने बगैर शायद इस नर्तकी की तस्वीर अधूरी है। नागिन की तरह बलखाती गुलाबो को नृत्य करते देखना दर्शकों के लिए सदा एक अलौकिक अनुभव रहा है।


गुलाबो बचपन की यादों में खो जाती है- "साँपों का खेल दिखाने के दौरान गाँव की औरतें जो दूध साँपों को पिलाती उसमें से बचा हुआ दूध पिताजी मुझे पिला देते थे और इसी बीच उनके साथ गाँव-गाँव घूमते मैं एक दिन बड़ी हो गयी। एक बार मेरी माँ ने मेरे पिताजी से पूछा कि मेरी बच्ची का पेट आप कैसे भरते हैं क्योंकि अभी यह खाना तो खा नहीं सकती। मेरे पिताजी के कहा कि गाँव की औरतें साँपों को जो दूध पिलाती हैं उसमें से बचा हुआ दूध मैं इसे पिला देता हूँ। हुआ ये कि जब मैं ढाई साल की हुई, तब बीन और ढपली के बजते ही नाचने लग जाती थी। कभी साँपों को गले में पहन लेती थी, कभी उनके ऊपर गिर जाती थी। मैं साँपों के साथ नाचते-नाचते अचानक बड़ी हो गयी। सांप ही मेरे गुरु हैं और उन्हीं से मुझे इस नृत्य की प्रेरणा मिली है।

यह नृत्य मेरे लिए भगवान का दिया अनमोल उपहार है। जब मैं अच्छा नृत्य करने लगी तो मेरे पिताजी को रुपये, अनाज और अन्य सामग्री आसानी से मिलने लगी। लोग कहने लगे कि बेटी को नचा रहा है, साँपों को नहीं। इस विरोध के बाद पिता ने मुझे साथ ले जाना छोड़ दिया। लेकिन मुझे तो नाचने की लत लग चुकी थी। जब मुझे नाचने को नहीं मिला तो मैं बहुत बीमार हो गयी। जब मेरे पिता डॉक्टर के पास ले गए तो डॉक्टर ने कहा कि यह लड़की अब नहीं बचेगी। इसे तो आप घर ले जाओ।



मेरे पिताजी मुझे घर लेकर नहीं आये। सीधा मुझे अजमेर ख़्वाजा शरीफ़ के दरबार ले गए। उनकी चौखट पर उन्होंने कहा- "हे पीर बाबा। मेरी धरती पर यह बच्ची जन्मी है। पाँच घंटे जब यह बच्ची धरती के अंदर रहने के बाद भी नहीं मरी तो छोटी-सी बीमारी से यह कैसे मर सकती है?" बाबा के सामने हाथ जोड़ कर मेरे पिता बैठ गए। मेरे हाथ-पाँव भी नहीं चल रहे थे। इसी बीच पीर बाबा की मज़ार से एक गुलाब का फूल आकर मेरे ऊपर गिरा तो मैं हाथ-पैर चलाने लगी, रोने लगी। मेरे पास ही मौलाना साहब खड़े थे, उन्होंने कहा कि तेरी बेटी वापस से जिंदा हो गयी है बाबा। तब मेरे पिता ने मौलाना साहब से कहा आज यहाँ से 'धनवंती' नाम की कन्या नहीं, गुलाब को मैं साथ लेकर जा रहा हूँ।  

घर वाले प्यार से गुलाबो कहने लगे। नृत्य करने लगी तो दुनिया ने भी इसी नाम से पहचाना। राजस्थान ही नहीं, अब तो सारे संसार में कालबेलिया नृत्य लोकप्रिय हो गया। गुलाबो बताती है कि विदेशी लड़कियाँ यहाँ भारत में हमारे पास कालबेलिया नृत्य सीखने के लिए आ रही हैं। लेकिन कालबेलिया की पुरानी परंपरा अब बहुत बदल गयी है। हमारे समाज के युवक न तो बीन, ढपली, चंग बनाते हैं और न ही सीखना चाहते हैं। कोई भी साँपों का झाड़ा सीख नहीं रहा है। हमारी पारम्परिक कला पिछड़ती जा रही है। हमारे समुदाय के अधिकतर लोग शहरों में रहने लगे हैं। शहरों में बहुत सुविधाएँ उन्हें मिल रही हैं। इसलिए अब जंगलों में जाना नहीं चाहते। पारम्परिक साज़ों की ज़रुरत भी शहरों में आज कम हो गयी है।

सारे दुःख तकलीफ भूल कर मैं इस नृत्य में खो जाती हूँ। नई ऊर्जा मिल जाती है। गुलाबो सपेरा ने बताया कि फ्रांस में परवीन नाम की एक लड़की है जो आज बहुत बड़ी गायिका बन चुकी है। वो जब तक मेरा गाना सुन नहीं लेती थी रात को सोती नहीं थी। इसी प्रकार फ्रांस और अन्य देशों के बच्चे हमारे इस गीत-संगीत को बहुत पसंद करते। एक बार एक लड़की गुलाबो सपेरा का नृत्य देखने विदेश में 600 किलोमीटर की सड़क यात्रा करके पहुँची थी। इस सात साल की बच्ची ने गुलाबो सपेरा को एक अंगूठी दी थी जो आज तक उन्होंने पहनी हुई है।



2016 में संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली द्वारा संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से आयोजित अमूर्त धरोहर-इ-फेस्टिवल ऑफ़ इंटेजिबल कल्चरल हैरिटेज ऑफ़ इंडिया कार्यक्रम में गुलाबो सपेरा के दल ने कालबेलिया नृत्य की प्रस्तुति दी थी। वो बड़ा ही हैरतअंगेज़ कर देने वाला मंज़र था। गुलाबो सपेरा का नृत्य देखने के लिए हुज़ूम उमड़ पड़ा था। बड़ी मुश्किल से लोगों को काबू में किया गया। दूसरे दिन कई लोगों ने गुलाबो की सलामती जानने के लिए उनसे बात की तब उन्हें पता चला कि कार्यक्रम में कई लोग घायल हो गए थे।

रेतीले बवंडरों और तपिश भरी वादियों में भी तहज़ीब के गुल खिलाये जा सकते हैं। यकीन करना ज़रा कठिन है, लेकिन राजस्थान की सरज़मीं पर वक़्त की स्याही ने एक ऐसी हकीकत भरी दास्तान लिखी है जिसे सुनकर सारी दुनिया आज चकित है। ये है गुलाबो की कहानी।



चित्र : दुर्गा बाई 







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