खुली हवा में साँस लेता स्वर - मुकेश गर्ग

 खुली हवा में साँस लेता स्वर

गन्धर्व गान - मुकेश गर्ग





कुमार गन्धर्व यानी हिन्दुस्तानी संगीत का नया सौंदर्यशास्त्र कुमार गंधर्व यानी बगावत घरानों के खिलाफ बगावत ऐसी बात जिसने घरानों के नाम पर चली आ रही श्रेष्ठता का पर्दाफाश किया। बताया कि नकल कर लेने से कोई बड़ा नहीं होता। बड़ा होता है सृजन से कुछ नया रचने से मैं तोताराम नहीं हूँ" कहना है उनका। 

कुमार गन्धर्व की बगावत से घरानेदार संगीत के हिमायतियों में खलबली मच गयी जिन्हें अभिमान था कि संगीत को घरानों ने पनपाया है, उनके सामने अब ऐसा आदमी आ खड़ा हुआ जो कह रहा था कि घरानों की ही वजह से हमारा संगीत नीचे गया है। यह कोई छोटी बात नहीं थी, वह भी आज से कई साल पहले नतीजा यह कि हर तरफ से हमले होने लगे कुमार पर। कोई कहता- "यह भी कोई गाना है, इसे करके बिल्लियों को तरह आवाज निकालना।" (आचार्य बृहस्पति)। बहुतों को कुमार के राग-रूपों से शिकायत होने लगी- "अगर राग के परम्परागत रूप की रक्षा नहीं कर सकते तो उसका नाम बदलकर कुछ और क्यों नहीं रख लेते?" किसी ने इल्जाम लगाया- "मेरे बनाए राग 'वेदों की 'ललित' में तुमने तीव्र निषाद लगा दो और कह दिया लगनगन्धार हमारे राग के ऊपर तुम एक सुर और नया लगाते हो।" (पं. दिलीपचन्द्र बेदी) गरज यह कि परम्परा के प्रति भावुक लगाव रखने वाला हर संगीतज्ञ कुमार गन्धर्व को एक खतरे के रूप में देखने लगा और यह गलत भी नहीं था। कुमार ने उन जड़ों को जोरदार झटका दे दिया था, जिन पर हिन्दुस्तानी संगीत का वटवृक्ष सीना ताने खड़ा था।

क्या सचमुच कुमार परम्परा-विरोधी है, इसकी पड़ताल के लिए उन्हीं से पूछा- "कुछ लोगों का आरोप है कि आप परम्परा को नहीं।" इतना सुनना था कि आवेश में आ गए "परम्परा के ऊपर आप क्यों इतने लट्टू होकर बैठे हैं? हमको समझ नहीं आता। फिर क्यों नहीं रहते आप पुरानी तरह से? यह इतना फालतू लफ्त है। लोग इसमें क्यों इतने अटके हैं? आप आगरा फोर्ट देखने जाइए न मैं तो नकार नहीं कर रहा हम भी जाते हैं आपके साथ अच्छा भी लगता है। आपको फिर राजा लोग चाहिए क्या? फिर बैलगाड़ी चाहिए आपको? यानी, फिर कुआँ चाहिए क्या? तो फ्लश-संडास निकाल दीजिए घर से आपको फ्लश संडास भी चाहिए घर में, नल भी चाहिए और कुआँ भी चाहिए। और कुआँ का अभिमान भी छूटना नहीं चाहिए आपको।"

जवाब सुनकर मैं हैरान रह गया। कैसी बेलाग टिप्पणी है हमारे दोगले जीवन-मूल्यों पर 'फिर राजा लोग चाहिए क्या' में कितनी गहरी समझ है। किसी कट्टर घरानेदार से यह वाक्य सुनने को नहीं मिलेगा आपको। उलटे रजवाड़ों के न रहने का रोना ही सुनेंगे उससे यह वो चीज़ है जो एक तरफ कुमार गन्धर्व की समाज सापेक्ष चिन्तनशीलता का सबूत देती है, तो दूसरी तरफ उनकी गायकी का रहस्य भी खोलती है यह बताती है कि क्यों परम्परागत गायकी और कुमार गन्धर्व की गायकी एक-दूसरे को पीठ दिए बैठी रहती हैं। एक ही उत्स से जन्म लेकर भी क्यों दोनों अलग दिशाएँ पकड़ती हैं और आगे जाकर उन में इतनी दूरी आ जाती है कि समझौते की सम्भावना तक बाकी नहीं बचती। 




असल में हमारे ज्यादातर संगीतज्ञ, जिन में पढ़े-लिखे भी हैं, 'परम्परा' का जो मतलब समझते हैं, गड़बड़ उसी में है। उनकी नजर में परम्परा का अर्थ है पिछली पीढ़ियों से मिली कलात्मक सम्पदा को ज्यों-का-त्यों अपना लेना। उसी को शुद्ध और आदर्श मानना। उस में जरा-सी मिलावट, प्रयोग की हलकी-सी आहट भी उन्हें विचलित कर देती है। ताज्जुब की बात यह है कि इन में ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि हमारा संगीत कभी एक-सा नहीं रहा, बदलता रहा है। आप उनसे कह दें कि आज की जरूरतों के हिसाब से कुमार गन्धर्व भी संगीत को बदल रहे हैं तो वे आपे से बाहर हो उठोगे- "यह बदलना नहीं, शास्त्रीय संगीत की धज्जियाँ उड़ाना है।" मजे की बात है कि कुमार ने अपने को सच्चा परम्परावादी माना- "मेरे जितना ऑर्थोडॉक्स कोई है ही नहीं।" कितना आत्मविश्वास है उन्हें- " और में ऑर्थोडॉक्स हैं इसीलिए कुछ कर सकता हूँ। आप फंडामेंटल विचार करना छोड़ बैठे हैं संगीत में, तो इसमें मेरा क्या कसूर।"

इसीलिए कुमार गन्धर्व को स्वच्छंदतावादी कह देना इतना आसान नहीं। 'स्वच्छंदता' से निजी स्वार्थ को और परम्परा के तिरस्कार की गन्ध आती है। कुमार में ये दोनों ही नहीं। उनका विद्रोह बन्धनों से मुक्ति नहीं चाहता वह। राग संगीत में बन्धन है जितना बन्धन आप डालेंगे, उसका 'पावर' बढ़ता जाता है।" किसी स्वच्छंदतावादी से कभी सुनी है आपने ऐसी बात? कुमार ने हमारे रागदारी संगीत को ताजा हवा में साँस लेने का मौका दिया। जड़ बन्धनों को काटकर उसे पनपने और फिर से तन्दुरुस्ती हासिल करने का अवसर दिया है। लोक संगीत का उनका अभ्यास उनके रागदारी संगीत को ऑक्सीजन देता है। इस तरह उनका संगीत अभिजात होते हुए भी लोकोन्मुखी है।

कुमार गन्धर्व की शिकायत है कि घरानों ने हमारे संगीत की सर्जनात्मकता समाप्त कर दी है। वे कलाकार से कुलीगीरी कराते हैं। 'कुलीगीरी यानी लीक पर चलना, जो पुराने कहते चले आ रहे हैं, उसे कहना बोझ लेकर चलना । घराना तो एक बोझा ही हुआ न। मेरे ऊपर बोझा नहीं है। मेरे अपने संगीत का जब मुझ पर बोझा नहीं, तो आपका बोझा कहाँ लेता फिरूँ मैं। मैं ने कल जो गाया, वह ख़त्म हो गया। आज फिर फ्रेश विचार करूंगा। मेरे पास राग है और ताल है। जो गाया, उसको काहे को क्यों याद रखूं? आप जब लिखते हैं, तो कुछ याद करते हैं क्या? कविता करते में कुछ याद करते हैं आप? एक कविता करने के बाद दूसरी लिखते वक्त पहली को याद करते हैं आप? अच्छी पेन्टिंग करने के बाद नई पेन्टिंग बनाते समय आपको उसे याद रखना पड़ता है क्या? फिर संगीत से ही ऐसी उम्मीद क्यों करते हैं? संगीत को आप फिर कला क्यों कहते हैं?

कुमार गन्धर्व के ये सवाल किसी सिरफिरे के सवाल नहीं। न किसी एक आदमी के सवाल हैं ये हमारा पूरा युग इनके पीछे हिलोरें ले रहा है। सामन्ती कला के सामने लोकतंत्री आशा-आकांक्षाओं से पैदा हुए सवालिया निशान है ये। दरबारी सौंदर्यशास्त्र के खिलाफ जनतन्त्री सौंदर्यशास्त्र की बगावत हैं ये इन्हें झुठलाया नहीं जा सकता, दबाया नहीं जा सकता।











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