संवाद की मर्यादाएँ- निर्मल वर्मा
संवाद की मर्यादाएँ
निर्मल वर्मा
संवाद आत्मा ज़रूरत है। मैं उसे एक तरह की भूख मानता हूँ, जिसे मनुष्य ने उस 'आदि क्षण' में महसूस किया होगा, जब उसे लगा होगा कि वह मनुष्य है; अपने में अकेला है, लेकिन उसके साथ हैं। हम अपनी आँखों से अपने को नहीं देख सकते, लेकिन दूसरों को देख सकते हैं, और हमें यह आशा बँधती है कि हम भी उन्हीं की तरह होंगे। वे हमारा, हमारी देह और आत्मा का आईना-सा बन जाते हैं। एक-दूसरे को देखने की प्रक्रिया में शब्द का जन्म हुआ होगा। वह मैं भी है और दूसरा भी। शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं, हमारे होने का साक्षी भी है। हमारे होने का रहस्य उसके भीतर निहित है। इसलिए शब्द शुरू में था और हम उसमें शुरू हुए हैं।
एक-दूसरे को पहचानने की खोज आज भी जारी है। शब्द पर जितने आक्रमण हुए हैं, उन्हें हमारी आत्मा ने भी झेला है। किन्तु एक समय आता है और शायद यह हो जाता है कि आत्मा मृतप्राय-सी हो जाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अनेक ऐसे वर्ष आए जब हम प्रगति, विज्ञान, आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ में यह पूछना भी भूल गए कि यह दौड़ किसलिए है? हम कहाँ भाग रहे हैं? हमें जहाँ पहुँचना है? ये प्रश्न किसी एक अकादमीय अनुशासन के भीतर नहीं आते, न ही इनका उत्तर कोई विशिष्ट राज्यसत्ता या संस्कृति दे सकती है। ये मनुष्य के प्रश्न हैं, जिन्हें समूचा मनुष्य ही दे सकता है क्योंकि इस तरह का 'समूचा मनुष्य' आज खंडित हो चुका है। ये प्रश्न भी केवल आदमियों, सेमिनारों या बुद्धिजीवी गोष्ठियों में उठाए जाते हैं और वहीं दफना भी दिए जाते हैं। सार्थक संवाद के भीतर यह जरूरी है कि इन शंकाओं और जिज्ञासाओं को बुद्धि की चहारदीवारों उठाकर दैनिक जीवन के कुरुक्षेत्र में प्रस्तुत किया जाए । यह कुरुक्षेत्र राजनीति का मैदान भी है और व्यक्तिगत नैतिकता का धर्मक्षेत्र भी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि जहाँ स्वयं मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न है, वहाँ उस अस्तित्व के अर्थ और धर्म को ऐसी शक्तियाँ परिभाषित करती हैं, जिनका अपना कोई नैतिक दायित्व नहीं। जिस शब्द को हमने अपनी पहचान का ईश्वर माना था, उस शब्द के संवाहक हैं झूठ और धर्मसत्यों से भरे अखबार, बाजारू पत्रिकाएँ, राजनीतिज्ञों के स्वार्थलिप्त भाषण, जिनका मनुष्य के सत्य और अनुभव से कोई सरोकार नहीं, क्योंकि हर व्यक्ति अपने सीमित क्षेत्र में आत्मलिप्त है। हमें दूसरे मनुष्य को जानने का मौका अपनी आत्मा की भूख से उत्प्रेरित होकर नहीं, इतर शक्तियों और स्वार्थों द्वारा निर्मित एक बनी-बनाई 'इमेज' द्वारा मिलता है। हम छायाओं की दुनिया में छायाओं से वार्तालाप करते हैं, उन शब्दों के सहारे जो 'नाटक' एक ऐसी विधा है जो अपना अलग अस्तित्व रखती है। जहाँ अन्य साहित्यिक विधाओं की यात्रा मुद्रि होने, पढ़े जाने या सुने जाने पर समाप्त होती है, वही नाटक की यात्रा इसके कुछ आगे बढ़ते हुए दृश्यत्व एवं श्रव्यत्व के साथ जब वह मंचित हो जाता है तब ही पूर्ण हो जाती है। दरअसल मंच पर प्रदर्शित करने के उद्देश्य से ही नाटककार नाटक की रचना करता है। इस प्रकार नाटक एक ऐसी साहित्यिक विधा है जो रंगकर्मियों की कला के माध्यम से अमूर्त से मूर्त बन जाती है। अब ऐसी स्थिति में जब नाटक के अध्यापन की बात आती है तो प्रश्न उठता है कि उसे किस रूप में पढ़ाया जाए? साहित्यिक विधा के रूप में या प्रदर्शनकारी विधा के रूप में? कुछ लोगों का यह कहना हो सकता है कि जब विश्वविद्यालयों में या कॉलेजों में हम नाटक पढ़ाते हैं तो उसे एक साहित्यिक विधा के रूप में पढ़ाते हैं, इसलिए हमें केवल उसकी साहित्यिक विशेषताओं पर ही केंद्रित करना चाहिए। परन्तु, क्या इस तरह सोचना एकांगी नहीं होगा? जब हम यह स्वीकार करते हैं कि नाटक ऐसी साहित्यिक विधा है जिसके साथ दृश्यत्व एवं श्रयत्व जुड़ा रहता है तब उसके अध्ययन के अंतर्गत नाटक के इस रूप की उपेक्षा करना क्या सही होगा?
यह सही है कि जब कोई भी अच्छा नाटककार नाटक लिखता है तब वह नाट्य-प्रसंगों को विजुअलायज करते हुए नाटक लिखता है। परन्तु, वही नाटक जब निर्देशन प्रक्रिया से गुजरते हुए मंच पर प्रस्तुत होने लगता है तब उसका एकदम नया रूप दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत होता है। हर पाठक रचनाकार द्वारा प्रस्तुत ब्योरों के आधार पर अपनी बुद्धि, कलात्मक, संस्कारों तथा कल्पना-शक्ति के अनुसार नाटक के पात्रों और घटनाओं के मानसिक चित्र बनाता है। परन्तु उसी नाटक को जब वह मंचित रूप में उन्हीं मानसिक चित्रों को सजीव होते हुए, गतिशील कार्यव्यापार के रूप में देखता है। पढ़ते हुए जिन पहलुओं को वह उतनी तीव्रता से महसूस नहीं कर पाता, उन्हें वह मंचित नाटक में महसूस कर पाता है, बशर्ते आवाज में भी परिवर्तन होता है, स्वर तेज हो जाता है, और जैसे ही घोड़ों की टापों की आवाज दूर जाने लगती है, वह मानो एकदम शिथिल सी हो जाती है। अब इस प्रसंग को कोई साहित्य का अध्यापक कैसे पढ़ाएगा? अगर नीरस भाव से, तटस्थ रूप में कोष्ठक में लिखे शब्दों को वह पढ़ता जाएगा तो फिर उस प्रसंग का तो पूरा सौंदर्य ही खत्म हो जाएगा। अगर उसमें अभिनय के कुछ गुण हों तब ही वह उन शब्दों के साथ कुछ न्याय कर पाएगा। परन्तु, हर साहित्य का अध्यापक तो अच्छा अभिनेता नहीं हो सकता। ऐसे में क्या किया जाए? अगर संभव हो तो आस-पास के रंगकर्मियों की मदद यहाँ ली जा सकती है। अगर कोई मंडली आपके लिए पाठ्यक्रम में लगाए गए नाटक का मंचन करने को तैयार है तो बहुत ही अच्छा, नहीं तो किसी रंगकर्मी को नाट्य पाठ के लिए आमंत्रित किया जाता है। जहाँ रंगमंच की शिक्षा पाठ्यक्रम में होती है, वहाँ के विद्यार्थी तो प्रस्तुतिकरण से जुड़े हुए होते ही हैं। परन्तु, जहाँ 'रंगमंच' पाठ्यक्रम का विषय नहीं होता वहाँ के विद्यार्थियों को भी संभव हो तो पाठ्यक्रम में लगाए गए नाटक के प्रस्तुतिकरण में गर इनवॉल्व कर दिया जाए तो विद्यार्थी उस नाटक के रंगमंचीय पहलुओं को भी अच्छी तरह समझ सकेंगे। नाटक को मंचित कर विद्यार्थियों को दिखाने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ खड़ी हो सकती हैं। ऐसे में चित्रों अगर अध्यापक और कुछ नहीं तो कम से कम किसी अच्छे कलाकार है। से नाटक के संवाद रिकॉर्ड करके उन्हें क्लास में बच्चों को सुना सकता है। हो सकता है कि ऊपर दिए गए सुझावों पर अमल कर पाना हर किसी के लिए संभव न हो। परन्तु, साथ ही यह भी सही कि पाठ्यक्रम को पूर्ण करने के उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अगर हम किसी कहानी या उपन्यास की तरह की नाटक को पढ़ाते जाएंगे तो हम उस नाटक के अध्ययन के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। दरअसल रंगमंचीय पक्षों का ख्याल रखते हुए नाटक का अध्यापन करने से रंगमंच के प्रति विद्यार्थियों की उत्सुकता को भी बढ़ाया जा सकता है। जहाँ पहले ही स्तरीय रंगमंच के अस्तित्व को लेकर काफी चिंताएँ जताई जा रही हैं, वहाँ अगर विद्यार्थी जीवन में ही रंगमंच न के प्रति युवाओं का प्रेम बढ़ने लगे तो रंगकर्मियों को उत्पन्न करने - की दृष्टि से न सही, लेकिन कम से कम रंगमंच के दर्शक तैयार करने की दृष्टि से हिन्दी साहित्य के अध्यापक अपना योगदान दे सकते हैं।
*रंग संवाद में प्रकाशित आलेख


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