लय के अवतार: पंडित बिरजू महाराज - स्वरांगी साने


प्रणाम 
पंडित बिरजू महाराज 


 लय के अवतार 

स्वरांगी साने 


पिछले बरस आज ही के दिन  हंसा अकेला अनंत में उड़ गया। घुंघरु ख़ामोश हो गये । नृत्य की सांसें थम गयीं । लय-लालित्य का चितेरा अबकी मधुमास न देख सका। कला की कायनात में कथक का सतरंगी केनवास रचने वाले महाराजा का महाप्रयाण निश्चय ही एक सुनहरे अध्याय का समापन है । जिन्हें कथक के बारे में कुछ भी नहीं पता वे भी कथक के बारे में इतना तो जानते ही हैं कि पं. बिरजू महाराज बड़े कथककार रहे हैं। इनके बारे में 'थे' लिखना बड़ी कशमकश में डालता है। जो लोग अमर हो जाते हैं, उनके बारे में इतिहास की किसी बीती घटना की तरह कैसे लिखा जा सकता है!

चित्र - करण आशीष 

कथक के इतिहास को पंडितजी ने अलग मुकाम पर पहुँचा दिया था, ऐसा मुकाम जिसमें कथक का 'क' भी न जानने वाला, यह जानने लगा है कि नृत्य की यह एक शास्त्रीय विधा है। कथक के जिस स्वरुप को आज हम अपने चारों ओर देख पा रहे हैं उसे जी की देन कहा जा सकता है। आज़ादी के बाद हर क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हो रहे थे, नए सपनों की उड़ान भरने के लिए भारत तैयार हो रहा था। संगीत नाटक अकादमी के तहत 1954 में भारतीय कला केंद्र की स्थापना हुई और कथक केंद्र में पंडित जी का व्यक्तित्व या कहें कि पंडित जी के नेतृत्व में कथक केंद्र का व्यक्तित्व उभरकर सामने आने लगा। विश्व का कोई ऐसा देश नहीं होगा, जहाँ उन्होंने कथक की भव्यता को प्रस्तुत न किया हो। रुस कहिए, अमेरिका या जापान या सऊदी अरब या युनाइटेड किंगडम या फ्रांस, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रिया या चेक गणराज विश्व के बड़े मंचों पर कथक के पारंपरिक एकल नृत्य को रखना व्यावहारिक न होता शायद इसलिए उन्होंने आकार में बड़े उन मंचों के हिसाब से कई नृत्य नाटिकाओं की रचना की जिसमें कथक की सामूहिक प्रस्तुति समाहित होने लगी। आप समझ सकते हैं कि विराट जन समुदाय के बीच बड़े क्षेत्रफल वाले मंच पर प्रस्तुति देने के लिए उसका विस्तार भी उसी तरह करना होगा। पंडितजी ने कथक को समय के साँचे में इस बखूबी से ढाला कि पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराज तथा लच्छू महाराज से मिली लखनऊ घराने की खालिस तासीर भी बनी रही और उसने नया जामा भी पहन लिया।


चित्र - स्वांतरा सक्सेना 

पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित जी ने कथक की भाव-भंगिमाओं को समेटते हुए 'माखन चोरी', 'फाग बहार', 'कथा रघुनाथ की', 'कृषनयन', 'डालिया', 'मालती-माधव', 'कुमार संभव', 'शाने अवघ' जैसी एक से बढ़कर एक नृत्य नाटिकाओं की प्रस्तुति दी। कथानक को प्रस्तुत करने के लिए हाथ, उंगलियाँ, चेहरा, भवें, पाँव की थिरकन, कसक-मसक, कलाइयों की गति सभी को लयबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया मतलब कथक करते समय केवल पैर ही नहीं संपूर्ण शरीर से नृत्य की कलात्मकता अभिव्यक्त हो इस ओर ध्यान दिया, वहीं प्रस्तुति देने वालों की वेशभूषा, अलंकरण, मुख सज्जा, वाद्य वृंद, ध्वनि-प्रकाश के साथ निर्धारित समय सीमा में कथावस्तु पिरोने का सलीका भी शुरू किया।

कला के सोपान में उनके साथ चित्रकारी भी जुड़ी थी और रंगों के साथ स्वाद की दस्तक देते वे गोल-गप्पों और सुपारी के शौकीन थे। महाराज जी की प्रस्तुतियों में ज्यामितीय आकृतियों को बनते हुए देखा जा सकता था ऐसा लगता है जैसे वे गणितज्ञ रहे होंगे तभी शब्दों को कविताओं में बाँध लेते थे, बृजश्याम नाम से उनकी कविताएँ देखी जा सकती हैं। हर बोल को निर्धारित आवर्तन में सम पर लेकर आने की महारथ गणित को जाने बिना कैसे संभव है। लालित्य के साथ ताल पक्ष पर मजबूती ही थी जिससे वे तबला, ढोलक, पखावज जैसे वाद्यों को बजाने का हुनर भी जानते थे और वायलिन, सरोद, बाँसुरी पर सुर छेड़ने के साथ बड़ी कुशलता से गा भी उठते थे। उनसे ठुमरी, दादरा, भजन और ग़ज़लों को सुना जा सकता था। वे गीत पसंद करते थे और उनकी पोती रागिनी के अनुसार रविवार 16 जनवरी 2022 को 83 साल की उम्र में जब उन्होंने अंतिम साँस ली तो उससे पहले रात के भोजन के बाद वे अंताक्षरी खेल रहे थे, तभी उन्हें दिल का दौरा पड़ा। चार फरवरी को वे 84 साल के हो जाते। उन्हें पुराने फ़िल्मी गीत बहुत अच्छे लगते थे।

चित्र - गूगल से साभार 

ऐसा नहीं था कि उन्हें पुराना अच्छा लगता था तो नए से वे दूरी बनाते हों। न केवल 'कथक केंद्र' बल्कि 1998 में वहाँ से फैकल्टी प्रमुख और निदेशक के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद दिल्ली में अपना डांस स्कूल 'कलाश्रम' भी खोला ताकि नई पीढ़ी को नित नया सिखाते रहें। पुराने फ़िल्मी गीतों की बात चली तो उन्होंने सत्यजित रे की 'शतरंज के खिलाड़ी' में नृत्य निर्देशन किया था। इस फ़िल्म में उन्होंने खुद संगीत तैयार कर गाया भी था। लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह ने कथक परंपरा को बढ़ाया और सत्यजित रे ने 1977 में 'शतरंज के खिलाड़ी' फिल्म बनाई थी जिसमें नवाब वाजिद अली शाह से जुड़ी कहानी भी थी। उसके बाद 'दिल तो पागल है', 'गदर', 'डेढ़ इश्किया', 'बाजीराव मस्तानी' जैसी नई फ़िल्मों में भी उन्होंने नृत्य निर्देशन किया। दक्षिण के अभिनेता | सुपर स्टार कमल हासन के लिए उन्होंने 'विश्वरुपम' में 'उन्नाव कानाधू नानी' गीत कोरियोग्राफ़ किया था जिसके लिए पंडितजी को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। उनके कोरियोग्राफ़ किए गीतों की बात करें तो 'ओ काहे छेड़ मोहे', 'ओ जगावे सारी रैना, 'मोहे रंग दो लाल' जैसे लोकप्रिय गीत हैं। देवदास के गीत 'काहे छेड़' में शुरुआती दो पक्तियाँ बिरजू महाराज जी की हैं, उसके बाद कविता कृष्णमूर्ति की आवाज है।

चित्र - गूगल से साभार 

पंडितजी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था मेरी शर्त थी कि अगर हीरोइन पूरे कपड़े पहनेगी, अच्छा अभिनय, आंखों से बात करेगी, पलकों से बात करेगी, जो वहीदा जी, मीना कुमारी और मधुबाला में अदा थी, तब तो मैं निर्देशन करूँगा। 'बाजीराव मस्तानी' के 'मोहे रंग दो' के लिए उन्हें फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी मिला। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान, कालिदास सम्मान, लता मंगेशकर पुरस्कार, भरत मुनि सम्मान आदि से भी नवाजा गया। लेकिन कोई कलाकार केवल इसलिए तो महान नहीं होता कि वह कितने पुरस्कारों से सम्मानित हुआ बल्कि उसने किस विरासत को सहेजा और आने वाली पीढ़ी के लिए क्या विरासत छोड़कर गया इससे वह महान् बनता है। पंडित बिरजू महाराज जी का पैदाइशी नाम दुःखहरण था लेकिन जिस अस्पताल में वे जन्मे वहाँ उस समय बाकी कई लड़कियों का जन्म हुआ और यह अकेले कान्हा थे इसलिए बृजमोहन रखा गया जो बिरजू से बिरजू महाराज हो गए... 

पर दुःखहरण करने वाले यूँ दुःख देकर तो जाया नहीं करते न..

                         

चित्र - जे सेलियन 

                                 







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