वंचितों की सेवा ही मेरा - महाश्वेता देवी
अपने जीवन में आपने एक बड़ा सपना बुना और गहरी निष्ठा से उस सपने को असलियत में बदला। आज आपको समाजसेवा तथा लेखन की सार्थक उपलब्धियों के लिए सारा देश आदर्श के रूप में देखता है। ऐसे में सहज ही उन बुनियादी हालातों और परिवेश को जानने की इच्छा होती है, जहाँ आपके भीतर एक अनूठा स्वप्न- बीज अँखुआया।
जो आज सबको बड़ा सपना लगता है, वैसी कल्पना उस समय तो मैंने की ही नहीं थी, जब मैंने चलना शुरू किया था। भविष्य को भला किसने जाना है? लेकिन यह तो सच है कि बचपन में मिला परिवेश और संस्कार बड़े ही महत्व के होते हैं। हमारे पूरे जीवन तथा कर्म में उनकी छाप दिखाई देती है। ढाका में मेरा जन्म हुआ। मेरे पिता मनीष घटक उस समय के जाने-माने कवि-साहित्यकार थे और माँ की भी साहित्य में गहरी रूचि थी। वे समाजसेवा में भी लगी रहती थीं। ढाका के इडेन मांटेसरी स्कूल में मुझे भर्ती कराया गया। चार साल की उम्र में ही मैंने बांग्ला लिखना पढ़ना सीख लिया था। पिता की नौकरी के कारण उनका यहाँ- वहाँ तबादला होता रहा, इस कारण ढाका के जिंदाबहार लेन स्थित अपने ननिहाल में बचपन में मैं काफ़ी रही। शांति निकेतन में भी मेरा दाखिला कराया गया और वहाँ मैंने महिला आत्मरक्षा समिति के नेतृत्व में राहत तथा सेवा कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मैं बताना चाहूँगी कि मेरे नाना गरीब वकील थे, वे नानी के साथ मिलकर एक स्कूल चलाते थे। मेरी मौसी भी इस काम में हाथ बँटाती थी। नानी के घर का वातावरण बड़ा ही बौद्धिक था। वहाँ खूब किताबें थीं। तरह-तरह की नानी मुझे अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाती थीं। इस सबके साथ मैं आपको बताऊँ कि ये वो दौर था जब समाज सेवा के संस्कार निःस्वार्थ भाव से अंतःकरण में होते थे। बड़ी ही जागृति थी समाज सेवा की। मेरे मन पर इस सबका प्रभाव उस समय काफ़ी गहरा पड़ा।
क्या परिवार के दायित्वों से आप बिल्कुल मुक्त रहीं? समाज सेवा के कार्यों के लिए अमूमन पूरी आजादी चाहिए होती है, या न चाहकर भी मुक्त होना पड़ता है?
बिल्कुल नहीं। बड़ी ही विचित्र स्थितियों का सामना करते परिवार आगे बढ़ा और मैं अपनी जगह बनाई। मैं शांति निकेतन में जब पढ़ रही थी तब परिस्थितिवश बीच में ही मुझे 1939 में कलकत्ता बुला लिया गया। मैं तब खूब रोई थी तब छोटे पाँच भाई-बहन थे। माँ गर्भवती थी और उसी अवस्था में सीढ़ी से फिसलकर गिर पड़ी थी। बिस्तर पर पड़ी माँ का जीवन खतरे में था मेरी उम्र तब तेरह साल की थी। मुझे इसी उम्र में बड़ा होना पड़ा। माँ की सेवा तो करना ही थी, भाई-बहनों को भी सम्हालना, उनकी पढ़ाई-लिखाई में मदद करना ये सब मेरे जिम्मे था। माँ के जीवन के अंतिम वर्षों में मैंने पुरानी सिलाई मशीन चलाकर कपड़े भी सिले।
यह सिलसिला कब तक चलता रहा?
क़रीब पाँच साल और 1944 में जब मैंने कलकत्ता के आशुतोष कॉलेज से इन्टरमीडिएट किया, दायित्वों से थोड़ी मुक्ति मिली। छोटी बहन मितुल ने मेरा हाथ बँटाना शुरू किया। मैं फिर शांति निकेतन चली गई।
क्या इसी दौरान लिखना शुरू कर दिया?
शांति निकेतन का गरिमामय परिवेश, गुरूदेव रवीन्द्रनाथ की साक्षात उपस्थिति सब कुछ कितना प्रेरणादायी था। शांति निकेतन में 'देश' के संपादक सागरमय घोष आते थे। उनसे हुई भेंट बड़ी ही रचनात्मक साबित हुई। उन्होंने मुझे इस पत्र में लिखने को कहा। तब तीन कहानियाँ उसमें छपीं और हर कहानी पर दस रूपए का पारिश्रमिक मिला। मैं उस समय थर्ड इयर में थी तभी मन में आया कि लिख-पढ़कर भी गुजारा संभव है।
विवाह, खासकर भारतीय लड़की के जीवन में नया मोड़ लेकर आता है। आप जैसी रचनात्मक कार्यों में रूचि रखने वाली लड़की के लिए विवाह का अनुभव...?
अंग्रेजी में ग्रेजुएट होने के बाद 1947 में मेरा विवाह विजन भट्टाचार्य से हुआ। वे रंगकर्मी तो थे ही, कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी थे। उस समय कम्युनिस्टों के लिए आर्थिक मुश्किलें ही थीं। मैंने एक इंस्टीट्यूट में अध्यापन कर घर का खर्चा चलाया। एक साल बाद पुत्र नवारुण का जन्म हुआ। कुछ दिनों बाद मुझे पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ में नौकरी मिल गई पर पति के कम्युनिस्ट होने के कारण नौकरी चली गई। प्रयासों से बहाली हुई तो कुछ दिनों बाद निकाल दिया। जीवन का संघर्ष कठिन हो गया। साबुन की बिक्री से लेकर ट्यूशन तक कार्य किया। विजन से विवाह ने जीवन-संग्राम का अनुभव दिया और परिणति यह हुई कि स्वेच्छा से संग्रामी जीवन की राह थाम ली। विजन से 1962 में विच्छेद हो गया। दूसरा विवाह • असीत गुप्त से किया वह भी ज़्यादा दिन साथ नहीं दे सका। 1975 में इसका भी साथ छूट गया। इसके बाद मैंने लेखन और आदिवासियों के बीच काम कर अपने को सृजनात्मक कार्यों में व्यस्त रखा। विवाह के विच्छेद बाद में आरोप-प्रत्यारोप से बिल्कुल दूर रहे।
झाँसी की रानी पर आपकी पहली किताब आयी। किसी घटना या संयोग के कारण आपने झाँसी की रानी का विषय चुना या महिला होने के कारण संवेदनाएं जागी? कृपया खुलासा करें।
हुआ ये कि विजन के साथ एक हिन्दी फ़िल्म की कहानी लिखने के सिलसिले में मुझे मुंबई जाना पड़ा। वहाँ मेरे बड़े मामा सचिन चौधरी रहते थे। उनके घर मैंने तब वी.डी. सावरकर 1957 पढ़ी। इस पुस्तक का प्रभाव मुझ पर इतना गहरा पड़ा कि मैंने तय किया- झाँसी की रानी पर मैं विस्तार से लिखूँगी। इस संकल्प को पूरा करने के लिए रानी से संबंधित पुस्तकें छानती रही। मैंने झाँसी की रानी के भतीजे गोविन्द चिन्तामणि से भी पत्र व्यवहार किया। तब मेरी उम्र 26 वर्ष की थी। मैंने बड़े ही उत्साह में डूबकर करीब चार सौ पेज लिख डाले। लेकिन मन नहीं भरा। रानी का जीवन था ही इतना विराट कि उसे समेटने की ललक बढ़ती ही गई।
माली हालत तो बहुत ठीक नहीं थी। अपने शुभ चिंतकों से पैसे लिए और अपने छ: वर्षीय पुत्र व पति को कलकत्ता छोड़कर झाँसी निकल पड़ी। वहाँ महीनों अकेले ही पूरे बुंदेलखण्ड में घूमी। उन लोकगीतों को एकत्र किया, जिनमें झाँसी की रानी का ज़िक्र था। मैं आश्चर्य में डूब गई कि एक वीरांगना की स्मृति वहाँ के लोक में कितनी श्रद्धा से व्यात है। तब झाँसी की रानी की जीवनी लिखने वाले वृंदावन लाल वर्मा झाँसी कंटोनमेंट में रहते थे। उनसे भी मिली। इस दौरान ग्वालियर तथा कालपी की यात्राएं भी कीं। 1956 में यह पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक की रचना ने मुझे दिव्य अनुभव दिए। इसके बाद 'नटी', 'आधार मानिक', 'अमृत संचय', 'विवेक विदाय पाला' और 'जल व स्तनदायिनी' किताबों के लिए भी तथ्य संग्रह करने मुझे काफ़ी श्रम करना पड़ा। क़रीब चार साल में मैं यह किताब पूरी कर पायी।
आप उन बिरली रचनाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने लिखने और जीने के बीच समान व्यवहार किया है। क्या आप अन्य लेखकों से इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी?
हर दौर में लेखक के सामाजिक सरोकार की अपेक्षा व्यापकता में बनी रहती है। लेखक को समाजसेवी होना चाहिए। लेकिन बिना अंतप्रेरणा के कुछ भी संभव नहीं। अंदर सेवा की इच्छा न हो तो बाहर कैसे आ सकती है भला। यह विवेक सबके मन में उपजे, मैं तो कामना ही कर सकती हूँ। वैसे कागज़ भी कम पावरफुल माध्यम नहीं है। उस पर लिखा हुआ सशक्त है तो असर करेगा ही।
दलित-आदिवासियों से जुड़ने, उन पर लिखने के पीछे क्या कारण रहे?
छुटपन से ही समाजसेवा से जुड़ने और जन-आंदोलनों में भाग लेने के दौरान विसंगतियों के खिलाफ विद्रोह की भावना मेरे मन में घर कर गई थी। दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के आदिवासियों, बंधुआ मजदूर ठेका मजदूर, किसान, फैक्ट्री के मजदूर, ईंट भट्टा, रिक्शा चालक और गाँवों के आम लोगों के अधिकारों, उनके साथ हुए अन्यायों को लेकर सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप के लिए मुझे सहज काम करने में सुख मिला। मैंने काल्पनिक और अकादमिक लेखन में ज़्यादा रूचि कभी नहीं ली। मैं यथार्थवादी रही हूँ, जो, जैसा जिया- देखा उसे वैसा ही लिखने में मुझे राहत मिली। 'बिरसा मुंडा' की कथा पर आधारित पुस्तक 'अरण्येर अधिकार' में आदिवासियों के सशक्त विद्रोह का स्वर है। इस पुस्तक को लिखने की वजह बने फिल्म निर्माता शांति चौधरी। उन्होंने पटकथा लिखने का आग्रह किया तो मैं दक्षिण बिहार गई। वहाँ बहुत बड़ा सर्वेक्षण किया। तथ्य संग्रह किये। फिर लिखी यह किताब ।
इस काम की आदिवासी समाज में क्या प्रतिक्रिया हुई?
बहुत रोमांचक । जब मुझे इस पुस्तक के लिए 1979 में साहित्य अकादेमी अवार्ड मिला तो ने ढाक बजाकर ख़ुशी ज़ाहिर की। उन्होंने लोगों से कहा- यह पुरस्कार तो हमें मिला है। उन्होंने मेरा अभिनन्दन करने के लिए मुझे अपने गाँव मेदिनीपुर बुलाया आदिवासियों ने माना कि उन्हें जो स्वीकृति मिली उसका कारण मेरा लेखन है। उनके इस आत्मीय उद्गार ने मेरे भीतर उनके प्रति दायित्वबोध और भी बढ़ा दिया। मैंने अपनी कोशि जारी रखी है।
आदिवासियों के बीच रहकर आपको कैसा लगा?
मेरे जीवन में यह अनुभव तीर्थ की तरह पवित्र है। मैं उन्हें कुछ सिखाने नहीं बल्कि स्व सीखने गई। ग़ज़ब की सामुदायिक भावना उनके भीतर है। वे भले ही अनपढ़-अशिक्षित है, लेकिन आज के तथाकथित आधुनिक समाज की तुलना में कहीं अधिक सहृदय, सभ्य, सुसंस्कृत हैं वे। उनके पास अपना जीवन बोध है। वे विपन्न हैं तो अपने अधिकारों से।
मतलब ?
उनके लिए सरकार और समाज ने ठीक से काम नहीं किए। इन्हीं गरीब, पिछड़े आदिवासियों ने हमें स्वतंत्रता दिलाई। अपनी जान गँवाई। आज ये ही लोग हाशिए पर हैं। उनके इलाकों में सड़कें नहीं, पानी नहीं, शिक्षा नहीं। कैसी आज़ादी आई इनके लिए? उनक नाम का पैसा भी उनके काम के लिए कितना पहुँच पाता है, यह हम सबको मालूम है। मुझे हैरत इस बात की होती है कि जो स्वयंसेवी संगठन आदिवासियों के नाम पर बने हैं, लाखों- करोड़ों रुपए की एड लेते हैं, वे एक दिन भी इन क्षेत्रों में जाकर काम नहीं करते। मैं साफ़ कहूँगी कि ट्राइबल के लिए जिस गंभीरता से काम आज़ादी के बाद होना था, नहीं हुआ। सभा-सेमीनारों की नहीं, वहाँ जाकर काम करने की जरूरत है।
सुना है पुरस्कारों में मिली राशि आपने आदिवासियों के हित में दान कर दी ?
सही है। ज्ञानपीठ, साहित्य अकादेमी, मैगसेसे के दौरान जो भी मिला मैंने सामाजिक कार्यों में उसे लगा दिया। अब मेरा जीवन इन्हीं के लिए है।
आपके लेखन की क्या स्थिति है इन दिनों?
पूछिए मत। क्रिएटिव राइटिंग तो कर ही नहीं पाती। बुढ़ापे भी दौरे, इतनी यात्राओं में मशगूल रहती हूँ कि समय ही नहीं मिलता नया लिखने का। अपनी आत्मकथा जरूर धीरे-धीरे आगे बढ़ा रही हूँ। 'प्रभा' में यह 'एकई जीवने' (एक ही जीवन में) शीर्षक से छप रही है। दो साल में पूरा हो जाये यह काम ऐसी इच्छा है।
आप मूलतः बांग्ला लेखिका रही हैं, हिन्दी से आपको क्या अपेक्षा है?
ये बिल्कुल सही है कि हिन्दी राज्यों में मेरा बड़ा सम्मान हुआ है। कई लोग आकर मिलते हैं, बड़ी खुशमिजाजी से मेरे लिखे पर बात करते हैं। लेकिन अभी भी मेरी बहुत सी महत्वपूर्ण कहानियों का हिन्दी में अनुवाद नहीं हुआ है। इस काम में साहित्य में जरा कम ही रुचि है।
आपकी कहानियों का फ़िल्म रूपांतर भी हुआ है। कुछ फिल्में बांग्ला में और कुछ हिन्दी में बनी है। भिन्न माध्यमों में आपकी अभिव्यक्ति को आप कैसा आँकती हैं?
हिन्दी में आप जानते ही होंगे 'संघर्ष', 'गुड़िया, ''रुदाली' और 'हजार चौरासी की माँ मैं बताना चाहूँगी कि 'रूदाली' और 'गुडिया' के डायरेक्टर ने मुझे इसके शो में नहीं बुलाया। 'रूदाली' मैंने कैसेट में देखी। मुझे यह पसंद नहीं आई। लेकिन उषा गांगुली ने अपनी 'रंगकर्मी संस्था' में 'रूदाली' का जो मंचन किया, वह मुझे बहुत अच्छा लगा। 'संघर्ष' 1967 में दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला, बलराज साहनी ने मिलकर बनाई थी। यह फ़िल्म काफ़ी पसंद की गई थी। बंगला में कोपम्बू बनी है। बहुत कम फ़िल्में हैं। मेरा अनुभव ये है कि फ़िल्म की तुलना में नाटक अधिक ताक़तवर विधा है। उसमें जीवंतता अधिक है। हालाँकि हर माध्यम की अपनी भाषा होती है।
बुद्धिजीवियों ने आपके लेखन को मार्क्सवादी विचारधारा से संपृक्त बताया। आपकी ख़ुद अपने बारे में क्या राय है?
देखिए मैंने न लेनिन की थ्योरी पढो, न मार्क्स की। मैं किसी वामपंथी दल की सदस्य भी नहीं हूँ। किसी को मेरे काम में मार्क्सवादी विचारधारा नजर आई, यह उनकी निजी राय है। मेरा मुख्य लक्ष्य आदिवासियों के हक में लिखना और काम करना है।
वर्तमान में आपके परिवार के अन्य लोगों की क्या सर्जनात्मक पहचान है?
आपने नाम सुना होगा ऋत्विक घटक का। फिल्मकार संगीतकार। वो मेरे चाचा हैं। मेरा एक ही लड़का है नवारुण भट्टाचार्य जिसको बंगला साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी मिला है। उसकी पत्नी शिक्षिका है। पोता मेरा अभी कॉलेज में पढ़ रहा है।
मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के एक गाँव में कुछ दिनों पहले एक महिला कुटुबाई सती हो गई.. ।
मुझे मालूम है। इस तरह की और भी घटनाएं होती रहती हैं। ऐसा क्यों हुआ इस बारे में पूरे समाजशास्त्रीय अध्ययन की ज़रूरत है। एक विधवा का गाँव में अकेले जीना बड़ा ही दुश्वार है। यहाँ के मुख्यमंत्री ने ठीक किया गाँव वालों के खिलाफ़ ।
अपना काम करते हुए आपको औरत के रूप में कभी किसी विरोध का सामना करना पड़ा?
तकलीफ़ें तो दूसरी क़िस्म की ज़्यादा आई मसलन आर्थिक, पारिवारिक। एक समय जब पैसे की बहुत जरूरत थी और काम बहुत कम था, तब एक व्यक्ति ने कहा था-" देखता हूँ कैसे लिखती हो?" मैंने बता दिया कि लिखना छोडूंगी नहीं। वह मेरी पूँजी है। सबका सहयोग, विश्वास आगे बढ़ाता रहा।
विश्व ग्राम का सपना और उसके साथ बाजारवाद की अवधारणा आपको कैसी लगती है?
मैं शुरू से ही इन दोनों के ख़िलाफ़ रही हूँ। एक दिन हमारी पूरी संस्कृति को नष्ट कर देगा यह भूमंडलीकरण और बाजार सब कुछ बाजार में बदलता जा रहा है। हमारी अपनी मौलिकता की रक्षा तो करनी पड़ेगी। पहले हम अपने देश को तो समझ लें।

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