भारत रत्न सुब्बलक्ष्मी ने बापू को सुनाई थी ‘राम धुन’ - विनय उपाध्याय
भारत रत्न सुब्बलक्ष्मी ने बापू को
सुनाई थी ‘राम धुन’
-विनय उपाध्याय
बहुत कम लोग जानते हैं कि महात्मा
गाँधी भारत रत्न से सम्मानित प्रख्यात गायिका सुब्बलक्ष्मी से अपना प्रिय भजन ‘हरि तुम हरो जन की
पीर’ सुनना चाहते थे. सन् 1947 में
मुंबई में प्रार्थना सभा में जब उनके आग्रह पर सुब्बलक्ष्मी ने ‘राम धुन’ सुनाई तो सरोजिनी नायडू ने अपनी ‘भारत कोकिला’ उपाधि उन्हें प्रदान कर दी थी.
संगीत की शक्ति पर बापू को अटूट भरोसा था. वे संगीत को कामधेनु कहते थे. उनका मानना था कि अमन, एकता और आपसदारी का सच्चा और सनातन संदेश सात सुरों की सोहबत में बड़ी ही सहजता से प्राप्त किया जा सकता है और इसके लिए संगीत का संत साहित्य से रिश्ता जोड़ा जाना ज़रूरी है.
गांधीजी की प्रार्थना सभाओं और प्रभात फेरियों में सुबह-शाम सामूहिक रूप से भक्ति संगीत गाया जाता था. ये वे भक्ति पद थे जिनका इस्तेमाल स्वाधीनता आंदोलन के दौरान शांति, समरसता, शुचिता और आंतरिक मनोबल बनाए रखने के लिए उन्होंने किया. प्रसंगवश यह जानना जरूरी है कि 1904 में हिन्दुस्तानी संगीत के आधुनिक पुरोधा पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने महात्मा गांधी के स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया था और कई सभाओं में उन्होंने रामधुन ‘रघुपति राघव राजा राम’ गाकर लोक की आत्मा में स्वाभिमान का आलोक बिखेरा.
1915 में जब बापू ने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की तो उन्होंने पलुस्कर जी से निवेदन किया कि वे किसी कुशल शिष्य को आश्रम में रहकर प्रार्थना सभाओं के लिए सरल-सहज धुनें तैयार करने का कार्य सौंपे. तब नारायण मोरेश्वर खरे नामक एक शिष्य ने चार सौ भजनों को संगीतबद्ध किया जिसे बाद में राग-ताल विवरण के सहित अहमदाबाद के नवजीवन प्रकाशन मंदिर ने ‘आश्रम भजनावलि’ में प्रकाशित किया.
इसी लघु पुस्तिका में संग्रहित भक्त नरसिंह का भजन ‘वैष्णवजन तो तेने कहिए’ बापू को सर्वाधिक
प्रिय था जो बाद में दांडी यात्रा सहित गांधीजी के अनेक प्रयासों में प्रार्थना
संगीत की अनिवार्य और कालजयी रचना सिद्ध हुई. बहुत कम लोग जानते हैं कि महात्मा
गाँधी भारत रत्न से सम्मानित प्रख्यात गायिका सुब्बलक्ष्मी से अपना प्रिय भजन ‘हरि तुम हरो जन की पीर’ सुनना चाहते थे. सन् 1947
में मुंबई में प्रार्थना सभा में जब उनके आग्रह पर सुब्बलक्ष्मी
ने ‘राम धुन’ सुनाई तो सरोजिनी
नायडू ने अपनी ‘भारत कोकिला’ उपाधि
उन्हें प्रदान कर दी थी.
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