संगीत मेरी रूह में घुल-मिल गया - पं. शिव कुमार शर्मा

 संगीत मेरी रूह में घुल-मिल गया

पं. शिवकुमार शर्मा से विनय उपाध्याय की बातचीत के कुछ अंश 


कोई दैवीय शक्ति है जो मेरी सहायता करती है। मंच पर आकर जब मैं बैठता हूँ, मुझे ख़ुद विश्वास नहीं होता कि बीस मिनट पहले जो मेरो चेतना थी वो कहाँ चली गयी! मैं कैसे बजा पा रहा हूँ ! मज़े की बात यह है कि जब सभा समाप्त होती है, मैं फिर उसी स्थिति में चला जाता हूँ। साज़ उठाने की भी ताक़त नहीं। ये क्या चीज़ है?.... ये साधना है।





पण्डित जी, मध्यप्रदेश वह राज्य है जहाँ संगीत का सुनहरा, सुदीर्घ अतीत रहा है। तानसेन से लेकर उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब, पंडित कुमार गन्धर्व, अलाउद्दीन ख़ाँ साहब और असगरी बाई की तपोभूमि रहा है यह राज्य और ग्वालियर तो एक पूरा का पूरा गढ़ ही है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की वो गंगोत्री माना जाता है। मध्यप्रदेश से आपका सांगीतिक रिश्ता कब और कैसे बना? इस राज्य की सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी आपके ज़हन में होंगी ही।

देखिए, साल तो मुझे याद नहीं लेकिन वर्षों हो गये, कई दशक हो गये मध्यप्रदेश में आते हुए। अभी उमाकान्त जी, रमाकान्त जी हम सब बात कर रहे थे कि यहाँ भारत भवन पूरे भारतवर्ष में अपनी तरह का एक इंस्टीट्यूट ऐसा बनाया गया जिसमें बहुत बढ़िया काम हुआ है। बहुत सोच-विचार कर इसको बनाया गया। मुझे ख़ुशी इस बात की है कि इसकी अपनी एक स्वतंत्रता बनी हुई है जो बहुत ज़रूरी है और उसको बनाये रखना भी बहुत ज़रूरी है। जो फ़ैसले यहाँ होते हैं, जो काम हो रहा है, सब बहुत ही ख़ूबसूरत ।

मैं पूरे मध्यप्रदेश में घूमा हूँ कई प्रोग्राम हम लोगों ने ऐसी जगहों पर किये जहाँ ट्राइबल लोग रहते हैं। झाबुआ और ऐसी कई आदिवासी जगहों पर जाकर वहाँ भी कार्यक्रम दिए। मुझे असल में याद नहीं कि कौन-से साल पहली मर्तबा आया था, लेकिन एक ही बात मुझे खलती है कि मैहर में नहीं जा पाया हूँ कुछ सालों से बहुत साल पहले गया था। बाबा अलाउद्दीन खाँ साहब की वो धरती है, वहाँ उन्होंने इतना समय बिताया, लेकिन मेरी ही कुछ मजबूरियाँ ऐसी हैं कि मैं आजकल ट्रेवल कम करता हूँ और ऐसी जगह ट्रेवल करता हूँ जहाँ फ्लाइट वगैरह हो।

अभी भी बात चल रही थी, कुछ महीने पहले, उधर जाने की। मेरी बहुत इच्छा है। किसी न किसी तरीके से वहाँ पर भी मेरा जाना हो। लेकिन मध्यप्रदेश में और जो श्रोता भोपाल में बने हैं वह उपलब्धि हैं। कल भी मैं ज़िक्र कर रहा था कि हरेक को संगीत समझने की ज़रूरत नहीं है, महसूस करने की ज़रूरत है। वो महसूस करने वाले यहाँ बन चुके हैं और बनते रहेंगे और मेरी यही दुआ है कि ये काम यहाँ पर होता रहे।


पंडित जी के साथ विनय उपाध्याय 



मध्यप्रदेश को लेकर आपका इस तरह एक रूहानी रिश्ता बना। इस प्रदेश के ही कुछ युवा संगीतकार बतौर शिष्य आपसे जुड़े। आपको गुरू के रूप में पाना उनका ही सौभाग्य रहा। आप अपने शिष्यों की तरफ जब देखते हैं तो आपको कैसा लगता है? क्या वो विरासत जो आपने अपने पिता से पायी कश्मीर की वादियों में शताब्दियों से जो स्वर लहराते थे, जिनको आत्मसात कर आपने नवाचार किया। संतूर को नयी पहचान दी। शास्त्रीय संगीत में उसे स्थापित किया। आपके शिष्यों को लेकर आपके मन में उत्तराधिकार के प्रति क्या आशा उपजती है?

मैं कुछ भी कहूँ कि मेरा शिष्य कमाल है या नाकमाल है, उससे कुछ नहीं होता। हर एक को साबित करना पड़ता है। एक शख़्स के कहने से, मैं यहाँ आकर यह कह दूँ कि साहब में दुनिया का सबसे बड़ा कलाकार हूँ, महामूर्खता होगी। मैं यह कह दूँ कि संतूर मेरे यहाँ खत्म हो गया, उसके बाद नहीं है, बहुत ही मूर्खतापूर्ण वक्तव्य होगा।

संगीत ऐसा काम है कि कोई एक शख़्स या एक घराना या एक फैमिली उसका फ़ैसला नहीं कर सकती। आपको कई लोगों को साबित करना पड़ता है। जो संगीतकार हैं, पहले बो आपको मानें और अभी अनफच्यूनेटली इतने म्युजिक क्रिटिक नहीं रहे, जो संगीत को समझे हुए हैं वो आपको मानें, आम जनता आपको मानें, हर तरह का व्यक्ति आपके संगीत को मानें तब प्रमाणित होता है। मेरे कहने से नहीं होता कि ये मेरा सबसे बड़ा शिष्य है। हर शिष्य को अपने आपको साबित करना पड़ता है। एक बात मैं कह सकता हूँ कि जब मैं अपने शिष्यों को सिखाता हूँ, उस समय भी मैं कुछ सीखता हूँ। सिखाने की लिमिट है, सीखने की कोई लिमिट नहीं है।






'सुनता है गुरुज्ञानी'- साक्षात्कारों पर केन्द्रित एक किताब पिछले दिनों गुन्देचा बन्धुओं के सम्पादन में प्रकाशित हुई है। एक इन्टरव्यू पंडित जी आपका भी उसमें संग्रहित है। बहुत सारे सवाल उन्होंने उसमें पंडित जी से किये हैं, लेकिन संयोगवश उसी प्रश्नाकुलता के साथ आज फिर उमाकान्त - रमाकांत भैया उपस्थित हैं। उमाकांत जी की एक जिज्ञासा है - एक बहुत सादा प्रश्न है कि प्रेक्टिस और परफॉर्मेन्स इन दोनों के बीच में क्या अन्तर है और क्या सम्बन्ध है?

बहुत सुन्दर! Practice and performance should not be mixed प्रेक्टिस एक अलग चीज़ है। Learing process totally different subject matter, but also through learning process you are preparing to become a performer. Certain things you have to, what we call Sadhana, उसको बार-बार रियाज़ करना है। And if that practice is done in the presence of Guru it is easier. Because if you are practicing alone still you have to go to your Guru and share what did you do and ask the Guru, request the Guru to give you guidance.

और, प्रेक्टिस कैसी होना चाहिए, पहले यह मालूम होना चाहिए। इसको थोड़ा-सा जो मैंने समझा है- There is no fixed formula for practice. We have heard so many stories, दस-दस, बारह-बारह, पन्द्रह-पन्द्रह घंटे लोग रियाज करते थे, तभी बात बनती थी। I think, it's can not be generalised. Each individual has got different receptivity, different sensitivity, different standard of perception, different framework and capacity to sit and concentrate.

तो एक फार्मूला फिक्स नहीं किया जा सकता कि दस घंटे ही रियाज करेंगे तो होगा। ये मेरा पर्सनल तजुर्बा है। कई शिष्य मेरे पास ऐसे आते थे, आते हैं, कि दस दिन तक एक बात समझा रहे हैं उनको समझ में नहीं आ रही है और कोई ऐसे भी थे कि डेढ़ घंटे में उनकी समझ में आ गया।

The person who has got the capacity, who has got the gift, who has got the talent to pick-up very fast, because that particular individual has brought something from previous life. I not only believe in that I have experienced it thoroughly. So that person should be given guidance according to his or her receptivity. प्रेक्टिस पहले बहुत लाज़िमी है, बहुत जरूरी है।

कई आर्टिस्टों को मैं सुनता हूँ वो स्टेज पर बैठकर भी प्रेक्टिस करने लगते हैं। ऐसा लगता है कि वहाँ भी रियाज कर रहे हैं। Stage is one place where you have to give finished product. रिपीटेटिव चीजें वहाँ पर नहीं होना चाहिए। स्टेज पर ज्यादा बात करने की जरूरत नहीं होती। कई लोग श्रोताओं के ऊपर ये प्रभाव डालना चाहते हैं कि देखिए your साहब, कितनी मुश्किल है। हमने पच्चीस साल रियाल किया है फिर से बनी है।

एक मर्तबा मैं एक प्रोग्राम सुन रहा था और वह कलाकार साहब गा रहे थे, उन्होंने पहले कहा, देखिए इस तान को सुनिये। उन्होंने एक तान ली, उस पर बहुत क्लैपिंग हो गयी। उन्होंने कहा कि ये तान सही ढंग से नहीं गायी थी जो मैंने गाई है, अभी गाऊँगा और जो दुबारा ली उस पर बिल्कुल क्लैपिंग नहीं हुई, जिसको उन्होंने सही कहा। ये सब बातें स्टेज पर कहने की जरूरत नहीं होती।

जब आप परफॉर्म कर रहे हैं- You are giving your finished product what you have learnt from your Guru, what you have assimilated and what you have understood and for which you are totally confident. जब तक आप कॉन्फिडेन्ट नहीं हैं, उस चीज को स्टेज पर परफॉर्म मत करिये।

मैंने कई वर्षों तक राग भूप स्टेज पर नहीं बजाया, मारवा नहीं बजाया। I was not sure, I would do justice to it. उस तरीके से मैं प्रेक्टिस और परफॉर्मेन्स को सोचता हूँ। बहुत लम्बी बात भी हो सकती है, संक्षिप्त में यही कह सकता हूँ।







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