जीवन का अध्यात्म गाया गीतों में - गोपालदास 'नीरज'
जीवन का अध्यात्म गाया गीतों में
गोपालदास 'नीरज' से विनय उपाध्याय की बातचीत
चित्र - गूगल से साभार
आधी शताब्दी से भी ज्यादा वक्त गुजर गया। गीत की वल्गा श्रामे आप उम्र का सफ़र तय करते रहे हैं। गीत के बदलते तेवर और नए कूल-किनारों को लेकर आपकी प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है। क्या कहना है आपका?
संसार में कोई चीज़ स्थिर नहीं है। परिवर्तनशील दुनिया है। हर चीज चल रही है यहाँ पर। अगर चले नहीं तो विकास का क्रम ही अवरूद्ध हो जायेगा। गीत ने भी कितने ही रूप बदले। कभी वह छायावादी गीत के रूप में रहा, कभी प्रगतिवादी गीत के रुप में रहा, कभी प्रयोगवादी। उसके बाद जनवादी अब गीत के स्थान पर नवगीत भी आ गया और फिर अगीत भी तरह-तरह के गीत के स्वरूप बदलते चले गये। वे क्यों बदलते चले जाते हैं? संसार बदलता है तो परिवेश बदलता है। परिवेश के साथ-साथ आदमी की विचारधारा, उसकी चिन्तन पद्धति सब कुछ बदल जाती है।
इन परिवर्तनों के बीच चित्रपट के गीत को आप कैसा पाते हैं?
फ़िल्मी गीत मेरी नजर में लोकगीत जैसा है। फ़िल्म के गीत को आप सस्ता तो कहते। हो पर है वह लोकगीत। क्योंकि जितने प्रकार की परिस्थितियाँ आती हैं फिल्म में उन सबमें लिखना हर साहित्यकार के वश की बात नहीं है। आपको मंदिर का गीत लिखना है, तो कोठे का भी गीत लिखना पड़ेगा। आपको जोकर का भी गीत लिखना पड़ेगा और उसको लिखने के लिए उसी स्तर पर आपको उतरना पड़ेगा। फिल्म के गीत को लोग नकारते हैं तो स्वीकारते भी हैं। आज फ़िल्मी गीतों का स्तर गिर रहा है तो उसके लिए दोषी हैं निर्देशक और उसके प्रोड्यूसर और एक हद तक संगीतकार भी। क्योंकि इनके द्वारा गीतकार को कहा जा रहा है कि ऐसा लिखो भाई। वह अगर वैसा न लिख सका तो दूसरे से लिखवा लेंगे। तो गीतकार को जैसा निर्देश दिया जायेगा वैसा वह लिखेगा और उसको लिखने के लिए उसे उस स्तर पर भी उतरना पड़ता है जहाँ पर 'चना जोर गरम' वाले भी बैठे हैं। पहले गंभीर गीत पढ़ा जाता था, सुना जाता था और बड़े प्रेम से छापा जाता था। अब गीत का स्वरूप किताबों से निकलकर समाज के पास पहुँच गया। कवि सम्मेलन उसका बहुत बड़ा माध्यम है। क्योंकि पैसा उससे मिलता है। तो भीड़ के पास तो बुद्धि नहीं होती। भीड़ में आदमी का व्यक्तित्व खो जाता है।
लेकिन नीरज जी, आपको सुनने के लिए हजारों-लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठा होती रही है?
पहले जैसी बात तो खैर अब नहीं रही। देखिये क्या होता है कि पहले जो हमको भीड़ नवाजती थी उसमें एक लाख में पचास हज़ार आदमी समझदार हुआ करते थे लेकिन अब पचास हजार की भीड़ में मुश्किल से पाँच हज़ार आदमी समझदार मिलेंगे। और वो जो पाँच हजार हमारे पुराने सुनने वाले लोग हैं। वही हमारे प्रेमी बने हुए हैं। अब नयी जनरेशन से अगर आप पूछोगे कि नीरज कौन है तो उनको नीरज से कोई मतलब नहीं है। अमरीका में गया। वहाँ हमारे सुनने वाले बहुत से थे लेकिन हमारा ही भतीजा वहाँ हमें ठीक से जानता नहीं।
चरित्रहीनता के इस दौर में नीरज ने खुद को कैसे सम्हाल कर रखा? दो-तीन चीजें हैं जिनके कारण आज भी मैं अपनी लोकप्रियता कायम किये हुए हैं।
एवरेस्ट पर चढ़ जाना बहुत आसान बात है, वहाँ खड़ा रहना बहुत मुश्किल बात है। ऊँचाई पर ज्यादा देर तक खड़ा नहीं रह सकता आदमी लेकिन सौभाग्य है कि मैं खड़ा हुआ हूँ आ तक उसका कारण एक तो मेरी भाषा है। वह ऐसी भाषा है जो समझदार को भी आनन्द देती है और नासमझदार को भी जब चले जायेंगे हम लौट के सावन की तरह, याद आयेंगे प्रथम प्यार के चुंबन की तरह। अब यह पंक्ति नीचे वाली नई जनरेशन को बहुत अच्छी लगेगी। तो मेरी भाषा का सौन्दर्य उर्दू वाले भी पसन्द करते हैं। मुझसे उर्दू के कई नये लेखक अपना किताबों की भूमिका लिखवाते हैं। तो मेरी भाषा जो हैं हिन्दी में भी चलती है, उर्दू में भी चलती हैं। क्योंकि मैंने भाषा को वह संस्कार दिया है जो कि आम जन की भाषा है। दूसरों चीज़ क्या है कि मैंने सामान्य जीवन के प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कही है और उस मुहावरे का प्रयोग किया है, जो तुरन्त आपके होंठों पर बैठ जाये। “कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।'' यह क्यों लोकप्रिय हुआ? पहली बार हिन्दी भाषा में ही फ्रेज आया था। पहली बार जब मैंने 1955 में इसको पढ़ा था लखनऊ रेडियो से तब सारे देश में हिन्दी के कवि सम्मेलन सुने जाते थे। तो वह पाकिस्तान तक पहुँच गया। मैं जहाँ जहाँ गया विदेश में, लोगों ने कहा कि साहब 'कारवाँ गुजर गया' सुनाईये, अमरीका गया तो वहाँ 'कारवाँ गुज़र गया। की फ़रमाइश, कनाडा गया तो वहाँ भी यह फरमाइश... उर्दू वालों के पास भी फ्रेज नहीं उसक था। आज भी उर्दू वाले उस फ्रेज़ को याद करते हैं।
नीरज जी, विषय आपके गीतों के चाहे जो भी रहे हों पर रुमानी बिम्बों का इस्तेमाल उनमें जैसे अनिवार्य रहा है आपके लिए। ऐसा क्यों?
करुणा मेरे गीत का मूल तत्व है। अब करुणा से मतलब क्या है? करुणा मनुष्य का सबसे बड़ा दैवीय गुण है। प्रेम दैवीय गुण नहीं है। क्योंकि प्रेम में क्या होता है कि मैं आपसे प्रेम करती हूँ तो आप भी मुझसे प्रेम करें। है न । आदान-प्रदान की बात होती है लेकिन करुणा जिस पर आप करते हैं उससे कभी आप अपेक्षा ही नहीं करते। रास्ते में दस आदमी विकलांग पड़े हैं तो सबसे ज़्यादा जो विकलांग होगा उस पर आपकी करुणा जागृत होगी और आप उससे यह अपेक्षा तो नहीं करेंगे कि मैं उससे कुछ प्राप्त करूँ। तो करुणा मनुष्य के पास वह दैवीय गुण है जो दूसरे के पास अहैतुक भाव से आपको ले जाता है। बुद्ध ने करुणा को सबसे नया बड़ा तत्व माना है।
"मैंने तो चाहा बहुत कि अपने घर में रहूँ अकेला पर/सुख ने दरवाजा बंद किया दुःख ने दरवाज़ा खोल दिया"।
मैंने हमेशा शाश्वत मूल्यों की बात की गीत के माध्यम से। लेकिन उनके लिए प्रतीक जो चुने, धुनें जो चुनीं वो रोमांटिक चुनीं क्योंकि अध्यात्म और दर्शन भी नीरज के विषय हैं, उसको सरस कैसे किया जाय। जिस प्रकार से पारस को छूकर लोहा सोना बना जाता है उसी प्रकार से रुमानी बिम्ब का स्पर्श पाकर नीरस दर्शन सरस हो जाता है। अब जैसे मैं कह रहा हूँ- "आज जी भर देख लो तुम चाँद को, क्या पता ये रात फिर आये न आये।" लग रहा है कि सारी बात रोमांस की है लेकिन आगे जाकर "ये सितारों से जुड़ा नीलम नगर/बस तमाशा है सुबह की धूप का और ये बड़ा-सा मुस्कुराता चन्द्रमा एक दाना है समय के सूप का क्या पता कल साँस के सुरकार हो न हों/साज ये आवाज़ भाये न भाये/ आज जी भर देख लो तुम चाँद को, क्या पता ये रात फिर आये न आये/स्वप्न नयना इस क्वारी नींद का, कौन जाने कल सवेरा हो न हो।" स्वप्न नयना, स्वप्न देने वाली, क्या कहना, नेत्र ही इसके स्वप्नों के हैं। ये जीवन क्या है, जिसका आदमी जागते हुए भी सपने देख रहा है, आँख बन्द करके भी सपने देख रहा है। इसलिए कहा है कि सपनों के नेत्र बने हैं इसके। और यह नींद कैसी है, कुमारी है। कभी किसी की हुई नहीं। ज़िन्दगी कभी किसी की पूरी होती है? सारा अध्यात्म है लेकिन कैसे सुन्दर ढंग से कहा गया है। ये कला किसी के पास नहीं थी गीत में मैंने गीत में जीवन का अध्यात्म गाया है।
क्या आप मानते हैं कि नई कविता की तुलना में नए विचार को साधने में गीत असफल रहा है?
देखिये गीत का स्वरूप बदल गया है। नई कविता ने बौद्धिक धरातल को अंगीकार ज़रूर किया लेकिन याद रखना कभी भी कविता किताब में जीवित नहीं रही। नयी कविता वाले कवि सब किताब में सीमित हो जायेंगे, लाइब्रेरी में बंद हो जायेंगे। समाज के पास कभी नहीं पहुँच पायेंगे। क्यों? हमेशा कविता छन्द में पहुँची है होंठ तक। इतना लिखा जा रहा है संसार में कितना समय है पढ़ने के लिए आपके पास कल वह समय आयेगा कि जो आदमी होंठ पर बैठा होगा वह आदमी जीवित रह जायेगा बस।
आज भी प्रकाशक नीरज से बार-बार माँग रहे हैं किताब
1955 से मुझे छाप रहे हैं। मुझे लाखों की रॉयल्टी मिल चुकी है। आज देने के लिए मेरे पास 'कुछ' नहीं है प्रकाशक को और वे कहते हैं कि साहब कुछ छापने को दो। हमने तो आज तक कभी सोचा ही नहीं कि पैसा देकर भी किताब छपाई जाती है। ज्योतिष में लिख दें वह छापने को तैयार हैं, दोहा लिख दें वह छापने को तैयार हैं, कविता लिख दें वह छापने तैयार। हमारी एक-एक पंक्ति छप गयी। पहले आप अपना रीडर तय करिये। नई कविता ने क्या हुआ कि कविता के प्रति जो लोकप्रियता बनी थी, उसको ख़त्म कर दिया।
भारत की संस्कृति रही है कि यहाँ हर चीज गाई जाती है। वेद की ऋचाएँ भी गायी गयी हैं। उपनिषद् भी गाया, रामायण भी गायी गयी और तो और ज्योतिष भी छन्द में लिखा गया। वह क्यों? छन्द की प्रकृति क्या है? इस देश में नदी गाती है, इस देश में बाँध गाते हैं, पक्षी गाते हैं, पेड़ गाते हैं, पौधे गाते हैं, सब कुछ गाता है यहाँ कोई चीज ऐसी नहीं है। क्योंकि यह सौन्दर्य का देश है। नदी चलती है वह गाती है। फिर दूसरी चीज़ लय जो है, वह प्राणतत्व का मूलाधार है, समय, सृष्टि, समाज का सारी सृष्टि लय पर घूमती है याद रखियेगा। धरती एक लय में परिक्रमा करती है। आकाश के ग्रह-नक्षत्र एक लय में परिक्रमा कर रहे हैं। नदी एक लय में चलती है, हवा एक लय में चलती है। तुम्हारी पलक एक लय में झपकती है। ऋतुएँ एक लय में चल रही हैं। शरीर के अंदर जो खून बह रहा है वह भी एक लय में चलता है। हृदय जो धड़कता है वह भी एक लय में चलता है। तो लय का हमारे जीवन के मिलान हो जाता है।
नई कविता ने जो धरातल दिया, छन्द उन चीजों को पकड़कर क्यों नहीं बढ़ा?
नहीं, हर विषय कविता का विषय नहीं होता मित्र याद रखना। अब आज विज्ञान के कहो कि तुम गीत में लिखो तो कविता का वह विषय नहीं है। गद्य का विषय है यह गद्य में बात करिये इस पर आप इस पर आलेख लिखिये। कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि हर चीज़ को कविता में लिख दो। गीत की भी अपनी सीमाएं हैं।
भारत नायकों का देश रहा है। क्या एक राष्ट्रनायक आज आवश्यकता महसूस करते हैं आप?
आज इतने खलनायक हैं तो नायक कहाँ से आयेगा? नायक की आवश्यकता तो है ही जिस दिन नायक मिल जायेगा उस दिन देश का वह उन्नायक बन जायेगा।
नीरज जी, शब्द और कर्म की बहुत दूरी हो गयी है। आचरण में सब कुछ नदारद है। ऐसा क्यों?
आप कालगणना करते हुए देखें तो राम का काल कौन-सा है? इसमें ज्ञान का प्राधान्न है। वो लोग राजाओं के पास नहीं आते, वे ख़ुद रहते हैं जंगलों में। तपोवनों में रहते हैं और राजा उनसे जाकर मन्त्रणा करते हैं और वे बिल्कुल अहैतुक भाव से उनको समझाते हैं। जो बात कहते हैं, उनकी बात मानी जाती है। यानी ज्ञान का प्राधान्य था राम के काल में। वह ह युग था यानी मन, वचन, कर्म तीनों एक थे। त्रयी का मतलब तीनों एक। अब उसके बाद आता है द्वापर। द्वापर में डबल पर्सनालिटी थी। ज्ञानी राजा का नौकर हो गया है। द्रोपदी नग्न की जा रही है, बड़े-बड़े भीष्म पितामाह, द्रोणाचार्य सब शान्त बैठे हैं। बोले, आज का ध तो यह ही हैं। अब ज्ञान के प्राधान्य के साथ-साथ दूसरा प्राधान्य किसका हुआ? शक्ति का प्राधान्य हो गया। ज्ञानी तो नीचे नौकर बन गया। संसार में दो माताएँ सुनी होंगी पर दो बार नहीं सुने होंगे। उसके बाद कलियुग । देयर आर नो पर्सनालिटी। आपका एक चेहरा नहीं है।
पर हमें आशावान तो रहना चाहिए?
यह आशा नहीं, यह प्रोसेस है। दिस इज ए नेचुरल प्रोसेस। ईश्वर का कन्सेप्शन बदल रहा है। मैं कहता हूँ..." कहते जिसे ख़ुदा वो दिमागों का ख़लल है। जैसे कि नहीं हो के भी सेहराओं में जल है।" तो अब शब्द का अनुवाद तो होगा लेकिन हम और आप शायद उसको देखने को जीवित नहीं रहेंगे क्योंकि परिवर्तन लेने में समय की गति बहुत धीमी होती है। आज देखो, समय कहाँ चला? वी स्टार्टेड फ्रॉम बारबरिक स्टेट जहाँ आदमी, आदमी को खाता था। वह एक एनीमल स्टेट कहलाती थी। वह कालचक्र वहाँ से गणना हम करते हैं। वह घूमते-घूमते-घूमते ... क्योंकि चक्र चल रहा है, वह उसी प्वाइंट पर पहुँच रहा है। जहाँ से शुरू हुआ था इसलिए आदमी, आदमी को मारने में संकोच नहीं करता। रोज अख़बार में पढ़ते हैं कि इतने मारे कोई संवेदना नहीं होती। मोहल्ले में कोई मर जाये, आपके घर में खाना बनता रहेगा, टीवी बजती रहेगी कोई संवेदना नहीं होती। यानी आदमी इतन संवेदनहीन हो गया। लेकिन इस संवेदनहीनता से एक दिन खुद घुटेगा वह । आज मैं आपको बुरा कहता हूँ और आप मुझे बुरा कहते हैं। लेकिन नहीं। प्रोसेस बदलेगा। जिस दिन आदमी अपने को बुरा कहना शुरू कर देगा... बस उसी दिन से चेंज हो जायेगा।
हम फिर गीत पर केन्द्रित होते हैं... आपकी गीत यात्रा पर आपने कहा है कि फ़िल्मों में तो कोठे का गीत भी लिखना पड़ता है और मंदिर का भी यह कूवत आपमें तो हमने ख़ूब देखी कि 'प्रेम पुजारी में भी आपने लिखा और 'मेरा नाम जोकर' में भी आपके गीत रहे। दोनों में अलहदा तेवर फ़िल्मों से आपने अपने को बाद में क्यों अलग कर दिया?
अभी नहीं, मुझे छोड़े बहुत दिन हो गये। 73 में सिनेमा छोड़कर आ गया हूँ। कारण यह था कि एक तो जिन म्यूजिक डायरेक्टर्स के साथ मैं हिट हुआ था वो एक-एक करके सब चले गये इस दुनिया से जैसे रोशन के साथ मेरे हिट हुए थे सारे गीत उसी की वजह से मेरी पहचान बनी थी फ़िल्म में फ़िल्म संसार में मेरी पहचान तो 'नयी उमर की नयी फसल' के एक गीत से हुई थी। उसके बाद शंकर जयकिशन के साथ जुड़ा। जयकिशन की डेथ हो गयी। वह ग्रुप टूट गया। उसके बाद एस. डी. बर्मन से जुड़ा, वो भी बीमार रहने लगे। मदन मोहन से जुड़ा, वो भी बीमार रहने लगे। अब क्या है जो बड़े-बड़े संगीतकार थे जिनसे मैं जुड़ा वे चले गये। हर गीतकार का, संगीतकार का फ़िल्म में अपना एक जोड़ा होता है। अब में टैगोर भी बन जाता तो दूसरा आदमी मुझे नहीं लेता। यह समझने की बात है। अब जैसे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने आनन्द बख्शी और मजरूह को छोड़ किसी और को नहीं लिया। चाहे जितने बड़े होशियार आये तो कहने का मतलब यह है कि जब आपके संगीतकार चले गये तो ग्रुप टूट गया और जब ग्रुप टूट गया तो मैं क्या करूँ वहाँ पर? क्या मैं माँगता? और जब माँगने गये तो ख़त्म आपकी लाइफ मुझे बड़ी आशा थी 'जोकर' से। इट वाज ए टर्निंग प्वाइंट ऑफ फ़िल्म। यह लिखना बड़ी चुनौती थी मेरे लिए गीत, ग़ज़ल सब छोड़ कर ब्लेंक वर्स लिखी। और ब्लेंक वर्स हिट हो गयी। यह आसान बात नहीं थी। फिर मैंने ही कन्सेप्शन बनाया था,
मैंने ही ट्यून बनायी थी। शंकर-जयकिशन ने नहीं। ब्लैकवर्स के बारे में कृपया स्पष्ट करें?
देखो, गीत बने पहले, ग़ज़ल बनी, कव्वाली, दोहा बने, धनाक्षरी बनी, रामायण बनी, चौपाई बनी, सब कुछ बने लेकिन ब्लेंक वर्स नहीं बनी थी क्या था कि राजकपूर ने मुझे बुलाया। छुट्टी लेकर गया कॉलेज से तो बोले- यार, जोकर पर गीत लिखना है। मैंने कहा कि क्या कह रहे हैं? जोकर पर गीत लिखवा रहे हैं? जोकर पर गीत लिखा जाएगा और जोकर गायेगा तो गवैया हो जायेगा। जोकर का कैरेक्टर मर जायेगा। राजकपूर बोले कि बात तो सही कह रहे हो। लेकिन मुझे तो गाना है और मुझे जोकर की एक्टिंग करना है। मैंने कहा कि बताईये कुछ आप बोले-मुझे कुछ नहीं मालूम। अब आप जानो आपका काम जाने। अब दो तीन दिन तक सोचते रहे, सोचते रहे। हम परेशान थे। रात के तीन बजे खाना खाते थे और रात भर शराब पीते थे। बैठे-बैठे हमने कहा कि राज साहब, एक बात दिमाग में आ रही है ऐसा फॉर्म बनाया जाये कि जोकर गाये तो लगे कि जोकर गा नहीं रहा। बातचीत कर रहा है और बातचीत में ही गाना हो जाये। बोले-हाँ यार, यह ठीक है। फिर मैंने यह पंक्ति सुनायी "ऐ भाई जरा देख के चलो.. राज बोले अबे ठीक है यार, यही सही। “ए भाई जरा देख के चलो.... आगे ही नहीं, पीछे भी, दाएँ ही नहीं बायें भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी, ऐ भाई जरा देख के चलो। तू जहाँ आया है वो तेरा घर नहीं, गली नहीं, गाँव नहीं, कूँचा नहीं, बस्ती नहीं, रास्ता नहीं, ये दुनिया है और प्यारे, दुनिया एक सर्कस है।" राजकपूर बोले- यार, सर्कस में डाल दो। सर्कस को पूरा मेटाफर मिल गया भाई। सारा एटमॉस्फियर है उसमें तो वह गीत तैयार कर दिया मैंने। मैंने अपनी धुन में गा के बना भी दिया उसको। फिर शंकर- जयकिशन के पास लेके मुझे गये वो शंकर-जयकिशन बोले कि एक लाइन कहीं जा रही है दूसरी लाइन कहीं जा रही है। एक इधर आधी मील की दूसरी तीन मील की और सी छोटी। बोले कि ये साला गीत है कोई? क्या मजाक बना रखा है। आप राज साहब को बेवकूफ़ बना रहे हो। राज साहब हँसे। बोले-भाई नीरज बताओ इसको। मैंने कहा-शंकर द बुरा न मान जायें कहीं। लेकिन साहब हिम्मत करके जब बताया यह गाना तो मुग्ध हो गये। वह गीत हिट हुआ। पूरा एटमॉस्फियर है उसमें "ऊपर से नीचे को, नीचे से ऊपर को आना-जाना पड़ता है।" सर्कस में झूला चल रहा है और अप एण्ड डाउन्स बना रहे हैं। रिंग मास्टर के... तो वह आवाज़ आ रही है कोड़े की... तो सुपर हिट हो गया गीत। हम जो कह रहे हैं... गीत में वह दिखना भी चाहिए।
फिल्म संसार में आज गुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे गीतकार हैं वहीँ बहुत से नए गीतकार भी हैं। और दोनों ही स्तरों के गीतकारों की जगह बनी हुई है। इस परिदृश्य पर आपकी क्या टिप्पणी है?
देखिए, जो बेसिकली पोस्ट है, वह तो कोई न कोई सिचुएशन में भी अपनी स्थिर सम्हाल लेगा। अब जैसे गुलज़ार है।गुलज़ार में कविता का एलीमेंट ज़रूर मिलेगा- नये होते हैं उनके गीतों में वह भाषा भी नयी प्रयोग करता है। बेसिकली वह। राइटर है वह। इसलिए उसके गीत में सस्तापन नहीं मिलेगा। इसी प्रकार से जावेद अख़्तर, वह भी पोएट है। उसमें भी कविता तत्व आता है। वैसे आनन्द बख्शी में ग़जब कला है। मैं तो सबसे बड़ा सफल गीतकार आनंद बख्शी को मानता हूँ फिल्म इण्डस्ट्री में क्यों उससे ज्यादा कोई चला भी नहीं। अब देखिए 'चोली के पीछे क्या है' को सस्ता कह दिया लोगों ने तो कैसे बचाया उसने चोली के पीछे क्या है, चुनरी के नीचे क्या है- मेरा दिल यह कह के बचा दिया न उसने। मैं दूँगी अपने यार को कैसे बचा दिया उसने एक शब्द कहके ।
राष्ट्रीय गीतों में प्रदीप से बढ़कर लिखने वाला पैदा नहीं हुआ इस देश में, क्यों साहब? आज़ादी से पहले जब गीत लिखा तो कैसे बचाया सेंसर से "आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है। दूर हटो ऐ दुनिया वालों" अंग्रेजों नहीं कह रहा है। आज मुंबई में चलताऊ गीत लिखने वाले भी बहुत मगर फ़िल्में वो पापुलर कहाँ से हो पाती हैं? अच्छे गीत जनता में अपनी जगह बना लेते हैं।
नीरज जी अपना टर्निंग प्वाइंट किसे मानते हैं?
'कारवाँ गुजर गया...' जिस दिन मैंने पढ़ा था लखनऊ रेडियो स्टेशन से 1955 में उसी दिन से विख्यात हो गया। जितना मेरा सम्मान है और मुझे उर्दू भाषा वाले जानते हैं उतना ही हिन्दी वाले जानते हैं। 'कारवाँ' के अलावा 'धर्मयुग' में लम्बी-लम्बी पूरे पृष्ठ को रचना आई। उससे यह हुआ कि हमारे पाठक बन गये इस देश में। उस वक्त एक्चुली क्या होता था कि कवि कविता से प्रेरणा लेता था। एक दूसरे से टक्कर थी कि हम बढ़िया लिखेंगे। एक बार दिनकर जी ने लिखा था "जब गीतकार मर गया, चाँद रोने आया, चाँदनी मचलने लगे कफ़न बन जाने को मलयागिरि ने शव को कंधों पर उठा लिया, वन ने भेजे चन्दन जलाने को।" मुझसे लोगों ने कहा कि देखो भाई, नीरज, गीतकार को मृत्यु लिखी है इन्होंने आप कुछ नहीं लिखोगे तो मैंने गीतकार का जन्म लिखा और फिर वह छपी पन्द्रह-बीस दिन के बाद। समर्पित भी मैंने दिनकर जी को किया वह गीत। "जब गीतकार जन्मा, धरती बन गयी गोद, हो उठा पवन चंचल झूला झुलाने को, भौरों ने विस्तृत गूँज बजायी शहनाई, आई हागिनी कोयल सोहर गाने को, शबनम ने स्नान कराया मोती के जल से, पहनाये आकर वस्त्र विपुल बहारों ने, निशि ने आँजा काजल, ऊषा ने हिलाये होंठ, पठवाये खील-खिलौने चाँद सितारों ने, करुणा ने चूमा भाल, दिया आशीर्वाद पीड़ा ने प्रेम ने धरा नाम, 'जय हो वाणी के पुत्र' - नाद कर उठी धरा, अम्बर उतरा धरती पर करने को प्रणाम, कल्पना पकड़ कर हाथ साथ खेलने लगी होने उन्मुक्त लगे रहस्य के दृढ़ कपाट, काँपने लगा आप बल, सिहरने लगा स्वग्र, न्यौछावर हो गयी मनुष्य संस्कृति विराट, फिर एक दिवस सोलह रत्नों का हार पहन, बाँसुरी बजाता निकला वो गीतकार, तरुणियाँ ठगी रह गयी गगरियाँ छलक पड़ीं, ज्यों बूँद बहक जाये ज्यों पुरवाई बयार, तरूवर की डाली से बुलबुल बोलने लगी, उफ, कैसा सम्मोहन है इसके गाने में, जी करता है दे डालें उम्र इसे अपनी, ऐसा गुलाब तो देखा नहीं जमाने में"।
अपने प्रशंसकों के लिए इन दिनों आप क्या नया रच रहे हैं?
मेरा स्वास्थ्य इस योग्य नहीं है कि कोई बड़ा प्लान कर सकें। कविताएँ-गीत लिखने बैठता हूँ तो दो-चार पंक्तियाँ लिख के छोड़ दिया। थकान सी हो जाती है। वैसे हमने कविता कभी सोच के नहीं लिखी। अधिकांश जो कविता हमारे जीवन की श्रेष्ठतम हुई हैं, वे हमने नहीं लिखीं, कोई भीतर से लिखवा गया। वह अपने आप हो गया। जैसे भीतर से निकल के आ रहा है। अपने आप कुछ सोचना नहीं पड़ता। अपने समय के सबसे श्रेष्ठ गीत 'मृत्यु गीत' एक ही सिटिंग में लिख गया। बत्तीस पेज की कविता है। अब मैं दोहे लिख रहा हूँ। उसमें क्या है दो पंक्ति लिख ली चलते-चलते।
कुछ बानगियाँ... ।
दोहे तो बहुत हैं। एक दोहे का सार है कि लोग अतीत में जीते हैं या भविष्य में जीते हैं, वर्तमान में नहीं जीते। तो मैं कहता हूँ कि यह वर्तमान का क्षण है और यही सबसे ज्यादा इम्पार्टेण्ट हैं। क्योंकि यही थोड़ी देर पहले भविष्य था और यही थोडी देर बाद अतीत बन जायेगा। तो प्रेजण्ट में लव करो। और इसको ऐसे करो कि जैसे ये चीज लास्ट मूवमेण्ट हैं। क्योंकि एक क्षण बाद बाहर निकलते ही क्या होगा कोई जानता नहीं "चाय का प्याला होंठ पर आया रोशन, के वह ख़त्म हो गया।" पी नहीं सका। इसलिए कह रहा हूँ दोहे में "मित्रों हर पल को जियो, अंतिम ही पल मान, अंतिम पल है कौन-सा कौन सका है जान।" एक दोहा बड़ा सुन्दर सुनाया है मैंने माँ के लिए "जिसमें ख़ुद भगवान ने, खेले-खेल विचित्र, माँ की गोदी से अधिक, तीरथ कौन पवित्र।" एक और देखें- "दोहा बहन है और है, कविता बहू कुलीन। जब इनकी भाँवर पड़ी, जनमे अर्थ नवीन ।। दोहे जैसे अधर हैं, ग़ज़ल सरीखे नैन, बिना तुम्हें गाये मेरे नहीं गीत को चैन। भक्तों में कोई नहीं, बड़ा सूर से नाम। उसने आँखों के बिना, देख लिये घनश्याम ।"
यह साक्षात्कार 'सफ़ह पर आवाज़' किताब में प्रकाशित। किताब यहाँ से मंगवाएँ...
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