मिर्ज़ा ग़ालिब के दो क़िस्से - शकील ख़ान

 

मिर्ज़ा ग़ालिब के दो क़िस्से 

शकील ख़ान


चित्र - अब्दुर रहमान चुगताई 


ग़ालिब का हिंदी में अर्थ तलाशें तो जो शब्द सामने आते हैं वो हैं- छाया हुआ, हावी, प्रभावी, विजयी, श्रेष्ठ। 27 दिसम्बर 1796 को आगरा शहर जन्मे मिर्ज़ा असद उल्लाह बेग ख़ान उर्फ़ ग़ालिब ने अपनी शायरी से उपनाम ग़ालिब को सच्चे अर्थ में सही साबित किया, ताउम्र साबित करते रहे। आज 226 सालों बाद भी शायरी पसंद लोगों के दिलो दिमाग पर वो पूरी तरह छाए हुए हैं। इस ज्ञान ने उनकी शायरी को बहुत रिच किया। शुरुआती दौर में ग़ालिब उर्दू के क्लिष्ट शब्दों का उपयोग करते थे इसलिए उनकी शायरी बड़े-बड़े लोगों के सिर से ऊपर निकल जाया करती थी। बाद में उन्होंने अपेक्षाकृत आसान अलफ़ाज़ का इस्तेमाल शुरु किया, लेकिन बातें उनमें भी गहरी ही थीं। इसके बाद तो हालात ये हुए कि ग़ालिब की पहचान मुशायरा लूटने वाले शायर की बन गई। दो क़िस्से, जो ग़ालिब की इन्हीं ख़ासियत को सामने लाते हैं।


चित्र - मकबूल फ़िदा हुसैन 


पहला किस्सा

ग़ालिब दिल्ली से आगरा शिफ्ट हो चुके थे। एक बार उन्हें बहादुर शाह ज़फर के दरबार में होने वाले मुशायरे में शामिल होने की दावत मिली। ग़ालिब के दोस्त और घरवाले बहुत खुश थे कि ग़ालिब तो वहाँ से वाह-वाही लेकर ही लौटेंगे और बादशाह की नज़र में भी आ जाएँगे। बहादुर शाह ज़फ़र शायरी के शौकीन थे और उनके दरबार में मुशायरे होते रहते थे।

बादशाह के उस्ताद मशहूर शायर शेख इब्राहीम जोक थे। शार मोमिन भी उस दरबार की रौनक हुआ करते थे। गालिब ने महफिल में जो ग़ज़ल सुनाई वो ये थी- 

नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का 
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का 

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ 
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का 

उनकी इस ग़ज़ल को कोई समझ नहीं पाया और भरी महफ़िल उनका मजाक बनाया गया। मिर्ज़ा नौशां (ग़ालिब) ने सिर्फ़  मतला और मक्ता यानि प्रारंभिक और आख़िरी  शेर सुनाया और मुशायरा छोड़कर चले गए।



दूसरा क़िस्सा

दूसरा किस्सा भी  इसी दरबार के मुशायरे का है। यहाँ ग़ालिब ने जिन हालात में जो ग़ज़ल सुनाई वो साबित करता है ग़ालिब, क्यों महान शायर के ख़िताब से नवाजे गए। दरअसल हुआ यूँ था कि एक बार मिर्ज़ा नौशां बाज़ार में कुछ लोगों के साथ बैठे हुए हँसी ठट्टा कर रहे थे। तभी उस्ताद जोक की सवारी वहाँ से गुजरी।

किसी ने मिर्ज़ा को कहा- देखो उस्ताद जोक जा रहे हैं। मिर्ज़ा ने जोक पर व्यंग्य कसते हुए जोर से कहा- 

'बना है शाह का मुसाहिब (बादशाह का खास) फिरे है इतराता ।"

इस जुमले को जोक और उनके साथ के लोगों ने भी सुना। जोक ठहरे बादशाह के उस्ताद, सो बुरा लगना स्वाभाविक था। जोक शातिर थे, उन्होंने बदले की गरज से चमचों से कहा- अगले हफ्ते महल में मुशायरा है, उसकी दावत मिर्ज़ा को दे दो और बादशाह के सामने बाज़ार वाला क़िस्सा दोहरा देना । चमचे बोले ज़रूर हुजूर मिर्ज़ा नौशां को पिछली बार से ज्यादा बेइज्जत कर करके निकालेंगे मुशायरे से ।

मुशायरे की शुरुआत में बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने सबका स्वागत किया और कहा कि कुछ शायर हमारे उस्ताद जोक पर फ़िकरा कसते हैं, आगे ऐसा न हो। 

योजना के मुताबिक जोक का एक चमचा बोला- नहीं हुजूर उस्ताद की शान में ऐसी गुस्ताख़ी कोई नहीं कर सकता।

दूसरे ने जवाब दिया- मिर्ज़ा नौशां ने सरेराह उस्ताद पर जुमला कसा है और कहा है 'बना है शाह, का मुसाहिब फिरे है इतराता।'

बादशाह ने नाराज होकर पूछा- 'मिर्ज़ा नोशां क्या यह सच है।'

जवाब में मिर्ज़ा ग़ालिब बोले- 'जी हुजूर सच

है, मेरे मक्ते का मिसरा ऊला है।' यानि अंतिम शेर की पहली लाइन । बादशाह ने पूरा मक्ता (शेर) सुनाने को कहा। जवाब में ग़ालिब ने शेर सुनाया, जो इस तरह था 

'बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू  क्या है।

वाह-वाह से महफिल गूँज उठी। जोक को तो पता था कि शेर की दूसरी लाइन मिर्ज़ा ग़ालिब ने अभी गढ़ी है, सो फंसाने की दृष्टि से कहा- 'अगर मक्ता इतना खूबसूरत है तो पूरी ग़ज़ल क्या होगी, सुनी जाए।'

सो बादशाह ने कहा- आज के मुशायरे का आगाज ग़ालिब की इसी ग़ज़ल से होगा।

गालिब ने जेब से एक परचा निकाला और ग़ज़ल पढ़ना शुरु की- 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है 
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल 
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है 




ग़ज़ल ख़त्म हुई । ग़ालिब जिस कागज़ में देखकर ग़ज़ल सुना रहे थे, वो कागज़ उन्होंने मुस्कुराते हुए जोक के ख़ास  चमचे की तरफ़ बढ़ा दिया, जिसने इस किस्से को बादशाह तक पहुँचाने का जाल रचा था। वो ये देखकर हैरान रह गया कि परचा तो कोरा था, दोनों तरफ़ से कोरा ।

दरअसल, ग़ालिब ने वो ग़जल हाथ के हाथ तैयार की थी और बिना लिखे ही सीधे सुना दी थी। बाद में, इस ग़ज़ल के तमाम शेर बहुत ज्यादा मशहूर हुए ख़ास तौर पर 'रगों' वाला शेर । यह ग़ज़ल ग़ालिब की बेहतरीन ग़ज़लों में शामिल की गई।

यानि एक बहुत ही शानदार और ख़ूबसूरत ग़ज़ल ग़ालिब ने बिना किसी तैयारी के यूँ ही रच डाली थी। ऐसी ग़जल जिसे बादशाह के साथ पूरी महफ़िल की दाद तो मिली ही ग़ालिब से खार खाए बैठे उस्ताद जोक की भी दाद मिली  और भरपूर दाद मिली। ऐसे कमाल के जादूगर शायर थे ग़ालिब ।

वैसे खुले  दिल से अपने दुश्मन की तारीफ़ के लिए जोक की दरियादिली भी तारीफ़  की हकदार थी। बताते चलें ग़ालिब का यह क़िस्सा हमने गुलजार द्वारा दूरदर्शन के लिए बनाए गए सीरियल 'मिर्ज़ा ग़ालिब' से उठाया है। गुलज़ार ने इस क़िस्से को बहुत ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में पेश किया है।



चित्र - मकबूल फ़िदा हुसैन 






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