आलोचना में हाशिए पर ललित निबंध

 

आलोचना में हाशिए पर ललित निबंध

ललित निबंधकार - गीतकार श्रीराम परिहार से विनय उपाध्याय की बातचीत 


यह सच है कि ललित निबंध अपनी परम्परा का जल लेकर ही पथिक की भांति चल रहा है, लेकिन यह जल उसकी यात्रा का वह संबल भी है जिससे वह एक स्तर पर तो अपनी प्यास बुझाता है और दूसरे स्तर पर उसका पूजा में प्रयोग करता है।

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 ललित निबन्धों को लेकर यह धारणा पाठक समाज में रही है कि वह बीते हुए के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहा है। विषय, सन्दर्भ और भाषागत मुहावरे का चलन उसने बदला नहीं है। यह भी कि उसमें आधुनिक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति आकार नहीं ले पा रही है। क्या यह भ्रांति है या ललित निबंध जैसी अल्पज्ञात विधा के प्रति दुराग्रह? 

 साफ़ है कि बालकृष्ण भट्ट या माधव प्रसाद मिश्र जहाँ से ललित निबंध शुरू करते हैं, सरदार पूर्णसिंह तक आते हुए वह अपने युग की बोली बोलने लगता है और ललित निबंध के रचना पुरूष आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की क़लम से उसे एक नया व्यक्तित्व मिलता है लेकिन यह नया व्यक्तित्व युग से कतई असंपृक्त नहीं है। वह बदलाव की दिशा में स्पष्ट दिखाई देता है। विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, धर्मवीर भारती, अज्ञेय और निर्मल वर्मा तक आते हुए उसके स्वरूप में विकासमान प्रतिमानों की उपस्थिति साफ़ नज़र आती है।

इधर के ललित निबंधकारों में अपने समय से मुठभेड़ और अपने समय के मनुष्य को शब्द देते हुए किस तरह से जीवन और सृष्टि के लालित्य को बचाया जाये, यह चिंता गहराती नज़र आती है। इसलिए यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ललित निबंध अतीतजीवी है तथा बीते हुए के मोह में उसका उलझाव है। मेरा यह मानना है कि यह विधा नर्मदा की धारा की तरह सतत् प्रवाहमान है, जो अपने जल स्रोत को अतीत से ग्रहण कर मानवीय जीवन के सूखे तटों को आज भी अपना सृजनशील स्पर्श दे रही है। यह सच है कि ललित निबंध अपनी परम्परा का जल लेकर ही पथिक की भांति उसे अपने साथ लेकर चल रहा है, लेकिन यह जल उसकी यात्रा का वह संबल भी है जिससे वह एक स्तर पर तो अपनी प्यास बुझाता है और दूसरे स्तर पर उसका पूजा में प्रयोग करता है।

मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि ललित निबंध की यात्रा अपने समय के यांत्रिक बीहड़ों की ओर निरंतर अग्रसर है। २० वीं शताब्दी में ललित निबंध की यात्रा जहाँ से शुरू हुई है, वहाँ से उसने अनेक गाँव, बस्ती, जनपद और नगरों से गुज़रते हुए नए क्षितिजों की ओर रुख किया है। परम्परा का आकलन करें तो यह विधा बहती हुई नदी है, ठहरा हुआ जल नहीं। यह विधा लगातार स्थापित हो रही है और पाठक उसका सम्मान कर रहे हैं।


क्या आज ललित निबंध का मौलिक स्वभाव बदला है?

देखिये, प्रत्येक विधा का अपना रूप-स्वरूप होता है और समय के अनुसार ही वह विधा अपने स्वरूप में अपनी सीमा में ही परिवर्तन करती चलती है। किसी भी विधा में अभिव्यक्त विषय-वस्तु और शिल्प जब तक अपनी समय के धरती, आकाश से जुड़कर अभिव्यक्त नहीं होते, तब तक वह विधा लोक-मानस से सही-सही नहीं जुड़ती और अपने उद्देश्यों में भी वह सफल नहीं मानी जाती। ललित निबंध ने इस अवधारणा के बीच अपनी मौलिकता बचाए रखते हुए नए समय से संवाद किया है। पिछले लगभग 25 वर्षों में मेरी यह कोशिश रही है कि पारम्परिक कथ्य से ऊपर उठकर ललित लेखनी को नए संदर्भ, नई सूचनाओं से भी जोड़ा जाए। मैं ही क्यों अष्टभुजा शुक्ल, डॉ. श्यामसुन्दर दुबे, गोविन्द गुंजन जैसे आधुनिक निबंधकारों ने भी ललित निबंध के विचार का घेरा व्यापक किया है। जीवन की नई चुनौतियों और संघर्ष को अपनी रचनाओं में मुखर किया है। आप इन लेखकों के निबंध पढ़ें तो भाषा और प्रस्तुतिकरण का रंग-ढंग भी आपको बदला मिलेगा। मेरा स्पष्ट मानना है कि भारतीय जीवन की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है यह विधा।

ललित निबंध का समुचित आकलन साहित्य में क्यों नहीं हो पाया?

मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि यह विधा हिन्दी आलोचना के केन्द्र में नहीं रही। समीक्षकों ने इसे दुराग्रहों से देखा। दुर्भाग्य से वादों में विभाजित आधुनिक हिन्दी आलोचकों ने इसे वैसे ही अस्पृश्य माना जैसी कभी व्यंग्य विधा के साथ सुलूक किया था। हमारे कुछ वर्तमान आलोचक तो ललित शब्द से भी परहेज करते हैं। हाँ, मैं यह मानता हूँ कि ललित निबंध ने अपने समीक्षक पैदा नहीं किये। वजह यह भी कि इस विधा में विपुल लेखन नहीं किया गया। लेकिन मुझे इस बात की प्रसन्नता भी है कि 'नई दुनिया' जैसे प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक और 'नवभारत टाइम्स' इधर धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान की भूमिका भी ललित निबंध को अहम बनाने में मददगार ही रही। साहित्यिक पत्रिकाओं में 'ज्ञानोदय', 'वागर्थ', ‘साहित्य अमृत', 'अक्षरा' से लेकर 'कला समय' और 'अक्षत' तक ललित निबंध की लहरें फैलती रही हैं।


लेकिन नए रचनाकारों का रूझान इस विधा की ओर नहीं के बराबर है?

मैं यह स्वीकारता हूँ कि ललित निबंध कठिन विधा है। यह रचनाकार और रचना, दोनों स्तरों पर जटिलता की मांग करता है लेकिन मैं आश्वस्त हूँ कि नए रचनाकारों में ललित का नया बोध अँकुर रहा है। हाँ, केवल ललित का आना ही ललित निबंध नहीं है। पूर्व संरचना और भीतरी आँच भी जरूरी है। शैलीगत आग्रह भी आवश्यक है। विधा का स्पष्ट व्यक्तित्व लेखनी में झलकता हो। यह सब अर्जित करना बहुत विरल है। अब कविता, कहानी और व्यंग्य के रचनाकारों को संख्या से ललित निबंधकारों की गिनती की तुलना तो नहीं की जा सकती। जीवन में उथले भाव बोध से जीने की आदत भी तो समाज में गहराती जा रही है। ललित निबंध तो जीवन के तमाम कूल-किनारों और गहरी खाइयों को छूने-टटोलने के बाद विचार शक्ति अर्जित करता है।

ललित निबंध को समाज के बीच ले जाने के लिए क्या किसी तरह के प्रयोग किये जा सकते हैं?

बहुत गंभीर आचरण होने के कारण इसके सहज प्रयोग की संभावना क्षीण ही है लेकिन मैं ललित निबंध के प्रभावी पाठ का हिमायती हूँ। वैसा ही जैसे व्यंग्य को लेकर शरद जोशी जनता के बीच गये थे। यहाँ ललित निबंध को 'लोक मानस' के स्तर पर ले जाने की चुनौती लेखकों पर रहेगी।

मध्यप्रदेश और पड़ोसी राज्यों के कई पुरस्कार, सम्मान आपको मिले, इन्हें किस रूप में स्वीकारते हैं?

सम्मान अलंकरण पाकर मैं तो क्या कोई भी रचनाकार गौरवान्वित महसूस करेगा। यह ललित निबंध के प्रति सामाजिक स्वीकृति के साक्ष्य हैं। रचनाकार को दिया जा रहा सम्मान, प्रकारांतर से रचना का ही सम्मान होता है। मुझे मिले कई अलंकरणों की अर्थवत्ता साहित्यिक परंपरा में ललित निबंध की स्थापना का महत्वपूर्ण अंग है।

आप मूलत: एक गीतकार रहे हैं। 'चौकस रहना है' में आपके गीतात्मक तेवर की कई बानगियाँ देखने मिलती हैं। इधर ललित निबंधों को लेकर आपकी इतनी प्रसिद्धि हुई कि गीत का पक्ष गौण ही हो गया। संभवत: गीत लिखना छूट भी गया। क्या गीत में आप अपनी बात कहकर संतुष्ट नहीं हुए?

गीत कहाँ छूटा है? गीत कभी छूट पायेगा? हाँ, ललित निबंध ज़रूर मैंने लगातार लिखे। नवगीत लेखन भी कुछ कम हो गया। परन्तु दोनों विधाओं की तासीर ललित ही है। दोनों विधाएँ ही मान-मनोव्वल वाली हैं। सध जाए तो लगातार प्रसन्न रहे, रूठ जाए तो मनाए न माने। कभी-कभी यह भी होता है कि कोई विषय गीत की कोमल और लघु काया में अट नहीं पाता, तो कलम ललित निबंध में उसे रमा लेती है और कभी भाव-विचार की झोंक ललित निबंध से निकलकर नवगीत की सतरों में गुनगुनाने लगती है। कभी-कभी यह भी होता है कि नवगीत लिखने के बाद उसके ही कथ्य का विस्तार ललित निबंध में होता है। इस प्रक्रिया में इतना आवश्यक है कि एक नवगीत लिख जाने के आत्मसुख से दुगना-तिगुना आत्मसुख एक ललित निबंध को लिखकर मिलता है।  

आपने गीत लिखना कब आरंभ किया? इसकी प्रेरणा कैसे मिली?

एक लम्बी कहानी है। गीत लिखना नौवीं-दसवीं कक्षा से ही आरंभ हो गया था। दसवीं कक्षा में पहला गीत 'फूल' को लेकर लिखा गया और पहला निबंध भी वर्षा ऋतु पर कक्षा दसवीं में ही लिखा। गीत लिखने की प्रेरणा अलग-अलग मिली। रामचरितमानस इनमें प्रमुख है। मानस में जब-जब करूणा और प्रेम के प्रसंग आए हैं, उन्हें पढक़र लगता था पात्र विशेष का मन ही उन सारे प्रसंगों में गा रहा है। एक अजीब बात यह कि प्रसाद की पुरस्कार और आकाश दीप कहानियाँ पढ़कर अन्तरतम गीतमय हो उठा। इन दोनों कहानियों ने भी गीत को जन्म दिया। फिर गाँव में गर्मी की छुट्टियों में सांस्कृतिक और धार्मिक नाटक होते थे। उनमें हम भाग लेते थे। यह बात ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा की रही है। उन नाटकों में प्रसंगानुकूल प्रभाव उत्पन्न करने के लिए हम स्वयं गीत लिखते थे। इस तरह मिल-जुलकर गीत यात्रा आरंभ हुई। भीतर का राग-बोध तो प्रमुख था ही।

इस धारणा के चलते कि प्रत्येक कविता का अपना छंद होता है, उसमें गीतात्मक संस्पर्श होता है, आप गीत की पृथक परिभाषा देना चाहेंगे?

गीत जीवन की आदिम लय है। पहले गीत और कविता में फ़र्क नहीं था। यह फ़र्क हुआ कविता द्वारा छन्द को छोड़े जाने से। पहले तो काव्य या कविता ही संबोधन था। यह बिल्कुल ठीक है कि प्रत्येक कविता का अपना गीतात्मक संस्पर्श होता है। बिना उसके कविता हो ही नहीं सकती। छन्द को लेकर यह हुआ कि नयेपन के नाम पर छन्दात्मक अनुशासन कविता से एक तरह से खत्म ही हो गया। निराला ने यदि कहा कि मुक्त करो छन्द के बन्ध, इसका तात्पर्य यह नहीं कविता गद्य का स्वरूप धारण कर ले। निराला की कविताओं का आन्तरिक छन्द है। नया छन्द वाली कविताएँ हैं वे। निराला को छन्द का ज्ञान था इसीलिए उनकी पारम्परिक छन्द से इतर कविताओं का कवितापन बना रहता है। बल्कि एक नयी रौनक के साथ वे कविताएँ अपनी पहचान लिये हुए हैं। जो छन्द नहीं जानता। जिसे कविता का छन्द-शास्त्र नहीं ज्ञात है, वह कविता के नाम पर गद्य ही लिखेगा, कविता नहीं।

प्रकृति में छन्द है। लय है। सब एक अनुशासन में काम करते हैं। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह सब एक लय और अनुशासन में सौर मण्डल में घूम रहे हैं। या स्थित हैं। अनुशासन है तो सब कुछ गतिमान है और व्यवस्थित है। प्रकृति का हर क्षण लयात्मक है।

गीत इस भूमि पर खरा और चोखा सिद्ध हुआ है। गीत तथाकथित नयी कविता से इन्हीं अर्थों में पृथक है कि गीत निसर्ग की तरह छन्द और लय से अनुशासित और गत्यात्मक है। तथाकथित कविता के पास न निसर्ग का छन्द है, न जीवन की लय। इसीलिए साहित्य का शास्त्र भी उसके पास नहीं है। और इन तीनों के न होने के कारण ही पिछले पचास वर्षों की कविता में अधिकांश ऐसा है जिसे हिन्द महासागर में फेंक देना चाहिए। ऐसी कविताओं के प्रकाशन पर भी रोक लगनी चाहिए ताकि बच्चों की कॉपी-किताब का काग़ज़ बच सके। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह तात्पर्य कतई नहीं कि साहित्य के नाम पर गेंग चलायी जाए और उसमें शामिल होने वाला बजरबट्टू भी मोती की तरह गिना-माना जाए। कम से कम साहित्य में तो इस बिहारवाद को खत्म होना चाहिए। गीत के रचना संसार में यह अराजकता नहीं है। गीत की लय और मानव हृदय की धडक़न में एक साम्य है। इसीलिए जब गीत गाया जाता है तब उसमें हृदय ही रोता-हँसता है। यह गीत में छन्द और मानवीय हृदय के लयात्मक संस्पर्श के कारण होता है। कविता से गीत कविता की गद्यात्मकता के कारण तो भिन्न है ही, साथ ही जीवन दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व बोध, प्रीतितत्व और सहज संरचना के धरातल पर भी एकदम अलग है। नयी कविता के भीतर एक असहज रचना प्रक्रिया सरकती प्रतीत होती है, जबकि गीत में रचना का दबाव काम करता है। एक सहज रचना-स्रोत का हुल्ल से फूटना और सहज प्रवाहित होना, गीत का स्वभाव है और सम्पूर्ण निसर्ग की परिधि में जो कुछ है, उसे गाना ही उसका लक्ष्य है।

हिन्दी ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में गीत एक केन्द्रीय और प्राचीन विधा रहा, क्या कारण है जो गीत ढलकर नवगीत में परिणित हुआ? ऐसा समय और समाज की बदलती परिस्थितियों की वजह से हुआ अथवा प्रयोगवादी नई कविता उसके सामने चुनौती बनकर खड़ी हो गयी?

ऐसा है कि परिवर्तन निरंतर प्रक्रिया है। आपने ही कहा कि 'सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में गीत एक केन्द्रीय विधा रहा है'। आप ध्यान दीजिए कि वेदकालीन साहित्य से लेकर पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, काल तथा हिन्दी साहित्य के भी चारों कालों में गीत की स्थिति बदलती रही है। चूंकि साहित्य जीवन की ही व्याख्या है। जीवन में परिवर्तन होता है तो साहित्य में भी अनिवार्यत: परिवर्तन की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से होगी। समय और समाज के बदलते हुए सन्दर्भ जीवन की क्रियाओं पर असर डालते हैं। उनके कारण ही साहित्य रूप बदलते हैं। गीत का भी फॉर्म और कण्टेण्ट्स हर युग में बदला है, ऐसा नहीं है कि यह प्रक्रिया गीत और नवगीत के ही साथ हुई हो। चुनौती दरअसल जीवन में हुआ करती है। जीवन की चुनौतियाँ ही साहित्य में प्रतिबिम्बित होती हैं। प्रयोगवादी नयी कविता ने अपने ढंग से काम किया। नवगीत ने अपने ढंग से। नयी कविता नवगीत के लिए चुनौती रही है, ऐसा हम नहीं मानते। चुनौती के रूप में लिखा गया साहित्य कभी शाश्वत और मूल्यवान नहीं होता। नयी कविता का आन्दोलन चाहे जिस रूप में हो, था वह सायास। कविता सायास नहीं होती। वह सहज होती है। इसीलिए हम मानते हैं कि नवगीत आन्दोलन नहीं है या नहीं था। वह भारतीयता में डूबी रचनाकार की आत्माभिव्यक्ति है- सहज अभिव्यक्ति। नवगीत एक सहज अभिव्यक्ति है इसलिए यह स्पष्ट है कि यह गीत-वृक्ष का पल्लव के रूप में स्वाभाविक विकास है। गीत और नवगीत के साथ पुराने पत्ते और नवपल्लव के ही उपमान ठीक बैठते हैं। 'नव' शब्द विशेषण के रूप में ही जुड़ा था, लेकिन कोई विशेषण यदि संबोधन बनकर रूढ़ हो जाए तो वह संज्ञा बन जाता है। 'नवगीत' आज संज्ञा बन चुका है और यह गीत का ही नया रूप है। पिता-पुत्र की तरह इनका नाता है। गीत की जो अन्त:धारा पुरा साहित्य से चली आ रही है, वह अपने युगीन तटों से निरंतर नया स्वाद, रस और झीर लेकर आगे बढ़ती हुई नवगीत तक आयी है। समय के साथ विधा में परिवर्तन होना उसकी जीवंतता और प्रासंगिकता का प्रमाण है। नवगीत ने अपने मूल तत्व- 'जीवन का राग' को सुरक्षित रखते हुए युगीन सन्दर्भों के बीच जीवन के सम्पूर्ण को सहज गाया है।

श्रृंगार और करुणा गीत की पहचान रहे, क्या यह पहचान गीत के व्यक्तित्व पर इतनी हावी नहीं हो गयी कि आज की प्रगतिशील, वैज्ञानिक, यथार्थपरक सामाजिक चेतना, आधुनिकता, बौद्धिकता तथा वैचारिकता की अभिव्यक्ति से वह परहेज करता रहा या उसकी कोमल काया जीवन के पथरीले अहसासों को ढोने में असमर्थ रही?

आपके इस एक प्रश्न में तीन प्रश्न हैं। एक-एक का उत्तर देना ठीक होगा। गीत की पहचान केवल करुणा या श्रृंगार रहे हैं, इसे हम नहीं मानते। इसका प्रमाण है। 'गीता' एक तरह का गीत ही है। उसमें कहाँ श्रृंगार है? कहाँ करुणा केन्द्र में है? वह तो कुरूक्षेत्र की युद्ध भूमि पर गाया गया जीवन का सम्पूर्ण दर्शन है। जब आप गीत के सन्दर्भ में सम्पूर्ण भारतीय वाड्.मय की बात करते हैं तो गीत की परख भी उसी व्याप्ति के साथ होना चाहिए। जब हम कहते हैं कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य गीतात्मक है। (यह सही भी है) तो किसी एक पक्ष की प्रधानता का सवाल ही पैदा नहीं होता। जीवन में कोई एक पक्ष ही प्रधान नहीं होता। जीवन विपरीतताओं में सामंजस्य स्थापित करते हुए चलता है। जीवन की यही तमाम धडक़नें भारतीय साहित्य ने गीत में गायी है। इसीलिए गीत ने नौ रस ही गाये हैं- केवल श्रृंगार या करुणा को ही नहीं। युगानुरूप इनके आयतन और घनत्व में फ़र्क हो सकता है। लेकिन गीत ने गाया है जीवन के समग्र को ही। यदि हम आधुनिक सन्दर्भों में गीत को देखें तो भारतेन्दु युग से लेकर द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद के समय में से गीत ने अपने भीतर लोक-जीवन, नागर जीवन, स्थानीय संदर्भ और राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय संदर्भों को शब्दानुशासन दिया है। विशेष बात यह रही कि गीत ने अपने सिर पर चढ़कर किसी एक मात्र भाव को बोलने नहीं दिया। क्योंकि यह तो स्वयं जन की होंठ चढ़ी विधा है।

यह सच नहीं है कि आज की प्रगतिशील, वैज्ञानिक, यथार्थपरक, सामाजिक चेतना, आधुनिकता, बौद्धिकता तथा वैचारिकता की अभिव्यक्ति से गीत परहेज करता रहा। हाँ ऐसा प्रचारित अवश्य किया गया। यह उन रचनाकारों ने किया जो छन्द को साध नहीं सके। या अनेक कारणों से जो गीत के स्थान पर तथाकथित गद्य कविता की स्थापना में जुटे रहे और डटे रहे। ऐसी टिप्पणियाँ गीत साहित्य को बिना पढ़े भी की जाती रहीं। गीत ने उन विषयों या पक्षों से कभी एतराज या परहेज नहीं किया, जिनकी चर्चा आपने की है। चाहे गीत हो या नवगीत हो, जीवन का यथार्थ, आधुनिक चेतना, विकासवादी मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टि और विचारशीलता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति इनमें हुई है। हाँ छद्म प्रगतिशीलता से गीत-नवगीत को अवश्य परहेज रहा है। जहाँ तक बौद्धिकता का प्रश्न है- वहाँ तक स्पष्ट करना चाहेंगे कि नवगीत हृदय और बुद्धि के समन्वय से निकली और विकसित विधा है। अतिशय बौद्धिकता से गीत-नवगीत बचा है।

प्रश्न का तीसरा बिन्दु चर्चा में स्पष्ट हो गया। गीत की कोमल काया जीवन के पथरीले अहसासों को ढोने में कतई असमर्थ नहीं रही है। आप निराला के 'तोड़ती पत्थर' से लेकर बुद्धिनाथ मिश्र और यश मालवीय तक के तमाम गीतकारों के गीतों की परख कर सकते हैं। पाएंगे कि गीत ने अपनी जलधारा के समान कोमल काया से युग-जीवन के प्रस्तर-संदर्भों में शिवलिंग तराशने का काम किया है।

गीतकार-नवगीतकारों का यह दावा रहा है कि भावना और विचार दोनों ही स्तरों पर जीवन मूल्यों के साथ-साथ देशभक्ति, सामाजिक चेतना और स्वतंत्रकामी चेतना के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैज्ञानिक चिंतन की संप्रेषणीय अभिव्यक्ति छांदिक कविताओं में होती रही है। क्या आप इस दावे से सहमत हैं?

हाँ इस बात से पूरी तरह सहमत हैं। क्योंकि यह दावा प्रमाण आधारित है, आन्दोलन प्रेरित नहीं। गीतकारों के पास नारेबाज़ी नहीं है। क्योंकि नारे लगाना राजनीति का या श्रम संगठनों का काम है, साहित्य का नहीं। कविता नारा कैसे हो सकती है? तरह-तरह के जुमले उछालने से भी पोची कविता जन के बीच और साहित्य में जगह नहीं बना सकती। गीत को कोसने टोसने से भी 'कमजोर-कविता-साहित्य' का भला होने वाला नहीं है। मात्र पुस्तकें छप जाने और अलमारियों को जीवन-असम्पृक्त और छन्दानुशासन विहीन कविताओं से भर देने से भी कविता अमर नहीं होगी। जीवित वही रहेगा, जो जन को याद रहेगा। भक्तिकाल का स्पष्ट प्रमाण हमारे पास है। गीत ने व्यक्ति की अनुभूति से गहरी संपृक्ति स्थापित कर उसके जीवन के कठोरतम और कोमलतम को अभिव्यक्ति दी है।

एक ही विचार की अभिव्यक्ति गीत-नवगीत और नयी कविता में हो तो सम्प्रेषण की ताक़त किसमें अधिक होगी? आप इसका आकलन कवि की क्षमता के आधार पर करेंगे या विधागत ढाँचे के आधार पर?

एक ही कथ्य या भाव या विचार की अभिव्यक्ति गीत-नवगीत और नयी कविता में होने पर सम्प्रेषण की ताक़त अपेक्षाकृत गीत-नवगीत में अधिक होगी। हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि गीत का विस्तार ही नवगीत है। लेकिन ताक़तवर कविता भी अपना गहरा प्रभाव तो छोड़ती है। मूल तो काव्य में कथ्य ही होता है। एक स्तर पर भाषा-शैली गौण हो जाती है, अनुभूति ही प्रमुख रहती है। हम गौर करें-मीरा की पंक्ति पर- 'मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'। इस पंक्ति में न उपमा है, न विशेषोक्ति है न ही कथन की चतुराई। गहरी आनुभूतिक सचाई की सहज अभिव्यक्ति है। इसीलिए लोगों को भीतर तक आन्दोलित करती है। उमाकान्त मालवीय का एक गीत-खण्ड बार-बार याद आता है- 'अँजुरी में भरा जल जैसे रीत गया, ऐसे दिन बीत गया'। दिन के बीतने की स्थिति अँजुरी में भरे जल के रीत जाने से दर्शाकर गीतकार ने सामान्य जन की अनुभूति को साकार कर दिया है। और भी कई उदाहरण हम दे सकते हैं- प्रसाद का 'बीती विभावरी' या 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' या 'हिमाद्रि तुंग श्रृंग से'। निराला का 'वीणा वादिनी' या 'सखि वसन्त आया' या 'प्रिय यामिनी जागी'। 

महादेवी, पंत, दिनकर, बच्चन, भवानी प्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती, वीरेन्द्र मिश्र, गोपालदास नीरज, रमानाथ अवस्थी से लेकर यश मालवीय तक के गीतकारों के सैकड़ों गीत लोगों की ज़ुबान पर हैं। वे गाये जाते हैं। उदाहरण के रूप में पेश किये जाते हैं। याद आता है डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का अमर गीत- 'एक बार फिर जाल फेंक रे मछेरे'। तो यह सब इसलिए संभव हुआ कि कथ्य की भावों और विचारों की सघन अनुभूति इनमें सहज रूप से अभिव्यक्त हुई है। कवि की क्षमता तो गीत को ताक़तवर बनाती ही है। कवि की चालबाज़ी और गुटबाज़ी उसे तात्कालिक लाभ अवश्य दिला सकती है, लेकिन 'टेसू फूले दिवस दस, खंखड़ भये पलाश' की-सी स्थिति हो जाती है। विधागत ढाँचा और कवि की प्रस्तुति का ढंग बहुत दूर तक काम नहीं करते। कवि के जीवित न रहने पर तो केवल रचना ही बचती है और एक समय के बाद कवि के द्वारा बनायी धुन भी समय की सलवटों में तितर-बितर हो जाती है। रचना को उसकी भीतरी ताक़त ही शाश्वत बनाती है। तुलसी के मानस को सैकड़ों राग-रागनियों में आज और हमेशा से गाया जाता रहा है। यह रामचरितमानस में अन्तर्निहित कथ्य और जीवन लय के कारण ही संभव हुआ है।

नवगीत ने अपनी चेतना के विस्तार के क्रम में न केवल शिल्पगत जड़ता तोड़ी बल्कि प्रचलित बिम्ब-प्रतीकों का मोह त्यागकर आधुनिक मुहावरों की ओर हाथ बढ़ाया। एक निश्चित कालखण्ड में यह नवाचार सराहा भी गया फिर एकाएक यात्रा शिथिल क्यों पड़ गयी?

नहीं, यात्रा शिथिल नहीं पड़ी। ऐसा लगता है। नवगीत की रचना आज भी गतिमान है। जैसा कि आप ने कहा नवगीत ने अपनी चेतना के विस्तार के क्रम में शिल्प में और भाषागत मुहावरों में तब्दीली की। यह आवश्यक भी है। दरअसल होता यह है कि जीवन की वैश्विक स्थितियाँ आज चौतरफ़ा दबाव बनाए हुए है। विश्व में हर क्षण परिवर्तन हो रहा है। विगत दस वर्षों में जो विकास या परिवर्तन की गति रही वह पिछले डेढ़ सौ वर्षों में नहीं रही। ऐसे नित-नये परिवर्तनशील दौर में नवगीत को भी बदलना अनिवार्य-सा है। परिवर्तन दिखता है कि बाहरी हो रहा है, लेकिन यह जीवन में अन्दर जाकर घर बनाता है। संस्कारों में सेंध लगाता है। संस्कार बदलते हैं तो हमारी दृष्टि में बदलाव आता है। चीज़ों को देखने का नज़रिया दूसरा ही हो जाता है। मतलब कि हमारी अनुभूति प्रभावित होती है। अनुभूति जिन चीज़ों से, वस्तुओं से साम्य बैठाती है, वे ही वस्तुएँ अभिव्यक्ति में उपमान, रूपक, बिम्ब, प्रतीक बनकर आती हैं। नवाचार के साथ दोनों स्थितियाँ बनती हैं- कभी तो नये बिम्ब हैं। प्रतीक पाठक को लुभाते हैं। आकर्षित करते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पुराने के अतिशय मोह में नया, अस्वीकृति की स्थिति दिलाती है। नवगीत के साथ शायद यह हुआ भी। जीवन का काठिन्य उसके भीतर बेडौलपन के साथ प्रविष्ट हुआ। परिणाम में लयभंग और सांगीतिक-क्षीणता की दशा नवगीत को मिली। जहाँ-जहाँ और जब-जब गीत-नवगीत जीवन के ऊबड़-खाबड़ को बाँधने की क्रिया में खुरदरा होता चला गया, उसके भीतर का हरापन टूटने लगा। वहाँ-वहाँ और तब-तब हमें यात्रा में शिथिलता नज़र आयी। परन्तु ऐसा नहीं है कि गीत-नवगीत की यात्रा रुक गयी हो, यात्रा अनवरत है। युगानुरूप सहज विकास की साधना में रत है।

वैदिक ऋचाओं से लेकर रामचरित मानस की चौपाई, दोहे, सोरठे, कबीर-रसखान, रहीम, नानक के दोहे और नीरज तथा निदा फ़ाज़ली जैसे गीतिकाव्य रचने वाले कवियों की रचनाओं को होंठ से आत्मा तक उतारने वाले समाज को नवगीत की लय उसका शिल्प बहुत कुछ अटपटे लगे। वह मनुष्य से अंतरंग नहीं हो पाया। लगता है कि संतुलन की कोई कमी है जिसके कारण हमारा आत्मीय तादात्म्य स्थापित नहीं हो पा रहा है। आपकी क्या राय है?

देखिए! प्रत्येक युग के गीत की अपनी संरचना होती है। हम यह भी कहना चाहेंगे कि प्रत्येक युग के गीत का अपना जन सम्पर्कित राष्ट्रीय स्वरूप भी होता है। जन अभिरूचि, समाज स्थिति और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में कुछ बाहरी और आंतरिक परिवर्तन होते हैं। इसके चलते युग विशेष की काव्य धारणाएँ और शिल्प में भी परिवर्तन होता रहता है। जहाँ तक ऊपर उल्लेखित रचनाकारों तथा साहित्य के सन्दर्भ में जन की गहरी आस्था और तादात्म्य का सवाल है- हम कहना चाहेंगे कि इनका साहित्य, संस्कार निर्माण की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है और दूसरा यह कि इनकी अभिव्यक्ति का फॉर्म या काव्य रीतियाँ इतनी रूढ़ हो चुकी हैं कि वे हमारी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अस्मिता की अभिव्यक्ति तथा उनका संरक्षण करती प्रतीत होती हैं। केवल प्रतीत ही नहीं होती, बल्कि यह सच भी है। वास्तव में सारा मामला अनुभूति के सामान्यीकरण और सहजीकरण का है। वे मूल्य जो युग बदलने के बाद भी नहीं बदलते और मनुष्य को सृष्टि के सदस्य के रूप में विनम्र और संघर्षमय बनाए रखते हैं, अभिव्यक्ति कितनी और किस सीमा तक कोई साहित्य या साहित्य-विधा कर सकी है। आप ठीक कहते हैं कि समाज को नवगीत की लय और उसका शिल्प कुछ अटपटे लगे। इसका कारण यह है कि नयी कविता की तजऱ् पर और होड़ाहोड़ी की राह पर चलने से ऐसा हुआ। नवगीत नयी कविता के बरअक्स अपने को खड़ा करना चाह रहा था। यह लक्ष्य ही मूल से ग़लत था। इस प्रयास में जैसे नयी कविता जन से दूर जाती रही, वैसे ही नवगीत भी दूर होता चला गया। हाँ, जहाँ गीत-नवगीत अपनी रागात्मकता और वैचारिकता के सामंजस्य से सहज प्रवाहित होता रहा, वे गीत तो लोगों की ज़ुबाँ पर चढ़े भी और तादात्म्य भी स्थापित हुआ। गीत का एक शास्त्र है, जिसके आधार पर ही नवगीत का विकास और व्याप्ति होना है। जहाँ भी नवगीत इस शास्त्र से हटता है, वहाँ आत्मीय तादात्म्य स्थापित नहीं होने की दशा होती हैं क्योंकि शास्त्र का निर्माण जीवन और प्रकृति को आधार मानकर होता है। यह आधार गड़बड़ाया कि विधा का चेहरा और आत्मा दोनों ही विकृत होंगे। मूल बात जो बाहरी तौर पर नवगीत से खारिज़ होती प्रतीत होती है- वह है संगीतात्मकता। संगीतमयता गीत का तत्व है। वह नवगीत का भी है। नया रचने की चाहत में जैसे-जैसे छन्द के बन्ध ढीले होते चले गये, वैसे-वैसे संगीत से नाता टूटता चला गया। आत्मा को हर्ष-विषाद में डुबोकर 'ब्रह्मानन्द सहोदर' या ''रसौ वै स:'' की स्थिति की संभावना खत्म होती चली गयी। एक बिन्दु इसके लिए और जि़म्मेदार है- बुद्धि की प्रधानता। जहाँ-जहाँ भावों की बस्तियाँ उजड़ी हैं और विचार का रेगिस्तान नवगीत में निर्मित हुआ है, वहाँ-वहाँ भी नवगीत होंठ और आत्मा से दूर होता चला गया है। नवगीत को नये छन्द रचने की उत्कण्ठा में यह नहीं भूलना चाहिए कि उसमें से संगीत तत्व ही गुम हो जाए।

जिस तरह नई कविता ने जल्दी ही अपनी व्यापक छवि अर्जित कर ली, उसको लेकर साहित्य के समीक्षकों ने लगातार अपने विश्लेषण प्रस्तुत किए, उसके आन्दोलन को गतिशीलता प्रदान की, वैसा नवगीत को लेकर क्यों नहीं हुआ? क्या नई कविता का नेटवर्क अधिक सुनियोजित नहीं है?

निश्चित रुप से नई कविता का नेटवर्क सुनियोजित रहा है। नई कविता के पास कवि, समीक्षक, सम्पादक, प्रसारक, प्रचारक, संयोजक सब कुछ हैं। वहाँ जो कवि है वह समीक्षक भी है, संपादक भी है और कविता-कार्यक्रम का आयोजक संयोजक भी है। ये सब मिलकर एक गोत्र बनाते हैं। उस गोत्र में शामिल होने वाले का विधिवत संस्कार करके उसका सुनियोजित प्रचार-प्रसार भी करते हैं। इससे नई कविता आन्दोलन स्थापित तो हो गया। नई कविता बार-बार समय के पर्दे पर विज्ञापित होती रही। उसमें निश्चित रूप से कुछ अच्छी रचनाएँ निकलकर आयीं, जिन्हें पचास वर्षों की नयी कविता यात्रा में मील के पत्थर की तरह देखा जा सकता है। ऐसा सुन्दर नेटवर्क और शिविरबद्धता दूसरी विचारधारा वालों के पास नहीं है। नवगीतकारों के पास तो कतई नहीं है। शायद ही सारे नवगीतकार कभी आपस में एक साथ मिले हों, आपस में चर्चा परिचर्चा हुई हो। चर्चा-परिचर्चा हुई भी तो टुकड़ों में। कभी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से एकाध महाविद्यालय-विश्वविद्यालय में या फिर हैदराबाद जैसे नगर में 'गीत चाँदनी' वालों ने थोड़ा बहुत कर लिया सो ठीक। नवगीतकार अपनी आत्ममुग्धता से उबर नहीं पाता है। वह मानता है कि गीत तो व्यक्ति की आवश्यकता है। वह गीत को छोडक़र कहाँ जाएगा? इसलिए वह गीत लिख देता है और बेफ़िक्र हो जाता है। पर बेचारा गीतकार यह नहीं जानता कि यह समय बाज़ारवाद का हैं। यहाँ बोलने वाले का, चिल्लाने वाले का ही माल बिकता है। नवगीतकार को वह सब बाज़ार के तौर-तरीके नहीं आये। इसलिए नवगीत अपने आप में अच्छा माल होने के बावजूद भी कविता के उपभोक्ता की पहुँच, रूचि और सम्पर्क से दूर रहा। जितना कुछ नवगीत पहुँचा है और पहुँच रहा है, वह नवगीत की अपनी आन्तरिक ताक़त और नवगीत का व्यक्ति की आत्मा से तादात्म्य का परिणाम है। हम समझते हैं कि यही बड़ी बात भी है। क्योंकि विज्ञापन के द्वारा खोटा माल बिक तो जाएगा, लेकिन बहुत जल्दी ही वह व्यक्ति-समाज के बीच से गायब भी हो जाएगा। फिर साहित्य विज्ञापन की वस्तु नहीं है, जैसे मनुष्य या जीवन विज्ञापन की चीज़ नहीं है।

हिन्दी के मशहूर गीतकार गोपालदास नीरज ने एक साक्षात्कार में गीत का पक्ष लेते हुए कहा है कि जीवित वही रहेगा जो याद रहेगा और गीत मनुष्य की स्मृति में हमेशा जीवित रहता है। नवगीत के संदर्भ में नीरज की यह टिप्पणी कितनी सार्थक लगती है आपको?

गीत में जीवन के अध्यात्म को गाने वाले गीतकार नीरज जी की यह टिप्पणी हमें बिल्कुल सार्थक लगती है। समय की धारा में बहुत कुछ कूड़ा-करकट बह जाएगा। असली वस्तु रह जाएगी। काल बड़ा निर्मम है और इतिहास का सूप थोथा-थोथा बाहर कर देता है। सार तत्व ही बचा रहता है। सार तत्व वह है जो मनुष्य की आत्मा से अन्तरंग है। जो आत्मा से अन्तरंग होता है वह याद रहता है। भारतीय मनीषा ने हमेशा सार वस्तु को अपनी स्मृति में सँजोए रखा और वाचिक परम्परा द्वारा उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कार के रूप में विकसित किया। गीत जीवित रहेगा क्योंकि वह व्यक्ति की स्मृति में बसा संस्कार है। संस्कार बरसों-बरस खत्म नहीं होते।

क्या आपको ऐसा लगता है कि गीत और नवगीत के अपेक्षाकृत पिछड़ जाने के कारण बहुत कुछ ऐसा है जीवन का जो अनकहा रह गया हो। मसलन हमारी संस्कृति, जीवन का सौन्दर्यबोध, उसकी ललित अभिव्यक्ति जो गीत-नवगीत में अधिक मुखर हो सके हैं, वे नयी कविता में संभव नहीं हो सके?

पिछडऩे की बात से तो हम सहमत नहीं हैं। लेकिन इतना अवश्य हुआ कि नयी कविता विचारधारा विशेष से अधिकांशत: प्रेरित और सर्जित होने के कारण एकपक्षीय रही। जीवन-जगत को देखने की उसकी दृष्टि बड़ी तंज और संकीर्ण रही तभी अभारतीय रही, इसलिए जीवन अधूरा व्यक्त हुआ। पूरा सच नयी कविता नहीं कह सकी। रोटी जीवन की आवश्यकता है,  अंतिम सच नहीं। पेट, शरीर का एक अंग है, शरीर का सब कुछ नहीं। हमारे पास बुद्धि ही नहीं है, हृदय भी है। समाज में केवल शोषण ही नहीं है, त्याग और परोपकार भी है। तुलसी कहते हैं- 'जड़ चेतन गुण-दोष मय, विश्व कीन्ह करतार'। मिला जुला रूप है विश्व। विभिन्न भावों और विचारों का संवाहक है जीवन। इन सबकी समग्र अभिव्यक्ति कविता में नहीं हो पायी। उदाहरण के लिए प्रेम जैसे अनिवार्य भाव पर कविता लिखना बहुत वर्षों तक नई कविता के खेमे में बन्द रहा। यह केवल इसलिए कि भावुकता या रागात्मकता गीत का विषय है या भावुकता शोषण का औज़ार है। अब यह तो अजीब बात हुई। लेकिन पिछले पचास वर्षों तक नई कविता में चलता रहा। अब जाकर प्रेम को कविता में जगह मिल रही है, क्योंकि समझ-परखकर देख लिया कि जीवन की एकपक्षीय व्याख्या से कविता जीवन से ही बाहर हो गयी। लेकिन ऐसा नहीं रहा कि भारतीय साहित्य में जीवन पिछले पचास सालों में अव्याख्येय रहा हो। नवगीत-ललित निबन्ध ने जीवन की बहुपक्षीय और समग्र प्रस्तुति की है। उपन्यास कहानी और नाटक में भी यह हुआ है। हमारे सांस्कृतिक सन्दर्भ निश्चित रूप से नवगीत में सर्वाधिक मुखर हुए हैं, क्योंकि हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि नवगीत और ललित निबन्ध ने विश्व साहित्य बनने की दौड़ में स्वयं को शामिल नहीं किया और अभारतीय नहीं रचा। नवगीत की कोमल काया जीवन के लालित्य को अधिक कुशलता और सुरक्षा के साथ गा सकी है, यह भी एक तथ्य है। हमारा सांस्कृतिक जगत सौन्दर्य, सत्य, शिव से पूरित है। इसमें आस्था, विश्वास और पारस्परिक नेह के झरने हैं। इन सबको ध्यान में रखकर ही काव्य में सांस्कृतिकता को भारतीय सन्दर्भ में देखा जा सकता है। नवगीत ने इसी भारतीय संस्कृति का कलश काव्य मंदिर पर स्थापित किया है। यह कार्य नवगीत चुपचाप एक साधक की तरह करता रहा है। यह अभिनन्दनीय है।

मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही लय में घूमता है। जीवन और प्रकृति के इस प्रामाणिक सत्य का उद्घाटन गीत में ही अधिक सहज और प्रासंगिक रहा है। जब-जब भी मनुष्य हर्ष या विषाद के क्षणों से गुजरता है वह गीत में ही संतुष्टि पाता है, यानी उसका अन्तर्जगत तो आज भी गीत की संवेदना से जुड़ा है लेकिन बाह्य जगत में आया विखण्डन, बिखराव उसकी लय भंग कर रहा है। आपको क्या लगता है?

आप बिल्कुल ठीक-ठीक कह रहे हैं। गीत मानवता के मंदिर का शीर्ष-कलश है। वह मनुष्य की आत्मा की अनुभूति धारा का सहज निर्झर है। वह आत्माभिव्यक्ति है। जो आत्मा का मूल तत्व है वह अपनी नेह भूमि, संवेदना भूमि में कभी सूखता नहीं है। तुलसीदास फिर याद आ रहे हैं- 'सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं, बरषि गये पुनि तबहिं सुखाहीं'। तो गीत का निर्झर आत्मा से फूटा है और आत्मा का जीवन से मन-प्राण का रिश्ता है। जीवन-मरण का नाता है। इसलिए धरती पर जब तक जीवन है, गीत का स्रोत सूखेगा नहीं। बाह्य जगत में आये विखण्डन के बीच भी वह निर्झर बहता रहेगा। इस सन्दर्भ में एक प्रतीक हमारे पास है-नर्मदा का। नर्मदा जहाँ से निकलती है-वह अमरकण्टक की भूमि सजल है इसलिए नर्मदा बारह मास समृद्ध बनी रहती है। नर्मदा का बाह्य जगत अर्थात् उसका अधिकांश यात्रा-पथ पथरीला है। पहाड़ों के बीच से बहती है। चट्टानों को काटकर बहती है, लेकिन अनवरत बहती है, क्योंकि तुलसी कहते हैं- 'सजल मूल जिन्ह सरितन्ह'। नर्मदा का गंगा-यमुना का उद्गम सजल है, इसलिए वर्षा ऋतु के समापन के बाद भी वे बारह मासी बहती रहती हैं। बीहड़ों में भी उत्सव रचती हैं और सन्नाटे में भी संगीत और लय बुनती हैं। ऐसा ही कुछ गीत भी कर रहा है। नवगीत भी कर रहा है। जीवन के बाह्य पक्षों में उभरे विखण्डनों को गीतात्मक संवेदना या रागात्मकता ही दूर करेगी। टूटे हुए को जोड़ेगी। अनास्था को आस्था में तब्दील करेगी। विषाद को दूर कर संघर्ष में तत्पर करेगी। भारतीय सांस्कृतिक सन्दर्भ बहुत गहरे हैं। इन्हीं सन्दर्भों से नवगीत जीवन को उसके दुर्दिनों में सँभालेगा। जीवन में संवेदना बची रहे। पानी बचा रहे। नवगीत की धारा बहती रहेगी।

गीत के भविष्य के प्रति आप कितने आशान्वित हैं?

गीत के भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हूँ। पूरी व्याख्या से ही यह स्पष्ट हो गया है कि गीत जीवन का आदिम राग है। जब तक जीवन रहेगा, धरती पर गीत भी रहेगा। यह आत्मा का पुत्र है और वेदों की ऋचाओं से पोषित है। इधर अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने गीत को जगह देना आरंभ कर दी है। जो लोग गीत को ज़बान पर लाना अपराध समझते थे, वे गीत पर चर्चा करने लगे हैं। अनेक गीत केन्द्रित पत्रिकाएँ भी निकल रही हैं। इधर गीत-नवगीत पर शोधकार्य और समीक्षा कार्य भी विपुलता से हो रहा है, जिसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय कार्य और एक तरह से समग्रता को दृष्टिगत रखते हुए कार्य किया है और किया जा रहा है- डॉ. सुरेश गौतम द्वारा। गीत जीवन की आवश्यकता ही नहीं, प्रकृति भी है। अत: गीत तब तक रहेगा, जब तक निसर्ग रहेगा। गीत का भविष्य उज्जवल है।

आप और कुछ कहना चाहेंगे?

बस गीत के प्रति आश्वस्ति भरी शुभकामनाएँ ही रखते हुए उम्मीद करें कि भारतीय साहित्य से शिविरबद्धता खत्म होगी और हमारे सनातन मूल्यों से लकदक मनुष्य मात्र के ललाट पर गीत कुंकुम-अक्षत का तिलक बनकर दमकेगा।



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