मल्लिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर का सफ़रनामा: हिमांशु बाजपेयी

 

मल्लिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर का सफ़रनामा

हिमांशु बाजपेयी 


चित्र – ख़्वाबतनहा कलेक्टिव

दूरदर्शन के एक प्रसारण में कैफ़ी आजमी से पूछा गया- आपकी पहचान नज़्मों  के लिए रही है, ग़ज़लें आपने बहुत कम कही है। लेकिन इन दिनों आप फिर से ग़ज़लें कहने लगे है। इसकी क्या वजह है? कैफ़ी ने जवाब दिया- ‘मैंने वापस ग़ज़लें कहना उसी वजह से शुरू किया जिस वजह से ग़ालिब मुसव्विरी सीखना चाहते थे. (सीखे है महरूखों के लिए हम मुसव्विरी / तकरीब कुछ तो बहरे मुलकात चाहिए) मैं ग़ज़ल इसलिए कहता हूँ ताकि मैं ग़ज़ल यानी बेगम अख़्तर से नज़दीक हो जाऊं.' कैफ़ी आज़मी का ये जुमला बेगम अख़्तर की शख़्सियत के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। वो सचमुच हमारे मुल्क बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ग़ज़ल का दूसरा नाम है। किसी भी महफिल में जब ग़ज़ल का ज़िक्र छिड़ता है तो बात बेगम अख़्तर से ही शुरू होती है और उन्हीं पर आकर ख़त्म होती है। बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल गायिकी को और ग़ज़ल गायिकी ने बेगम अख़्तर को बेपनाह शोहरत अता की है। कोठे से उतरी ठेठ दरबारी शैली की ग़ज़ल गायिकी को आवाम के बीच रचा-बसा देने का करिश्मा नहीं कर सकती थीं।

ग़ज़ल उनकी गायिकी का सबसे दिलकश अंदाज ठहरा लेकिन उनकी ज़ंबील में ग़ज़ल के अलावा दूसरी, चैती, दादरा, खयाल आदि विधाओं के भी बेशुमार नगीने है। उपशास्त्रीय गायन का सम्मोहन बेगम अख्तर के यहां अपने शबाब पर दिखता है। जो कुछ भी उन्होंने गाया, यूं लगा कि वो बेगम के लिए ही बना है और बेगम उसी के लिए ही बनी है। उनके अनन्य प्रशंसक यतीन्द्र मिश्र उनकी गायिकी को विश्लेषित करते हुए कहते है उनकी शास्त्रीय संगीत की परंपरा पटियाला घराने के उस्ताद अता मोहम्मद खान और किराना घराने के दिग्गज उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से संबद्ध रही है वे जहां पटियाला घराने की गंभीर गायकी में अपने उस्ताद से गजल, ठुमरी और दादरा सीखने में व्यस्त रहीं, ठीक उसी समय उन्हें किराना घराने के ख्याल की बारिकियों को सीखने का अवसर मिला बेगम अख़्तर की पूरी सांगीतिक यात्रा, इन्हीं दो घरानों के बीच किसी नाजुक बिन्दु पर संतुलित मिलती है, जिसमें उनकी आवाज़ ख्याल ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और ग़जल से होती हुई अद्भुत पुकार-तान व आकार लेने की असमाप्त मीड-मुरकियों-पलटों के साथ खनकती हुई पास आती है' यतीन्द्र के मुताबिक उनके लिए संगीत सिरजना सिर्फ़ राग, ताल और धुनों पर ही आधारित काम नहीं था, बल्कि वे गीत के शब्दों और बोलों को सटीक अर्थ व्याप्ति के लिए भावों को बहुत गौर से बरतने में तल्लीन दिखाई पड़ती हैं। बेगम अख़्तर की गायिकी के इस वैभव के नज़दीक जाने के लिए उनके जीवन के नज़दीक जाना अनिवार्य है। अंतिम दिनों में एक उद्घोषिका ने रेडियो पर उनको बेग़म अख़्तर कह कर सम्बोधित कर दिया था तो बेगम ने उससे कहा था "बेटी पूरी जिंदगी तो गमों के बीच ही गुजरी है, मैं बेग़म कहाँ हूँ?' बिब्बी से अख़्तरी, अख़्तरी से अख़्तरीबाई फैज़ाबादी और अख़्तरीबाई फैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बनने के उनके सफ़र में ग़म और गायिकी दोनों उनके हमसफ़र बने रहे। जन्म फैज़ाबाद के क़रीब भदरसा कस्बे में जुड़वा बहन के साथ 7 अक्टूबर 1914 को हुआ। नाम मिला बिब्बी उर्फ़ अख़्तरी उनकी माँ मुश्तरीबाई अपने ज़माने की मशहूर गाने वाली थी जबकि वालिद सैयद असग़र हुसैन सिविल जज थे, जिन्होंने मुश्तरी को किसी महफ़िल में सुना था और फिर दूसरी बीवी के तौर पर अपने घर ले आए थे। अख़्तरी अभी तीन साल की भी नहीं हुई। थीं कि उनकी जुड़वा बहन अनवरी का इंतकाल हो गया और इसके थोड़े ही वक़्त बाद उनके वालिद ने उनकी माँ  मुश्तरी को छोड़ दिया। माँ पर पड़ी दुखों की इस दोहरी मार को अख़्तरी ने भी बहुत छोटी उम्र में ही न केवल महसूस किया बल्कि उनके साथ-साथ भोगा भी। अख़्तरी की माँ उनके सबसे नज़दीक थीं। उनकी पूरी शख़्सियत पर माँ की अटूट छाप दिखाई देती है। माँ ने तमाम खतरात और नो हवादिस के बीच जिस तरह अख़्तरी की तरबियत की वो भी अपने आपमें एक मिसाल है। आकाशवाणी के लिए बेगम अख़्तर के जीवन पर 'कुछ नक़्श तेरी याद के' जैसा चर्चित धारावाहिक लिखने वाले य पत्रकार अटल तिवारी मुश्तरी के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं- 'मुश्तरी के जिस तरह का अविश्वसनीय संघर्ष अपनी बेटी का मुस्तकबिल संवारने के लिए किया वो उन्हे अपने आपमें किसी प्रेरणाप्रद नायिका की तरह सामने लाता है। उस वक़्त के समाज में बेटी को अकेले पालना, उसे कोठे की रिवायत से निकालने के लिए अलग-अलग शहरों में ले जाकर बड़े-बड़े उस्तादों से तालीम दिलवाना, बेटी की तालीम के लिए अपना सब कुछ बेच देना वगैरह इस बात की बानगी है कि मुश्तरी में किस दर्जे की दूरदर्शिता, प्रगतिशीलता और विद्रोह था.’


चित्र - गूगल से साभार 

बचपन की पढ़ाई लिखाई में अख़्तरी का ज्यादा मन नहीं लगा अलबत्ता फैज़ाबाद के मिशन स्कूल में वो टीचर की चोटी काट देने जैसे कारणों से ज़्यादा जानी जाती रहीं। लेकिन माँ से नज़दीकी की वजह से गायिकी की तरफ बचपन से ही उनका संजीदा रूझान रहा। इसे देखते हुए माँ ने मशहूर सारंगी वादक उस्ताद इमदाद अली खां से अख़्तरी को सिखाने को कहा। अख़्तरी ने अभी सीखना शुरू ही किया था कि फैज़ाबाद में उनका घर जला दिया गया। पतियों द्वारा छोड़ी जा चुकी तवायफों के ऊपर इस तरह के खतरे उन दिनों आम थे। फैज़ाबाद से दाना-पानी उठने के बाद माँ बेटी ने बिहार के गया का रूख किया। गया पहुंचने के बाद मुश्तरी ने बेटी की संगीत शिक्षा की तरफ और संजीदगी से ध्यान दिया। गहने बर्तन बेच बेचकर उन्होंने बेटी को पहले सखावत हुसैन और फिर पटियाला घराने उस्ताद अता मोहम्मद से तालीम दिलवाई। माँ के अलावा अख़्तरी की गायिकी पर बुनियादी असरात अता मोहम्मद के ही दिखते हैं। सीखा भी अख़्तरी ने सबसे ज़्यादा उन्हीं से ।

जब पहली बार शोहरत को महसूस किया

1934 में ही मेगाफोन कंपनी के मालिक जे. एन. घोष ने उन्हें छह ग़ज़लें रिकॉर्ड करने का प्रस्ताव दिया जिसे अख़्तरी ने कुबूल कर लिया। दिलचस्प बात ये है कि अख़्तरी जब रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो पहुंची तो उस पूरे दिन में तमाम कोशिशों के बावजूद सिर्फ़ एक ग़ज़ल रिकॉर्ड हो सकी। क्योंकि अख़्तरी को माइक्रोफ़ोन से डर लग रहा था। उन्होंने सुना था कि माइक के सामने गाने पर वो आवाज़ खीच लेता है, गाते वक़्त ये खयाल आते ही उनकी लय बिगड़ जाती थी। इसलिए पहले दिन वो सिर्फ़ एक ग़ज़ल रिकॉर्ड कर पाईं लेकिन अगले दिन जब कंपनी वालों ने उन्हें समझाया बुझाया तो उन्होने बाकी ग़ज़लें पूरे उत्साह से रिकॉर्ड करवाई। रिकॉर्ड की गई उनकी पहली ग़ज़ल थी वो असीरे दामे बला हूँ। मेगाफोन द्वारा जारी किया गया ये रिकॉर्ड चल निकला और अख़्तरी ने पहली बार शोहरत को महसूस किया।

इसके बाद उनके ठुमरी, दादरे, चैती और खयाल गायिकी के भी कई रिकॉर्ड्स निकले और कामयाब रहे। जिसके चलते 1936 में ऑल इंडिया रेडियो कोलकाता ने भी उन्हें रिकॉर्ड किया। इस बीच वो बतौर अभिनेत्री फ़िल्म और थिएटर में काम करना भी शुरू कर चुकी थी। लैला मजनूं (1934) और नई दुल्हन (1934) उनके मशहूर नाटक थे। साथ ही नल दमयंती (1933) एक दिन का बादशाह (1933), मुमताज़ बेगम (1934), अमीना (1934), रूपकुमारी (1934) जवानी का नशा (1935), नसीब का चक्कर (1936) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेत्री के बतौर काम करने के बाद उनकी शोहरत अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई थी और इसका सीधा फायदा उनकी व्यावसायिक गायिकी की साख को हुआ था। मेगाफोन कंपनी अब उनके रिकॉर्ड्स का बकायदा विज्ञापन जारी करती थी जिस पर उनका परिचय लिखा होता था- 'अख़्तरीबाई फैज़ाबादी फिल्म स्टार' इस दौरान एक फिल्म कंपनी बिना उनका बकाया चुकाए बंद हो गई थी तो उन्होने उस पर मुकदमा करने की भी ठान ली थी। इसी सिलसिले में 1937 में लखनऊ के बैरिस्टर इश्तियाक अहमद सिद्दीकी से उनकी पहली मुलाक़ात हुई थी। लगभग इसी दौर में जानकीबाई, मलकाजान, अनवरीबाई, रसूलनबाई, अंगूरबाला, अनारबाला, जद्दनबाई (नरगिस की माँ), राजकुमारी, जोहराबाई अम्बालेवाली, खुर्शीद, जहांआरा और नसीमबानो जैसी तवायफ़ परंपरा से आने वाली कई मशहूर गायिकाएं थीं जिनके अपने अपने मुरीद थे। लेकिन थोड़े ही वक्त में जो शोहरत अख़्तरी ने कमा ली थी उसके मुकाबले ये सब मद्धिम पड़ रहीं थीं। अख़्तरी को अब हिन्दुस्तान के प्रमुख दरबारों से खुसूसी न्योता भी मिलने लगा था। निज़ाम हैदराबाद ने उनके लिए अब आधा वक्त रामपुर में और आधा लखनऊ में गुज़ारने लगी थीं।


चित्र - गूगल से साभार 

वही विनम्रता वही तकल्लुफ़, वही अंदाज़-ए-बयां, वही सुखनफ़हमी, वही दरियादिली, वही नफ़ासत। अपनी मिट्टी अपनी तहज़ीब से वो गहरे जुड़ी थीं, अवधी जायके की भरपूर शौक़ीन । पान और कैप्सटन सिगरेट भी उनके साथ हमेशा रहे। लखनवी चिकन की  साडियां भी उनको बहुत भाती थीं। साड़ी वैसे भी उनका पसंदीदा लिबास था। लखनऊ में उनके तहजीबी रखरखाव का चर्चा भी उनकी गायिकी जैसा ही था। शायद इसी की वजह से दुनिया भर में उन्हें लखनवी तहजीब का हुस्न-ए-मुजस्सिम माना जाता था वो ख़ुद भी इसकी अहमियत बख़ूबी समझती थी।

1938 में अख़्तरी ने लखनऊ में अपना खुद का घर बनवाया। वो भी हजरतगंज जैसे मुख्य इलाके के पास ये कदम उनके रूतबे का पता देता है। क्यूंकि उस वक्त तक लखनऊ की ज्यादातर गानेवालियां चौक या दूसरे इलाकों की गलियों में रहती आई थी, हजरतगंज के आस पास उनका कयाम कभी नहीं रहा था अख़्तरी ने ये दस्तूर बदला। क्योंकि शहर के ज्यादातर रईस हजरतगंज के आस पास ही रहते थे अतः व्यावसायिक तौर पर ये जगह उनके लिए ज्यादा मुफ़ीद थी। फिल्म अभिनेत्री होने के बावजूद उनकी ज़्यादा मजबूत पहचान गायिका की ही थी। रामपुर दरबार से जुड़ जाने के बाद भी लखनऊ में वो महफ़िलों का हिस्सा लगातार बनी रहीं। मशहूर गायिका मालिनी अवस्थी बेगम की गायिकी के बारे में दो महत्वपूर्ण बातें हुए कहती है- 'पहली बात तो ये है कि वो जिस मिट्टी की थीं यानी लखनऊ-फैज़ाबाद उसके संगीत की तमाम विधाओं को उन्होंने इस ख़ूबी के साथ गाया कि वो सभी पूरी दुनिया में पहुंच गई। ठुमरी, दादरा, चैती, होरी, कजरी, मर्सिया, ग़जल सब कुछ उन्होंने अपने आपको कभी किसी एक विधा (जैसे ग़ज़ल) में महदूद नहीं किया। ये काम उनके चाहने वालों ने किया। दूसरी बात कि उन्होंने कठिन चीजें भी जिस सहजता से गा दी है वो बताता है कि उनका अपनी आवाज़ पर कितना कमाँड था।

लड़कपन की शोख़ी संजीदगी में बदल रही थी

1940 के आसपास उनका फ़िल्मों से जी उचाट होने लगा था। क्योंकि उनके उस्ताद अता मोहम्मद और बाद में अब्दुल वहीद खां को फ़िल्मों में काम करना गायिकी के साथ अन्याय लगता था। दोनों इसके खिलाफ़ थे। नवाब रामपुर भी उनके फ़िल्मों में काम करने के पक्ष में नहीं थे। अतः महबूब खान की फिल्म रोटी (1942) के बाद उन्होंने फ़िल्मों से किनारा कर लिया। अब वो पूरा ध्यान अपनी गायिकी पर दे रही थी उम्र अब तीस के करीब पहुंच रही थी इसलिए लड़कपन की शोखी अब संजीदगी में बदल रही थी जिंदगी एक दूसरे तरह का स्थायित्व चाह रही थी। नवाब रामपुर ने उनसे शादी करने की ख़्वाहिश भी जताई लेकिन अख़्तरी ने खुद को नाचीज़ कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने अपने लिए लखनऊ के बैरिस्टर अब्बासी को चुना जिनसे उनकी पुरानी आश्नाई थी। दोनों एक दूसरे के क़ायल भी थे। मगर अख़्तरी के गाने बजाने का पेशा अब्बासी और उनके बीच दीवार बना हुआ था अब्बासी को हरगिज मंजूर नहीं था कि उनकी रफ़ीक़े  हयात इस तरह सबके सामने गाना गाए। फिर एक दिन अख़्तरी ने फैसला कर लिया कि वो गाना छोड़कर अब्बासी का हाथ थामेंगी। हुआ भी ऐसा ही 1945 में अख़्तरी बाई फैज़ाबादी बेगम अख़्तर बन गई और गायिकी से उनका रिश्ता टूट गया।

1951 में कोलकाता में हुए संगीत सम्मेलन में भी उन्होंने शिरकत की जिसमें शास्त्रीय संगीत के बड़े-बड़े पुरोधा हिस्सा ले रहे थे। यहां भी वो बेहद कामयाब रहीं आमजन के अलावा कई पंडितों उस्तादों ने भी उनकी जी खोलकर तारीफ़ की। भारत रत्न मरहूम बिस्मिल्ला खां ने एक दफ़ा बेगम अख़्तर की गायिकी के बारे में बात करते हुए कहा था- बेगम अख़्तर के गले में एक अजीब कशिश थी। जिसे अकार की तान कहते हैं उसमें अ करने पर उनका गला कुछ फट जाता था और ये उनकी ख़ूबी थी। मगर शास्त्रीय संगीत में यह दोष माना जाता है। एक बार हमने कहा कि बाई कुछ कहो जरा कुछ सुनाओ वे बोली- अमाँ क्या कहें। का सुनाएं। हमने कहा कुछ भी बेगम गाने लगी- निराला बनरा दीवाना बना दे। एक दफ़े, दो दफ़े कहने के बाद जब दीवाना बना दे में उनका गला खिचा तो हमने कहा अहा ! यही तो सितम है तेरी आवाज़ का वो गला दुगुन-तिगुन के समय लहरा के मोटा हो जाता था। वही तो कमाल था बेगम अख़्तर में।'


चित्र - गूगल से साभार 

सिनेमा, शोहरत और शागिर्द

दोबारा गाना शुरू करने के बाद जल्द ही बेगम की ज़िंदगी पटरी पर आ गई थी। उनके पास लगातार गाने के प्रस्ताव आ रहे थे। लेकिन इसी बीच 1951 में ही उनकी माँ मुश्तरी की मौत के बाद वो तीन चार महीने फिर संगीत से दूर रहीं। सदमे में थीं। उनका ज़्यादातर वक़्त लखनऊ के पसंदबाग़ स्थित अपनी माँ की कब्र पर गुज़रा। उनकी ज़िंदगी में माँ की भूमिका ही ऐसी थी जिसकी पूर्ति संभव नहीं थी। बहरहाल तबीयत कुछ संभली तो उन्होंने फिर से गाना शुरू किया।

1952 में बेगम अख़्तर ने आल इंडिया रेडियो के अखिल भारतीय संगीत समारोह में शिरकत की और समारोह लूट लिया। इसके बाद फिर से बेगम अख़्तर की शोहरत आसमान छूने लगी। रिकार्डिंग पर रिकॉर्डिंग होने लगी। पूरे मुल्क में गाने के लिए बुलाई जाने लगीं। फ़िल्मों के ऑफ़र भी दोबारा आने लगे। मगर बेगम ने अभिनय पर हामी नहीं भरी पार्श्वगायन भी नाचरंग (1953), दानापानी (1953) और एहसान (1954) जैसी कुछ ही फ़िल्मों के लिए किया। हालांकि जलसाघर (1958) में ज़रूर वो गायन के साथ साथ स्क्रीन पर भी दिखीं। क्योंकि ये अंतरराष्ट्रीय फलक पर पहचाने गए फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म थी जिनके आग्रह को बेगम ठुकरा नहीं पाई। अब उन्हें विदेशों से भी न्योते मिलने लगे थे। खुद भारत सरकार उनसे सांस्कृतिक प्रतिनिधि मंडल का सदस्य बनने का आग्रह कर चुकी थी। 1961 में भारत सरकार के सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल में शामिल होकर बेगम पाकिस्तान गईं। वहां उन्होंने ग़ज़लों के साथ साथ ठुमरी और दादरे का भी जादू चलाया। इस आयोजन में पहली बार बेगम को ये अंदाजा हुआ कि हिन्दुस्तान की सरहद पार भी लोग दीवानावार उनके संगीत को सुनते है। 1963 की अफ़ग़ानिस्तान और 1967 की रूस यात्रा में भी वो इसी तरह सब पर ग़ालिब रहीं। इस बीच एक के बाद एक उन्होंने कई विदेश यात्राएं की।

ख़ुद एक तजुर्बेकार गायिका के रूप में स्थापित होने के बाद बेगम ने अपना तजुरबा नई पीढ़ी को देने का मन भी बनाया। लड़कियां गाना सीखें इस बात के लिए वो हमेशा पेश रहीं। उनकी माँ ने उन्हें गाना सिखाने के लिए जो संघर्ष किया था वो उसे भूली नहीं थीं। माँ के इंतकाल के बाद उन्होंने विधिवत लड़कियों को तालीम देना शुरू किया। संगीत के क्षेत्र में गण्डा बन्धन की परम्परा का बड़ा महत्व है। 1952 में बेगम अख़्तर पहली महिला उस्ताद बनीं, जिन्होंने अपनी शिष्याओं का गण्डा बन्धन किया। बेगम ने सबसे पहले शांति हीरानंद और अंजलि चटर्जी को गंडा बांधकर सिखाना शुरू किया। उसके बाद दूसरी गायिकाओं ने भी अपनी शिष्याओं के गण्डा बन्धन शुरू कर दिया।


शोहरत से इतर 1950 से 1974 का दौर उनकी गायिकी की शिनाख़्त के लिहाज से उनका सबसे मजबूत दौर था और काम के लिहाज से व्यस्ततम देश-विदेश में अब वो हिन्दुस्तानी उपशास्त्रीय गायन का सबसे बड़ा नाम थीं। 1968 में भारत सरकार ने संगीत में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 1972 में उन्हें केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी अवार्ड और 1973 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिला। देश के दूसरे बड़े संगीत संस्थानों ने भी उन्हें सम्मानित किया। उनके शहर लखनऊ के मशहूर भातखण्डे संगीत संस्थान ने उन्हे प्रोफेसर का पद दिया। कामयाबी की इस मसरूफ़ियत के बीच उनका स्वास्थ्य भी उन्हे अपनी अहमियत की चेतावनी देता रहा। 1967 में उन्हें दिल का पहला दौरा पड़ा। ठीक होने के तुरंत बाद वे फिर गाने लगी। जीवन के आख़िरी साल 1974 में दोबारा उन्हे दौरा पड़ा। स्वास्थ्य संभला तो फिर गायिकी शुरू। असल में गायिकी से दूर रहना उनके बस का ही न था। अक्टूबर 1974 में उन्होने आकाशवाणी बंबई के सम्मेलन में शिरकत की और अपने इंतकाल के एक हफ़्ते पहले आकाशवाणी के लिए अपनी आखिरी ग़ज़ल 'सुना करो मेरी जां...' रिकार्ड की। ये उन्ही कैफ़ी आज़मी का कलाम था जिन्होने बेगम अख़्तर की गायिकी से मुतासिर होकर ही दोबारा ग़ज़लें कहना शुरू किया था। 31 अक्टूबर 1974 को अहमदाबाद के एक कार्यक्रम में गाते हुए एक बार  फिर उन्हें दिल का दौरा पड़ा और इसी रात उनका इंतकाल हो गय 1975 में भारत सरकार ने बेगम अख़्तर को मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मानित किया।

उनके निधन की खबर सुनकर दुनिया भर में उनके प्रशंसको की हालत बुरी थी। कहा जाता है कि लखनऊ में तो उनका एक चाहने वाला ये ख़बर सुनकर पागल हो गया था और लखनऊ की दीवारों पर हाय अख़्तरी ! हाय अख़्तरी ! लिखता उसी तरह सड़कों पर भटकता था जिस तरह मजनूं दश्त में अख़्तरी का ये दीवाना असल में एक सब्जी-फरोश था जो हैवलक रोड के आस पास से अपना ठेला लेकर गुजरते हुए आवाज़ लगाता था 'अख़्तरी के बाग़ की सब्ज़ी ले लो.' बेगम की इच्छा के अनुरूप उन्हें लखनऊ के ही पसंदबाग स्थित अपनी माँ की कब के पड़ोस में दफ़नाया गया। बेगम की मौत के बाद लंबे समय तक ये जगह लगभग उपेक्षित रही। इसकी हालत देखकर ऐसा लगता था कि मानो बैकग्राउंड में बेगम की ग़ज़ल बज रही हो- 'अब तो यही हैं दिल से दुआएं, भूलने वाले भूल ही जाएं...। 'उनके जन्मस्थान भदरसा में भी वो लगभग बिसरा दी गई है। लखनऊ तो लोग ख़ास बेगम अख़्तर का मजार देखने की ख्वाहिश लिए आते रहे और निराश होकर लौटते रहे। आस-पास के लोगों तक को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। फिर अभी तीन साल पहले लखनऊ की जानी-पहचानी सामाजिक संस्था 'सनतकदा' ने बेगम की शिष्या शांति हीरानंद और इतिहासकार सलीम किदवई के सहयोग से उनके मज़ार का जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण करवाया। साथ ही इस बात के लिए भी प्रयास किया कि इस जगह के बारे में ज़्यादा से ज्यादा लोग जानें। फेसबुक पर भी बेगम अख़्तर के मज़ार का एक पेज बनाया गया। संस्था के ही प्रयास से हर साल बेगम के जन्मदिन पर यहां संगीत की एक नशिस्त भी आयोजित होती है, जिसमे शुभा मुद्गल और शांति हीरानंद आदि बेगम को श्रद्धांजलि दे चुकी हैं।

चित्र - गूगल से साभार 

तकरीबन चालीस साल की अपनी गायिकी में बेगम अख़्तर ने जिस चीज को गा दिया वो अमर हो गई। बहज़ाद लखनवी कहा करते थे। कि वो हश्र तक सिर्फ़ इसी वजह से याद रखे जाएंगे क्योंकि बेगम अख़्तर ने उनको गा दिया। बेगम अख़्तर जब पहली बार पाकिस्तान गई और मेज़बानों ने उनसे पूछा कि आपकी क्या खिद्मत की जाए तो बेगम ने बहज़ाद लखनवी से मिलने की ख़्वाहिश जताई और मिलीं भी। उन्होंने बहज़ाद की कई ग़ज़लें गाई जिनमे 'दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे' सबसे कामयाब हुई। सिर्फ बहज़ाद ही नहीं उस दौर के तमामतर शाइरों की ख़्वाहिश ये थी कि बेगम अख़्तर उनका कलाम गा दें। 1970 में जब शकील बदायूंनी बीमार पड़े और मृत्युशैय्या पर उन्होंने अपनी आखिरी ग़ज़ल मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा कही तो उनकी भी आख़िरी ख़्वाहिश यही थी कि बेगम अख़्तर उनकी इस ग़ज़ल के साथ इंसाफ़ कर दें। बेगम अख़्तर ने शकील की आख़िरी ख़्वाहिश का एहतराम करते हुए इस ग़ज़ल को यूं गाया कि ये ग़ज़ल हमेशा के लिए बेगम अख़्तर की पहचान बन गई। शकील के साथ बेगम अख़्तर के कुरबत के मरासिम थे। बेगम ने शकील की कई ग़ज़लें गाईं जिनमें ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, ज़िंदगी का दर्द लेकर इंक़लाब आया तो क्या वगैरह बहुत कामयाब हुईं। कैफ़ी से उनके रिश्ते की बात पहले हो चुकी है। फ़ैज़ एवं मजरूह के कलाम को भी उन्होने गाकर मक़बूलियत दी । कुछ तो दुनिया की इनायात के साथ सुदर्शन फाकिर को भी बेगम अख़्तर ने जाविदां कर दिया।

समकालीनों के अलावा बेगम ने क्लासिकी शोअरा को भी पूरी शिद्दत से गाया। मीर, ग़ालिब, ज़ौक और मोमिन को पहली बार आवाम के बीच उनकी गायिकी ही ले गई। वो जो हममें तुममें क़रार, उल्टी हो गईं सब तद्वीरें... और ज़िक्र उस परीवश ... की कशिश कौन भूल सकता है। ग़ज़ल गायिकी को एक स्वतंत्र विधा के तौर पर स्थापित करने में बेगम अख़्तर का अमर योगदान है। उन्होंने ग़ज़ल को कोठे से आज़ाद कराया।

चित्र - गूगल से साभार 




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