नव पर नव स्वर दे - विनय उपाध्याय
कलुष भेद तम, हर प्रकाश भर, जगमग जग कर दे... हताश और हारे हुए जीवन में उम्मीद के उजियारे की पवित्र कामनाओं को जगाता यह छंद यक़ीनन बुज़ुर्ग और प्रौढ़ हो चली पीढ़ी की स्मृतियों में अब भी किसी मंत्र की तरह झंकृत होता होगा। इसे बाँचते-सुनते ही अनायास पूरी कविता कौंध रही होगी। याद्दाश्त में लहराती धुनों के सहारे उनका कंठ गा रहा होगा- "वर दे वीणा वादिनी वर दे। प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव, भारत में भर दे"।
अंतरजाल
में गाफ़िल आज की नई नस्ल को यह वासंती संदेश बेगाना और कुछ पुरातन-पारंपरिक सा लगे
लेकिन साहित्य की अमृत-बूंदों का आचमन कर ज़िन्दगी के होश थामने वाली पीढ़ी के लिए
शब्द और वाणी की महारानी सरस्वती के प्रति यह निवेदन जीवन की धन्यता का उद्घोष है।
...भाषा-भारती,
पाठ-एक। वर दे! कवि-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला। यही तो था मंगलाचरण।
किताब का पहला शब्द-पुष्प। पाँखुरी-पाँखुरी खिलता जैसे पूरे मानस को महक से भर
देता। गुरुजी विस्तार से इस कविता का अर्थ समझाते और अबोध मन वाग्देवी के चित्र को
कौतुहल से निहारता! भीतर कोई लौ जागती। एक भरोसा किसी कोने में जगह बनाता कि तमाम
दुश्वारियों के बावजूद कोई शक्ति है जो समाधान की रौशनी लिए हमारे कर्मपथ पर फैले
काँटे बुहारकर राह आसान बनाती रहेगी।
इस कविता
का संदर्भ इसलिए कि वसंत की पंचमी हिन्दी के महाप्राण कवि निराला के इस नश्वर
संसार में पैदा होने का मुहूर्त है। निराला ने अपने रचनाशील जीवन में विपुल और
विविध लिखा। वे छायावाद के अप्रतिम कृतिकारों जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा और सुमित्रा नंदन पंत के साथ खड़े एक ऐसे विलक्षण कवि रहे
जो हिन्दी के आधुनिक परिसर में नई क्रांति के प्रतीक माने जाते हैं। यूँ निराला की
साहित्यिक मेधा और उनकी महिमा को कई कोणों से मापा जा सकता है लेकिन उनके पक्ष में
सर्वाधिक महत्व की बात ये है कि निराला भारतीय संस्कृति, जीवन
मूल्यों, इतिहास, दर्शन और विश्व
मानवीय दृष्टि से समृद्ध व्यक्तित्व थे। संघर्ष उनकी कुंडली में स्थायी भाव की तरह
था। निराला इसी आँच में तपकर जीवन के गीत गाते रहे। कविता-वर दे... के आसपास रहकर
निराला की साहित्य साधना को समझें तो अनेक दिशाएँ खुलती दिखाई देती हैं।
यह कविता
निराला ने 1936 में लिखी थी। उनके अत्यंत लोकप्रिय संग्रह
'गीतिका' में संकलित यह प्रथम गीत है। शब्द-प्रयोग और लय-गति के विन्यास को देखें
तो निराला नए छंद की रचना का साहस और सामर्थ्य प्रकट करते हैं। वे शब्द की आत्मा
में बसे गहरे नाद को, उसके अंत: संगीत को पहचानते हैं। वे
श्रृंगार, लालित्य और रस-भाव के शिल्पी हैं। कविता कहते-कहते
अनुप्रास (यानि एक ही वर्ण-अक्षर या शब्द का बार-बार प्रयोग) की छटा सहज ही उसमें
चली आती है। इन तमाम आग्रहों के साथ जब आप इस कविता के पूरे पाठ से गुज़रते हैं तो
मंत्र की तरह उसका असर शिराओं में प्रवाहित होता है। सचमुच, निराला
ने मंत्र ही तो रचा है-
वर दे!
वीणा
वादिनी वर दे!!
प्रिय
स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव
भारत में
भर दे
काट अंध
उर के बंधन स्तर
बहा जननि
ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद
तम हर प्रकाश भर
जगमग जग
कर दे
नवगति, नव लय, ताल छंद नव
नवल कंठ, नव जलद मंद्र रव
नव नभ के
नव विहग वृंद को
नव पर नव स्वर दे।
ग़ौर करने
की बात यह भी कि निराला ने इसे उस दौर में लिखा जब पराधीन भारत का आंतरिक संघर्ष
स्वाधीनता के सपनों के आसपास परवान चढ़ रहा था। तमाम बंधनों से मुक्ति की कामना के
लिए भीतर कसक थी। आज़ादी के आसमान पर अपने अरमानों के इन्द्रधनुषी रंग-बिखेरने की
हुमस थी। गति, गौरव और गरिमा के गीत गाने को कंठ मचल रहे
थे। ऐसे में निराला की कविता वरदान बनकर प्रकट होती है। पूरे देश की आत्मा की
आवाज़ बन जाती है। देवी सरस्वती से यही गुहार कि शापित कालखंड को मथकर नये विहान
(सुबह) का अभ्युदय हो! निश्चय ही यह कविता नयी गति, नई ताल,
नए छंद और नए स्वरों को थामती नये उन्मेष की इबारत बनी। आज भी
निराला का यह गीत एक आलोकित दीपशिखा की तरह हमारे अंत:करण के स्याह कोनों को नये
उजास से भरता है। शायर-फ़िल्मकार गुलज़ार कहते हैं कि गीत कभी बूढ़े नहीं होते।
उनकी झुर्रियाँ नहीं निकलतीं। किसी मौजूँ सी धुन में जड़ दो तो नगमा फिर से साँसे
लेने लगता है। इस गीत के साथ भी कमोबेश ऐसा ही है। अनेक संगीतकार-गायकों ने अलहदा
सी धुनों में इस रचना को पिरोया। संगीत की सोहबत में जैसे इस कविता को नए पंख मिल
गये। सारस्वत सभाओं से लेकर स्कूलों में होने वाली नियमित प्रार्थना में इसे एकल
और सामूहिक गाने की परंपरा हो गयी। शास्त्रीय राग-रागिनियों और लोक धुनों से लेकर
सुगम संगीत में ढलकर निराला का यह छंद देश-देशांतर में स्वच्छंद विचरण करने लगा।
किसी कृति के कालजयी हो जाने का उदाहरण इससे बेहतर और क्या हो सकता है!
लेकिन
इतनी स्वर-सिद्ध कविता रचने का कौशल अगर निराला के पास रहा इसकी एक बड़ी वजह शब्द
के साथ-साथ संगीत के प्रति उनकी अगाध असक्ति थी। उनकी गीतात्मक कविताओं से लेकर
छंद मुक्त रचनाओं तक में अंत: संगीत बहता हुआ दिखाई देता है। 'वर दे' और 'बादल राग'
से लेकर 'वह तोड़ती पत्थर' तक आते-आते निराला नए प्रयोगों की मिसाल गढ़ते हैं
लेकिन कविता का आरोह-आरोह और उसका ध्वनि सौन्दर्य कभी कम न हुआ।
दरअसल संगीत उनकी में प्रकृति प्रदत्त था। हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक 'निराला की साहित्य साधना' में निराला के संगीत प्रेम से जुड़े अनेक प्रसंगों की चर्चा की है। एक दिलचस्प वाकया कुछ इस तरह हुआ। पत्नी मनोहरा को एक दिन जब निराला ने तुलसी की 'विनय पत्रिका' का पद "कंदर्प अगणित अमित छवि नव, नील नीरद सुंदरम्" गाते हुए सुना तो उन्हें लगा जैसे गले में मृदंग बज रहा है। जैसे संगीत के सोते हुए संस्कार जाग गये। निराला को लगा कि साहित्य इतना सुंदर है और संगीत इतना आकर्षक! उनकी आँखों ने जैसे नया संसार देखा! कानों ने ऐसा संगीत सुना जो इस पृथ्वी पर किसी दूर लोक से आता हो।
तुलसीदास
के इस पद ‘श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन' से उन्हें मोह हो गया। एक अजीब विश्रांति और
आनंद वे इस छंद में महसूस करते। वे हारमोनियम पर इस पद को गाते तो आपे से बाहर आ
जाते। आवेश में उनकी माथे की नसें तन जातीं। वे शांत भाव से रामचरिमानस की
चौपाइयाँ गाते। उनके स्वर में पिघले हुए सोने का माधुर्य था। 'भैरवी' राग उन्हें
अत्यंत प्रिय था। इसी राग में निबद्ध रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविता उन्हें प्रिय थी
और किसी के आग्रह पर या अपनी रुचि से वे गाने लगते। निराला अक्सर संगीत के
शास्त्रीय पक्ष पर भी बहस करते। अपने कोलकाता प्रवास के दौरान उनका परिचय रवीन्द्र
संगीत से हुआ। टैगोर की संगीत दृष्टि से वे प्रभावित थे। किसी बंदिश को सुनते हुए
सम आने पर चुटकी बजाते। यानी लय-ताल का ज्ञान उन्हें था। वे रवीन्द्र संगीत में
आयीं कुछ पाश्चात्य धुनों के पक्ष में थे क्योंकि वे टैगोर की विश्व दृष्टि का
सम्मान करते थे।
निराला
के व्यक्तित्व में इन तमाम तत्वों का समावेश था। यह मुमकिन न होता अगर निराला
सरस्वती के सच्चे उपासक न होते और सरस्वती की अनन्य कृपा उन पर न होती। वर दे...
का लिखा जाना इसी परस्परता की परिणति है।

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