जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया - विनय उपाध्याय
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
वही है ज़िंदा
गरजते बादल
सुलगते सूरज
छलकती नदियों के साथ है जो
ख़ुद अपने पैरों की धूप है जो
ख़ुद अपनी पलकों की रात है जो
रुआंसी, बोझिल और हारी हुई
ज़िंदगियों के लिए उम्मीद की यह उजली इबारत निदा फाज़ली की नज़्म का एक टुकड़ा है
जिसे कभी मैंने अपनी डायरी के सफ़ह उतार लिया था। अब इन लफ़्ज़ों के मानी जैसे
मुश्किलों में हाथ थामते हैं। एक मक़बूल शायर से मेरा यह पहला तआरुफ़ था। सामना भले
ही न हुआ हो पर एक रुहानी तार ज़रूर जुड़ गया। इत्तफ़ाक़न भोपाल की कई महफ़िलों में जब
वे नमूदार हुए तो हसरत पूरी हुई। फ़ासले सिमटे और मौजूदा दौर के एक बुलंदपाया शायर
से गुफ़्तगू के मौक़े मुहैया हुए।
ज़िक्र उस लम्हे का जब उन्हें सिने गीतकार शैलेन्द्र
की स्मृति में स्थापित सम्मान के लिए चुना गया था। प्रसंगवश गुज़रते कारवाँ पर उनकी
राय जानने की इच्छा हुई। अव्वल तो निदा ने शैलेन्द्र को साहिर के बाद दूसरा अपना
पसंदीदा फिल्मी गीतकार माना। कहा कि शैलेन्द्र इन मायनों में जुदा थे कि उन्होंने
सिनेमा जैसे बड़े माध्यम के लिए बे-साख़्ता,
बेशुमार
और मुख़्तलिफ़ लिखा। वे एक्टिविस्ट थे। उनकी पहचान भारत की लोक संवेदनाओं से जुड़ती
है, जब वे “सजन रे झूठ मत बोलो” और “पान खाए सैयां हमार” लिखते हैं। निदा, शैलेन्द्र को सीरियस लिट्रेचर से आया गीतकार नहीं मानते
लेकिन बक़ौल उन्हीं के, साहित्य की अलग स्थापित
दुनिया से दूर सिल्वर स्क्रीन के लिए टची और टिकाऊ लिखना कम चुनौतीपूर्ण नहीं।
निदा फाज़ली सदा की तरह ताज़ादम, हाज़िर जवाब, मुखर लेकिन हर बात तर्कों के साथ पेश करने में माहिर रहे।
याददाश्त के धनी और पहचान के मुताबिक़ मुकम्मल शायराना और यारबाज़। अपने वक़्ती हालातों से इतने गहरे वाबस्ता कि
सवाल सियासत, समाज, मज़हब और अदब से
जुड़ा हो, दो टूक बयानी के लिए फौरन तैयार।
दिलचस्प ये कि हर बात का आख़िरी सिरा उम्मीद की डोर से गाँठ बाँध लेता। फिर याद आती
है उन्हीं की एक नज़्म-
धरती और आकाश का रिश्ता
जुड़ा हुआ है
इसीलिए चिड़िया उड़ती है
इसीलिए नदिया बहती है
रात और दिन के बीच
कहीं सपना ज़िंदा है
मरी नहीं है
अब तक ये दुनिया ज़िंदा है
ये सच है कि निदा फाज़ली की रचनाएँ उदास हो रही दुनिया
के लिए एक आश्वासन की तरह है। वे अपने समय को चुनौती देती है और समय में ही जीवन
की स्थापना भी करती है। हर दौर में रावण है,
तो राम भी
हैं. कंस है, तो कृष्ण भी हैं। हमें ख़ुद अपने
भीतर प्रतिकार की ताकत जुटानी होगी। बुझा मन लेकर ज़िंदगियाँ नहीं जी जातीं.
...जितनी बुरी कही जाती है, उतनी बुरी नहीं है
दुनिया...’’

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