घाव पर मरहमी आवाज़ - एस सहाय रंजीत

 घाव पर मरहमी आवाज़

एस. सहाय रंजीत 



शायद ही कोई और गायक ग़ज़ल के साथ इस कदर एकाकार जितने कि ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह। ख़ुशी और शरारत, दोनों उनके साथी थे। जब वे अपनी जादुई आवाज़ से श्रोताओं को अपने आगोश में बांध रहे होते थे तो एक शरारत सी उनकी आँखों में चमक उठती थी। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पूरी दुनिया में आधे अरब से ज्यादा लोग उनके दीवाने हैं। जाने-माने कवि निदा फ़ाज़ली कहते हैं, "यह जगजीत की आवाज़ का जादू है। उसमें एक मां की मिठास है, पिता के प्रेम का सौंदर्य है, किसी गहरे प्रगाढ़ रिश्ते जैसी कोमलता है। उनकी आवाज़ घाव पर मरहम की तरह है। वह आप तक आती है और बिना कुछ लिए, मांगे वापस चली जाती है।" यही वह जादुई आवाज़ थी, जो हमेशा-हमेशा के लिए 10 अक्टूबर 2011 को शांत हो गई।

जब वे छोटे से शहर गंगानगर से अपनी क़िस्मत आज़माने मुंबई महानगर में आए थे तो एकदम युवा थे। फिर उन्होंने बेशुमार शोहरत और सफलता बटोरी और संगीत की दुनिया में अपना मुकाम बनाया। शास्त्रीय गायिका रीता गांगुली कहती हैं, "मुझे याद है कि महान गायिका बेग़म अख्तर से ग़ज़लों की रिकॉर्डिंग के लिए एचएमवी में उनका परिचय करवाया था। वे उस दौर में आए थे, जब ग़ज़ल के लिए तलत महमूद की आवाज़ एक तयशुदा रूप अख्तियार कर चुकी थी। तब फिल्मी संगीत में एक किस्म का धीमा ठहराव था और जगजीत सिंह अपनी गीतनुमा ग़ज़लों के साथ संगीत की दुनिया में हवा के ताज़े झोंके की तरह आए। उनकी आवाज़ में एक अनूठापन था। वह अपनी तरह की निराली आवाज़ थी। आप किशोर कुमार या मुहम्मद रफ़ी की नकल कर सकते हैं, लेकिन जगजीत की आवाज की नकल नहीं की जा सकती। यही कारण है कि जगजीत सिंह तो सिर्फ एक ही रहेगा।"

चित्र - गूगल से साभार 

जगजीत सिंह में यह अंतर्बोध था कि श्रोता क्या चाहते हैं, थोड़ा-सा साथ, साझेदारी और उत्साह, उनके सभी संगीत कार्यक्रमों में यह बात होती थी। वे श्रोताओं के साथ काफी सहज थे। वे जानते थे कि उनको संगीत के झोंकों में कैसे बहा ले जाना है। जैसे कि वे श्रोताओं को भी अपने साथ गाने के लिए कहते या कोरस के साथ-साथ खुद भी गाते थे। संप्रेषण की उनकी कला और तकनीक कमाल की थी। वे कहते थे, “मेरे गाने की कला, गीतों और कविताओं का चयन और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है श्रोताओं के साथ कि संवाद, पता है, लालू प्रसाद यादव का इतना नाम क्यों? क्योंकि वे वी न सिर्फ आम आदमी के साथ, बल्कि संसद में और टेलीविजन पर भी के के बेहतर संवाद करते हैं। यह किसी भी कलाकार की मूल अंतर्वस्तु की है।" उनका कहना बिल्कुल सही था। जब पॉप संगीत, रीमिक्स और आइटम गीतों के ज़माने में वास्तविक संगीत के लिए अस्तित्व का में संकट खड़ा हो गया और ग़ज़ल का महत्व कम होने लगा तो उन्होंने न अपने वीडियो लांच किए, वे एक ऐसे ग़ज़ल गायक बन गए, जिनका वीडियो भी था। उनका कहना था, "आज दृश्य चीज़ों का ज़माना है। आज संगीत सुना नहीं, देखा जाता है। एक दौर था, जब सिर्फ़ आवाज़ और संगीत हमारी पहचान थी, लेकिन अब हमें वीडियो पर दिखना पड़ता है, अपने एल्बम को प्रमोट करने के लिए कॉन्सर्ट करने पड़ते हैं, क्योंकि यही बिकता है। दुर्भाग्य से हम भी इन चीजों की में जकड़बंदी में फँस गए हैं।" वे आधुनिक बाज़ार को बखूबी समझते थे और उसी के मुताबिक अपने संगीत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कोशिशें भी कीं, उन्होंने परंपरा से अलग हटकर एक काम यह भी किया कि अपने कॉन्सर्ट में गिटार और वॉयलिन जैसे वाद्ययंत्रों को शामिल किया। उन्होंने यह इसलिए किया क्योंकि उन्हें अपने संगीत में वाद्ययंत्रों और ध्वनियों का वैविध्य उत्पन्न करना महत्वपूर्ण लगा। उनके कॉन्सर्ट में उपस्थित होना अपने आप में एक संपूर्ण, आत्मा को समृद्ध करने वाला अनुभव होता था। उन्होंने परंपरा से हटकर एक काम और किया। उन्होंने अपने एल्बम क्लोज टू द हार्ट में लता मंगेशकर, मुकेश, हेमंत कुमार, तलत महमूद और किशोर के 50, 60 और 70 के दशक के प्रसिद्ध गीत गाए, इसकी काफी आलोचना भी हुई, लेकिन चाहने वालों ने इसे हाथों-हाथ लिया। ग़ज़ल का बादशाह पुराने दौर के गीत क्यों गा रहा है? उन्होंने जवाब दिया, "अगर लता मंगेशकर और आशा भोंसले ऐसा कर सकती हैं तो फिर मैं क्यों नहीं?" वे अपनी तरह के विद्रोही भी थे। मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे प्रतिष्ठित शायरों को जनमानस में लोकप्रिय बनाने के अलावा उन्होंने नए कवियों को लोकप्रिय बनाने का काम भी किया।

चित्र -बद्री 

जीवन में घटी त्रासदियों ने बाद के दिनों में उन्हें अलग तरह का इंसान बना दिया था। पहले 21 वर्षीय बेटे विवेक की एक कार दुर्घटना में मौत हो जाने और फिर सौतेली बेटी की र मृत्यु के बाद वे काफ़ी बदल गए, वे कुछ आध्यात्मिक हो गए थे और कहते थे कि संगीत ही वह एकमात्र मरहम है, जो उन्हें उनके दुखों से निजात दिला सकता है। बाद के दिनों में उन्होंने आध्यात्मिक एल्बम जैसे हे राम, गुरबानी, कृष्णा आदि निकाले। जो सभी के सभी काफी हिट रहे । यही उनके संगीत और उनकी आवाज़ का जादू था। संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा कहते हैं, "उन्होंने ग़ज़ल को एक नया मोड़ दिया।" वे ग़ज़ल के भविष्य को लेकर चिंतित थे। वे कहते थे कि ग़ज़ल गायक को कविता और संस्कृति की भी समझ होनी चाहिए। आजकल तो कोई भी कुछ भी गा रहा है। उसमें कोई विवेक, समझ और संतुलन नहीं है। पुराने दिनों में ऑल इंडिया रेडियो में आवाज़ का ऑडीशन होता था और आप जो कविता गाते थे, उसे भी कवि जाँचते थे । वह जिम्मेदारी का काम होता था। मुझे तो इस बात की चिंता है कि आने वाले समय में हमारी संस्कृति का क्या होगा? हमारी आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा ? म्युजिक कंपनियां गायकों और कलाकारों के साथ जिस तरह का व्यवहार करती हैं, उसे लेकर भी वे काफी दुखी रहा करते थे।

ग़ज़ल गायकी के साथ-साथ उन्होंने अपने समय की कई बेहतरीन फिल्मों का संगीत भी तैयार किया। फिल्मों में दिया गया उनका संगीत सबसे अलग और अनूठा था। उनके संगीत की एक अलग पहचान बनी। उनका संगीत मधुर होता था और गीतों के शब्द बहुत अर्थपूर्ण हुआ करते थे। जीवन के आखिर के कुछ वर्षों में वे अपने ही भीतर के कलाकार को पार नहीं कर पाए, लेकिन जो भी हो, हिन्दी सिनेमा में उनके गाए गीतों की एक लंबी श्रृंखला है, जो दुख में डूबे हुए उदास दिलों को राहत और आराम पहुंचाने का काम करती है। उनके ऊपर सचमुच ईश्वर की कृपा थी। कुछ लोगों का तो कहना है कि ईश्वर ने उनके गले के लिए खासतौर पर संगीत के तार निर्मित किए थे। और यही एक चीज़ थी, जो उन्हें बाकी सभी गायकों से अलग करती थी। वह सुनहरी जादुई आवाज़ वाले संत आत्मा थेः तुम चले जाओगे तो सोचेंगे, हमने क्या खोया हमने क्या पाया।  अफ़सोस ! हमने बहुत कुछ खो दिया।

चित्र - गूगल से साभार 





रंग संवाद जुलाई-दिसंबर 2011 अंक में प्रकाशित आलेख  






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