बापू का कला प्रेम : विनय उपाध्याय
बापू का कला प्रेम
आत्मा के उजास में सच को देखने और अभ्युदय का नया अध्याय रचने वाले मोहनदास करमचन्द्र गांधी का चरित्र भारतीय जीवन मूल्यों में रची-बसी भरी-पूरी संस्कृति का आदर्श रहा है। स्वाधीनता के इस नायाब शिल्पी की शख्सियत संवेदना के उन सूत्रों में गुंथी है जहाँ मन के अथाह में शब्द, स्वर, रंग, लय और गतियों के आरोह-आरोह भी उन्हें आन्दोलित करते रहे। कलाओं से बापू के प्रगाढ़ प्रेम के अनेक किस्से हैं। गुलामी के खिलाफ़ पूरे हिन्दुस्तान को लामबंद करने वाले इस नायक को जितनी बार देखो, हर बार एक नया अक्स नुमाया होता है।
संगीत की
शक्ति पर बापू को अटूट भरोसा था। वे संगीत को कामधेनु कहते थे। उनका मानना था कि
अमन, एकता और आपसदारी का सच्चा और सनातन संदेश सात सुरों की
सोहबत में बड़ी ही सहजता से प्राप्त किया जा सकता है और इसके लिए संगीत का संत
साहित्य से रिश्ता जोड़ा जाना ज़रूरी है। गांधीजी की प्रार्थना सभाओं और प्रभात
फेरियों में सुबह-शाम सामूहिक रूप से भक्ति संगीत गाया जाता था। ये वे भक्ति पद थे
जिनका इस्तेमाल स्वाधीनता आंदोलन के दौरान शांति, समरसता,
शुचिता और आंतरिक मनोबल बनाए रखने के लिए उन्होंने किया। प्रसंगवश
यह जानना जरूरी है कि 1904 में हिन्दुस्तानी संगीत के आधुनिक
पुरोधा पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने महात्मा गांधी के स्वदेशी आन्दोलन में भाग
लिया था और कई सभाओं में उन्होंने रामधुन 'रघुपति राघव राजा राम' गाकर लोक की
आत्मा में स्वाभिमान का आलोक बिखेरा।
1915 में जब बापू ने
अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की तो उन्होंने पलुस्कर जी से निवेदन किया
कि वे किसी कुशल शिष्य को आश्रम में रहकर प्रार्थना सभाओं के लिए सरल-सहज धुनें
तैयार करने का कार्य सौंपे। तब नारायण मोरेश्वर खरे नामक एक शिष्य ने चार सौ भजनों
को संगीतबद्ध किया जिसे बाद में राग-ताल विवरण के सहित अहमदाबाद के नवजीवन प्रकाशन
मंदिर ने 'आश्रम भजनावलि' में प्रकाशित किया।
इसी लघु
पुस्तिका में संग्रहित भक्त नरसिंह का भजन 'वैष्णवजन तो तेने कहिए' बापू को
सर्वाधिक प्रिय था जो बाद में दांडी यात्रा सहित गांधीजी के अनेक प्रयासों में
प्रार्थना संगीत की अनिवार्य और कालजयी रचना सिद्ध हुई।
बहुत कम
लोग जानते हैं कि महात्मा गाँधी भारत रत्न से सम्मानित प्रख्यात गायिका
सुब्बलक्ष्मी से अपना प्रिय भजन 'हरि तुम हरो जन की पीर' सुनना चाहते थे। सन् 1947 में मुंबई में प्रार्थना सभा में जब उनके आग्रह पर सुब्बलक्ष्मी ने 'राम
धुन' सुनाई तो सरोजिनी नायडू ने अपनी 'भारत कोकिला' उपाधि उन्हें प्रदान कर दी थी।
ये सच है
कि महात्मा गांधी कला और कलाकारों को जीवन दर्शन के आधार पर पहचानते थे, "कला, कला के लिए" इस उक्ति में वे
विश्वास नहीं करते थे। गांधीजी प्रकृति की विराट सुंदरता और उसके वैश्विक प्रभाव
का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि सच्ची कला वही है जिसे लाखों लोग देखें, समझें और उससे आनंद पा सकें। याने कला जनोन्मुखी हो और आनंदित करती हो।
अपने फकीरी लिबास और कृशकाय शरीर के बावजूद गांधीजी दुनिया भर के चित्रकारों और
छायाकारों के लिए आकर्षण का केन्द्र थे। वे कला को बहुत गहरे समझते थे और उसे
मनुष्य की आत्मा और उसके बाहरी व्यक्तित्व के बीच एक समन्वय के रूप में देखते थे।
इतिहास
गवाह है कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान स्वदेशी आंदोलन को और अधिक प्रभावशाली बनाने
में कलाकारों ने अपना बड़ा योगदान दिया। कला की केन्द्रीय पहचान महात्मा गांधी और
नेहरुजी के चित्र थे। विदेशी चित्रकार भी आंदोलन के दौरान गांधीजी की विभिन्न
छवियों और ऐतिहासिक पलों को चित्रांकित कर रहे थे। गांधीजी अपनी व्यस्तता के
बावजूद इन चित्रकारों को समय देते थे। नंदलाल बसु ने अपने संस्मरण में लिखा कि 'महात्मा
गांधी' हम जैसे चित्रकार तो नहीं है- किंतु मैं उन्हें सच्चा कलाकार मानता हूँ
क्योंकि उन्होंने अपने अलावा, अपने आदर्शों के अनुरूप
अन्य लोगों को गढऩे में कौशल दिखाया है।
स्वराज
साहित्य के अध्येता इलाशंकर गुहा एक संस्मरण साझा करते हुए बताते हैं कि 1918 में शांति निकेतन में गांधीजी की मुलाकात मुकुल डे से हुई। सरोजिनी नायडू
भी मुकुल डे के साथ थी। मुकुल ने गांधीजी से उनका पोर्टेट बनाने के लिए अनुमति
मांगी। गांधी जी बोले कुछ नहीं, केवल मुस्कुराये। गांधी जी
की सादगी भरी वेशभूषा और सरलता पर मुकुल मुग्ध थे। चित्रांकन पूरा हुआ और पेंटिंग
गांधी जी के सामने रखी गई। गांधीजी हंसकर बोले- वाकई क्या मैं ऐसा दिखता हूँ! मैं
उस एंगल से अपना चेहरा नहीं देख सकता- "फिर मुकुल के निवेदन पर उन्होंने
तारीख सहित गुजराती में पेन्टिंग पर हस्ताक्षर किये। दस वर्ष बाद सीएफ एन्ड्रयूज
ने मुकुल का परिचय गांधी से करवाया- गांधीजी तुरंत मुकुल को पहचान गये और उन्होंने
साबरमती आश्रम में उनके रहने-खाने की व्यवस्था कर दी और पेन्टिग बनाने की अनुमति
भी दी। मुकुल डे ने वहाँ चार महत्वपूर्ण पेटिंग बनाई। कुछ रेखांचित्र भी बनाये थे
और कस्तूरबा का एक पोर्टेट भी तैयार किया। गांधीजी ने उनकी कला का गहराई से
निरीक्षण किया, फिर प्रसन्न होकर साबरमती आश्रम की स्कूल का
आधा हिस्सा वहाँ चित्रकला की कक्षाएँ चलाने के लिए दे दिया।
इलाशंकर
गुहा अपने एक शोध में लिखते है कि शांति निकेतन में दक्षिण से आए युवा कलाकार के.
वेंकटप्पा ने भी चित्रकला सीखी थी। उन्होंने विभिन्न मौसम और हालातों में उटी
(शहर) पर बहुत सारे चित्रांकन किये। गांधी जी ने इन चित्रों को देखकर एक सधे हुए
कला समीक्षक के रूप में "यंग इंडिया" में टिप्पणी लिखी। एक साधारण आदमी
भी के. वेंकटप्पा द्वारा बनाई गई पेटिंग्स में प्रकृति के सूक्ष्म चित्रण और सधी
हुई लाइनों और रंग संयोजन की तारी$फ किए बना नहीं रह सकता।
उनके चित्रों में सुबह, शाम और रात्रि में शांति, प्रकृति की सुरम्यता, बादलों के गहरे प्रभाव और
वातावरण की सौम्यता का चित्रण-प्रकृति के साथ उनके मन के एकाकार होने की अनुभूति
प्रदान करता है। गांधी जी ने फिर के. वेकंटप्पा को कहा कि मैं प्रसन्न हूँ आपको
मेरा आशीर्वाद है किंतु यदि आप जीवन पर चरखे के प्रभाव को दर्शाती हुई पेन्टिंग
बना सकें तो मुझे अधिक खुशी होगी। हाँ, यदि ये आपको आकर्षित
करता हो तो अन्यथा कोई बात नहीं। गांधी जी कला को अपने उद्देश्यों और आदर्शों के
अनुरूप देखना चाहते थे- क्योंकि उनका लक्ष्य स्पष्ट था। दांडी मार्च के समय गांधी
पर सबसे अधिक चित्र बनाये गये। अलग-अलग कलाकारों द्वारा तैयार ये पेन्टिंग्स किसी
शैली विशेष से संबंधित नहीं थी, वरन उसमें तथ्य और मनोभावों
का चित्रण था। दांडी मार्च में गांधी जी के आधी रात में गिरफ्तार हो जाने पर
कलाकार विनायक एस मासोजी ने उनकी एक पेंटिंग बनाई, जिसमें
उनकी तुलना ईसा मसीह से की गयी थी। उस पेटिंग का नाम था- "दि मिडनाइट अरेस्ट"।
बाद में गांधीजी और राजकुमारी अमृतकौर ने उस पेंटिंग को कांग्रेस की आर्ट गैलेरी
में देखा। राजकुमारी ने पूछा कि क्या वास्तव में रात को ऐसा ही हुआ था या ये
कलाकार की कल्पना मात्र है? गांधीजी बोले- हाँ, ऐसा ही हुआ था वे ठीक वैसे ही मुझे गिरफ्तार करने आये थे।
गांधीजी कलाकारों का बहुत सम्मान करते थे किंतु वे कला में आध्यात्मिक ऊँचाइयों और गहन आस्था के दर्शन चाहते थे। उन्हें अपनी तसवीरें खिंचवाना अधिक पसंद नहीं था, फिर भी चित्रकारों द्वारा बनाई गई कलाकृति पर तारीख सहित अपने हस्ताक्षर करने के बाद वे संदेश लिखते थे- "ट्रूथ इज़ गॉड"।





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