कोई पुण्यात्मा ही शिक्षक होता है : विनय उपाध्याय


कोई पुण्यात्मा ही शिक्षक होता है!

विनय उपाध्याय 


मुझे तुम देखते पथ में,
तुम्हारे पाँव की गतियाँ बदल जातीं,
तुम्हारी विनत आँखों से,
लजीली शिष्टता मानों बिखर जाती,
बड़ी शैतान हँसियाँ,
होंठ पर आकर ठिठक जाती,
मैं बहुत मज़बूत रखूँगा,
स्वयं ज्ञान के कंधे,
कि इन पर बैठकर,
तुम देख पाओ दूर तक,
आओ कि यह जो बहुत सा कीचड़,
यहाँ पर जम गया है,
मैं यहाँ पाषाण सा उभरूँ
पाँव रखकर,
तुम सुरक्षित निकल जाओ



एक शिक्षक का यह शुभैषी उद्गार हिन्दी के ज्येष्ठ कवि जयकुमार जलज की एक कविता का वो अंश है जिसमें अपने छात्रों के सुनहरे भविष्य के लिए प्रेमिल पुकार है। कविता का यह बिंब इस वक़्ती दौर की हकीक़त से कितना मिलता-बिछलता है, यह जाँचना कठिन नहीं लेकिन, पाँच सितंबर को यकायक शिक्षक के आसपास उमड़ता भावनाओं का ज्वार सोचने पर ज़रूर विवश करता है कि हम क्या थे? क्या हैं? और क्या होंगे अभी? एक गौरवशाली परंपरा जो 'दिवस’ की आवृत्ति में 1962 में मुकर्रर हुई थी, साल के साठवें मुकाम पर आते-आते महज़ एक कर्मकाण्ड में बदल गयी। जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नई पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करने का शिव-संकल्प लेने वाली शिक्षक बिरादरी सत्ता-प्रबंधन के इशारों पर इस्तेमाल होने वाला वो टूल भर है, जो शिक्षा से इतर शेष अन्य कामों के लिए उपयोगी माना जाने लगा है। दुर्भाग्य से अब न आदर्श शिक्षक रहे और न वो छात्र पीढ़ी जिसके लिए शिक्षक प्रश्नों, जिज्ञासाओं और उलझनों का समाधान हुआ करता था। इन तमाम विसंगतियों के बावजूद शिक्षक एक अपरिहार्य पद है। एक अनिवार्य उपस्थिति है।

विलियम आर्थर ने कहा था- एक सामान्य शिक्षक वह होता है जो बताए। एक अच्छा शिक्षक वो होता है जो समझाए। एक बेहतर शिक्षक वह होता है जो स्वयं करके दिखाए। जबकि एक महान शिक्षक प्रेरणा का प्रकाश बनकर प्रकट होता है। लेकिन शिक्षकों के महाकुल में सब लोग शिक्षक नहीं होते। कोई पुण्यात्मा ही शिक्षक होता है। अध्यापन व्यवसाय नहीं, वह आत्मा की गहराई से उपजा समर्पण है। एक ऐसा कौशल जो पीढिय़ों को संस्कारित करने की सौगंध लेकर फ़र्ज़  अदायगी की जीवंत मिसाल बनता रहा है। लेकिन अधोपतन सब ओर हुआ है तो शिक्षा का परिसर भला उससे कैसे अछूता रहता? वशिष्ठ, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य और सांदीपनि के नाम सुनकर अब सुखद आश्चर्य ही किया जा सकता है। ऐसा इसलिए कि शिक्षा का तंत्र ही बदल गया है। शिक्षा के विषय में लोग संवेदनशीलता खो रहे हैं। जबकि जागरूक समाज को शिक्षा के प्रति अतिरिक्त संवेदनशील होना पड़ेगा। स्कूल के ऊपर लोगों का नियंत्रण हो। परिवेश को बदलने की भावना के साथ काम करना ज़रूरी है। शिक्षा के माध्यम से नई स्वतंत्रता की ओर बढऩा है। यह नई स्वतंत्रता 'पृथ्वी से संवाद करके ही लायी जा सकती है। पृथ्वी से संवाद का अर्थ है- मिट्टी की परख। पेड़ों से परिचय। वृक्ष अकेला नहीं होता, उसका पूरा संसार होता है। स्थानीय जल स्रोतों से रिश्ता। औषधियों की दुनिया से संबंध। जंगल के परिवार से आपसदारी। पृथ्वी से जुड़े आकाश की जानकारी। स्वतंत्रता। स्वाध्याय। समता और स्वावलंबन। अपनी बुद्धि। अपना कौशल। अपनी मिट्टी। अपना पानी। अपना गाँव। अपना देश। इसके आधार पर ही अपना विश्व बनाने की पहल। कुल मिलाकर स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए कौशल-विकास। अपनी समस्याओं का अपने संसाधनों से निदान। शिक्षा की यही दिशा होनी चाहिए। निबंधकार श्रीराम परिहार अपनी पुस्तक भय के बीच भरोसा में इन तमाम बातों का उल्लेख करते हुए बहुत ही वाजिब तर्क साझा करते हैं। कहते हैं कि स्कूल सशक्त हो। शिक्षा जवाबदेह हो। आज शिक्षा जवाबदेह नहीं है। इतने बेरोज़गार पैदा करने का अपराध किसने किया? स्कूल के विषय में बच्चे तो उदासीन हैं ही, शिक्षक भी उदासीन हैं। कमरा, शिक्षक, श्यामपट, चॉक से शिक्षा नहीं होती। शिक्षा उनसे आगे है। छात्र अपनी संस्कृति, मिट्टी, इतिहास, भूगोल और परंपरागत व्यवसाय को जानें। 150 वर्ष पहले समाज-चिंतक ज्योतिबा फुले ने कहा था- ''प्रारंभिक शिक्षा में कृषि का होना, तकनीक का होना आवश्यक है। इसके लिए सारे लोगों को आगे आना होगा।

स्कूल सरकारी शाला न हो बल्कि लोकशाला या जनशाला हो। उस स्कूल में पाठ को नहीं पढ़ाया जाये, बच्चों को पढ़ाया जाये। उस स्कूल में उन करोड़ों बच्चों के लिए जगह हो, जो फ़िलहाल स्कूल से बाहर हैं, क्योंकि- प्यास उनके नसीब में भी लिखी होगी, उनके लिए भी थोड़ा दरिया छोड़ो/साथ चलते रस्ते की पकड़ लो उँगली, पीछे छूटती बस्ती का भरोसा छोड़ो।

दरअसल शिक्षा की मौजूदा तस्वीर के रूबरू होने के पीछे मंशा यह कि शिक्षक की हार्दिक उपस्थिति यहाँ नहीं है। छात्रों की कल्पना के पंख उड़कर अगर आसमान में रंग भरना चाहें तो शिक्षक उसे इस स्वाधीनता की स्वीकृति दे सकें। उसके पंखों में नई उर्जा भर सके। कर्मयोगी कृष्ण जब उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में छात्र बनकर शिक्षा ग्रहण करने आए तो 14 विधाओं और 64 कलाओं में प्रवीण होकर लौटे। वे पूर्ण पुरुष बन सके जिसने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी बुद्धि और कौशल के बल पर दिग्विजय प्राप्त की।

महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का सबसे उज्जवल पक्ष उनका एक श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में छात्रों से संवाद था। वे देश के प्रथम नागरिक बतौर जब भी जन सभाओं को संबोधित करते तब अक्सर युवा पीढ़ी को देखकर उनसे संभाषण करते। वे युवाओं को सवाल करने की छूट देते और प्रश्नों का बहुत ही संजीदगी से जवाब देते। इस तरह वे नए विचारों का स्वागत करते। नए विश्व की कल्पना ऐसे ही शिक्षकों की बदौलत पूरी होती है। अपने संकल्पों से जो अंधकार धोते हैं मिट्टी की लघु काया वाले ऐसे ही होते हैं। 

 



रंग संवाद की ओर से आप सभी को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ 




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