लोकल से जुड़कर कैसे ग्लोबल हुआ हबीब तनवीर का नया थिएटर : विनय उपाध्याय
लोकल से जुड़कर कैसे ग्लोबल हुआ हबीब तनवीर का नया थिएटर
विनय उपाध्याय
हबीब तनवीर यानी हिन्दी नाटकों का नूर एक रौशन सितारा, जो छत्तीसगढ़ की मटियारी महक को अपनी मुठ्ठी में थामकर सरहद पार के मंचों पर बिखेरता रहा जहाँ हिन्दुस्तान की तहज़ीब को नाटकों के ज़रिए नए सिरे से जानने-पहचानने का सिलसिला शुरू हुआ. गाँव-देहात के नाचा कलाकारों की हस्ती को सारी क़ायनात ने सलाम किया.
यूँ हबीब तनवीर का सपना उनके ‘नया थिएटर’ से गुज़रता हुआ न जाने कितनी आँखों में समा गया. शोहरत और क़ामयाबी सिर
चढ़कर बोलीं. उन्होंने साबित किया कि ‘लोकल’ से जुड़कर ‘ग्लोबल’ हुआ जा
सकता है. साधारण रहकर भी असाधारण का तमगा पहना जा सकता है. दुर्भाग्य से हबीब
तनवीर के साथ ही उनके ‘नया थियेटर’ की
सांसों ने भी दम तोड़ दिया पर रंगमंच पर उभरे उनके दस्तख़त आज भी साफ़ पढ़े जा
सकते हैं.
हबीबजी के रहते उनके साथ मेरी अनेक बैठकें हुईं. संवाद के अनेक सिलसिले बने. वे कहते- “एक इरादा लेकर निकले थे कि थियेटर करेंगे और सिर्फ़ थियेटर करेंगे. चुनांचे उसमें सफलता मिली. मैंने सोचा कि बजाय इसके कि शहरियों को बताया जाए कि परम्परा क्या थी, हमारे पुराने तरीक़े क्या थे थियेटर के, उन्हीं लोगों को पकड़ा जाए जिनके पास यह चीज़ मौजूद है. मैंने यह भी देखा कि लोक थियेटर के अन्दर मौजूद है संभावना आज की समस्याओं, आज के विषय की चीज़ों के बारे में कहने की. मुझे उचित लगा. यह मेरी एक फीलिंग थी और जब यह क़ामयाब हुई तो सब तरफ़ इसको लोगों ने स्वीकार किया।
हबीब ने थियेटर को हमेशा कलेक्टिव आर्ट माना.
वे मानते थे कि जिस पर भरोसा है कि इस आदमी के पास है नज़र और कान हैं उसके पास, तो उसका सहयोग हासिल करें और
उसके साथ मिल करके कलेक्टिविटी पैदा करे. आखि़र रंगकर्म का नेचर ही है कि वह जिन
कलाकारों के साथ जुड़ा हुआ है उनकी योग्यता के अन्दर से ही कुछ निकाले. मैंने भी
यही किया. चुनांचे गाँव वाले लोगों से जब मैं अच्छी उर्दू और अच्छी हिन्दी का प्ले
करवाता तो ढूंढता फिरता. जिनकी अच्छी बोल-चाल हो, तख़ल्लुस
ठीक हों, लबोलहजा दुरूस्त हो. कुछ ऐसे नाटक हैं मेरे जिनमें
उन लोगों का सहारा लिया. अभिनय और अदायगी गाँव वाले बहुत ही ख़ूबसूरत
ढंग से करते हैं. लेकिन जहाँ तक जबान का ताल्लुक है, उसका कुछ ताल्लुक थियेटर से है।
नई तकनीक के आने से हबीबजी का थिएटर तो
विचलित नहीं हुआ पर वे दूसरों पर इसके असर से कुछ बेचैन रहे. कहते कि कुछ थियेटर
तो ऐसे हैं जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तामझाम के प्रभाव के कारण, भटक से गए हैं. क्योंकि वे
चाहते हैं कि थियेटर के मीडियम में, रंगमंच में भी तड़क-भड़क
पैदा हो जाए. जो कि टेलीविजन में होती है. फि़ल्म में होती है. वह मुमकिन नहीं है.
उससे मीडियम के साथ ज्यादती होती है. फि़ल्म का एक मीडियम अलग है, टेलीविजन का अलग है, और थियेटर का भी जुदा है. जब
नया मीडियम कोई आया तो उससे पुराने मीडियम को धक्का पहुँचा. लेकिन वह हमेशा
टेम्परेरी रहता है. बहुत से लोग यह भी मानकर चले हैं
इलेक्ट्रॉनिक युग में कविता ख़त्म हो जाएगी. इमेज आ जाएगी और थियेटर ख़त्म हो
जाएगा. शायद कहीं-कहीं तो हो रहा है अमरीका वगैरह में, लोग अब कलम पकड़ के लिखना
भूल गए हैं. अब वे टाइपिंग भी भूल गए हैं. अब इलेक्ट्रॉनिक में आ गए हैं. अगर
हमारे यहाँ भी वैसा ही हुआ तो बड़ा जुल्म होगा. क्योंकि जिस तरह का अभिनय हमारे
ग्रामीण कलाकार करते हैं, जिस तरह वे नाचते हैं, गाते हैं उसमें निखार पैदा करना और दूसरी चीजें पैदा करना मेरे लिए बहुत
आसान हो गया आगे चलकर।
शुरू में तो ख़ैर यह बहुत दुश्वार रास्ता था.
कई साल तक मैं जूझता रहा लेकिन जब उसके अन्दर से रास्ता निकल गया इम्प्रोवाइजेशन
का और बिलकुल घुलमिल गये तो फिर नयी-नयी सूरतें, नयी-नयी शैलियाँ पैदा होती चली गईं और सिगनेचर होती गईं एक
आदमी की. जो बड़े लोग हैं जिन्होंने यह काम किया है वे भी ग्रुप के साथ करते रहे
हैं. एक्टर स्टूडियो अमेरिका पांच साल तक एक जगह चमके, एक
ख़ास ग्रुप था. मिशेल सेण्डिनी ने ओल्ड वीक थियेटर में लन्दन में अपनी छाप क़ायम
की. यह इसलिए कि वे एक ग्रुप के साथ काम करते रहे. फ्रांस में आकर उन्होंने वह काम
किया. पीटर ब्रुक का भी शुरू में यही आलम था. क्रिएटिव आर्ट का तकाज़ा है कि वह
तमाम रूल्स रेगुलेशन्स को तोड़-ताड़ के नये क़ायदे क़ानून बनाये. और ज़बान भी नई
बनाये. हर युग में हुआ है कि ज़बान नयी बनती चली गयी। यह दिलचस्प है कि बड़े-बड़े
रंगकर्मी चाहे वे दूसरी नस्ल के हैं, चाहे रतन थियम हों,
या कारन्त हों या जो भी हों, वे सब के सब
हबीबजी से इंस्पायर रहे. सारे मुल्क में जो फोक आर्ट्स को और उनकी शैलियों को लाने
का सिलसिला है जिन्होंने शुरू. उनमें से एक हबीब तनवीर थे. दीना पाठक भी थीं और
बाद में चलकर और भी कुछ लोग आये हैं. बहुत ज्यादा काम हुआ।
हबीबजी को एक बार एक गाँव वाले ने बड़ी पते की बात कही. उसने कहा कि दर्शक तीन टाइप के होते हैं- एक सुरमस्त, एक तालमस्त और एक हालमस्त. सुरमस्त वो कि अगर आप सुर में गा रहे हैं, तो आप कुछ भी गा रहे हों मैं तो रात भर यहाँ डटा हुआ हूँ. आप भी जमे रहिये, मैं भी जमा हुआ हूँ. अगर आप तालमस्त हैं और ताल के पक्के अगर हैं और ताल की लयकारी है, तो जमे हुए हैं. कितना ही बेसुरा गा रहे हों. आवाज़ की कई शाखाएँ फूट रही हैं, ताल दुरूस्त हैं तो मैं जमा रहूँगा. और हालमस्त वो जो अपनी हालत में है. शराब पिये हुए हैं और कुछ भी हो, चाहे बेसुरे हों, चाहे बेताले हों, रात भर खड़े रहें और कुछ भी करते रहो, रात भर हम डटे हुए हैं. हम अपने हाल में मस्त हैं. तुम अपने हाल में मस्त रहो. मुझे यह इतना अच्छा इमेजिनेशन लगा उस गाँव के दर्शक का, मैं कुछ कह नहीं सकता.
जिस ‘नया थियेटर’ के साथ आपने जि़ंदगी गुज़ार दी उसके भविष्य को लेकर भी कुछ चिंताएँ होगी ही. इस सवाल पर हबीबजी ने बेबाकी से फरमाया- “मेरे न रहने के बाद ‘नया थियेटर’ से मुझे बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है. हालांकि मैं कोशिश में रहा कि अपने तरफ़ से कोई इसे चलाए. देखना होगा कि मेरा यह सपना मेरे बाद जि़ंदा रहेगा या नहीं. इस बारे में इतना ही कहूँगा कि टैगोर का शांति निकेतन अब वैसा नहीं रहा. गांधी जी का आश्रम भी अब भला पहले की तरह ताज़गी भरा नहीं है. संस्थाओं की जि़ंदगी भी वैसी ही रहती है जैसी हमारी.
हबीबजी वो लम्हा नहीं भूलते थे जब 1982 में पहली बार एडिनबरा गये थे, ‘चरणदास चोर’ को लेकर. वहाँ उसे 52 नाटकों में प्रथम पुरस्कार मिला. वहाँ उपस्थित एक क्रिटिक ने पूछा कि गाँव के कलाकारों को लेकर हमने मंच पर इतनी कलात्मकता से सब कुछ कैसे पेश कर दिया? हबीबजी ने कहा- यह तो हमारी भी समझ में नहीं आ रहा है. इतना ज़रूर था कि हमारे कलाकार गोरे दर्शकों को देखकर ज़रा भी विचलित नहीं हुए. उनकी प्रस्तुति में ग़ज़ब का खुलापन और बेबाक़ी थी. यही सफलता का राज था. ‘चरणदास चोर’ की सफलता पर हमेशा उन्हें आश्चर्य होता।
यक़ीनन ‘चरणदास चोर’ से ही उन्हें शोहरत मिली है। बाद में ‘आगरा बाजार’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘बहादुर कलारिन’, ‘गाँव के नाम ससुराल’ आदि नाटक भी दर्शकों ने उनकी ख़ूबियों के साथ पसंद किए। रंगकर्म के अनुभव का सार क्या रहा? इस सवाल पर शायराना जवाब मिला- “नाज उठाने में जफ़ाएँ तो उठाईं लेकिन लुत्फ़ भी ऐसा उठाया कि जी जानता है”.
असल में नाटक करते हुए बहुत मुसीबतें सामने आईं. क्या-क्या नहीं हुआ इस जमाने में लेकिन मज़ा भी बहुत आया. किसी भी रंगकर्मी से पूछिए, नहीं छूटता है थियेटर. लत ऐसी है कि छोड़ना चाहो तो भी नहीं छूटे. मुझे लगता है, हर काम ऐसी ही फि़तरत के साथ किया जाना चाहिए. एक दिन ज़रूर वह अपना बना लेती है।
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