संगीत के जसराज : विनय उपाध्याय

 

संगीत के रस-राज

विनय उपाध्याय 




आवाज़ें कभी मरती नहीं। अपने रंग और ख़ुश्बुओं को थामता उनका नाद अनंत में गूँजता रहता है। पंडित जसराज कायनात-ए-मौसीक़ी में महकती एक ऐसी ही याद हैं। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सिरमौर एक ऐसी शख़्सियत, जिसने आज़ाद भारत की फ़ज़ाओं में अपनी कंठ माधुरी का रस बिखेरा। इंसानी उसूलों को आवाज़ दी। विरासत को सच्चा उत्तराधिकार दिया। साधना और तपस्या में निखरे सुरों की आभा लिए हिन्दुस्तानी तहज़ीब का परचम सारी दुनिया में फहराया। गुरुओं की तालीम का मान रखा और अपने शागिर्दों को मेवाती घराने की ख़ूबियों से नवाज़ते हुए सप्त सुरों के गगन मंडल में पंख पसारने का हौसला बख़्शा।

इस नश्वर संसार में पंडित जसराज के देहांत की ख़बर ने निश्चय ही उनके कद्रदानों को हतप्रभ कर दिया था। सत्रह अगस्त उनके महाप्रस्थान की तारीख़ बनी। अंतिम सांस उन्होंने अमेरिका में ली लेकिन नाद के इस नायक की रूह में आख़िर तक अपने वतन का राग गूँजता रहा।

ये सच है कि पूर्वजों से मिली विरासत के प्रति मान, श्रद्धा और उसे भावी पीढिय़ों तक हस्तांतरित करने का संकल्प ही सच्चे तपस्वी साधकों की पहचान बनते हैं। एक ऐसी ही वरेण्य विभूति थे- पंडित जसराज। साधना और सिद्धि की ऐसी मिसाल जहाँ अपनी महान धरोहर के प्रति गहरा आश्वासन तो घर्षण, मिश्रण और प्रदूषण के इस दौर में समरसता को पुकारती आवाज़ का खरापन भी। 



                                                 

यह तेजस्विता ही पंडित जसराज की पूँजी थी जिसे उन्होंने अपने बड़े भाई मणिराम से बहुत छुटपन में हासिल किया था। मेवाती घराने के महाराजा जयवंत सिंह वाघेला और उस्ताद ग़ुलाम कादर खान तथा आगरा घराने के स्वामी वल्लभदास के सान्निध्य ने संगीत के गूढ़ ज्ञान को समझने की नई राह दिखाई। गायिकी के व्याकरण और उसके आध्यात्मिक सौन्दर्य के रहस्यों को आत्मसात कर जब पंडित जसराज दुनिया के सामने प्रकट हुए तो हिन्दुस्तानी राग परम्परा के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय जुड़ गया। उनके गृह प्रदेश हरियाणा की सरकार ने उन्हें संगीत मार्तण्ड की उपाधि से विभूषित किया।

उनके निधन की सुर्खी संगीत संसार के लिए एक बड़ा आघात थी। कर्कशता के इस दौर में उनका कंठ करुणा का संगीत गाता रहा। सौहार्द, शांति और सद्भाव के मंत्र को अपनी सैकड़ों बंदिशों में मुखरित करते हुए इस साधक ने यह साबित किया कि मन की परतों पर जमा अशांति और कटुता का प्रक्षालन संगीत से ही संभव है। उम्र की चढ़ती बेल ने निश्चय ही उनकी देह को थका दिया था और पहले की तरह मंच और महफ़िलों में रागदारी का रोमांच बिखेरना मुमकिन न रहा लेकिन उनकी उठती-गिरती साँसें स्वर के देवता को भजती रहीं। और यही तपस्या उनके मोक्ष का मार्ग भी बनी।


                                                                                    

पद्मविभूषण से लेकर संगीत मार्तण्ड और महाराष्ट्र गौरव जैसी जाने कितनी उपाधियों से वे अलंकृत हुए लेकिन मध्यप्रदेश सरकार के राष्ट्रीय कालिदास सम्मान को पाकर वे अलहदा सी ख़ुशी ज़ाहिर करते। उन्हें गर्व और संतोष इस बात का रहा कि वे संगीत के जिस मेवाती घराने के शागिर्द रहे उसका गोमुख भोपाल है। पंडित जसराज के पिता पं. मोतीराम की नानी ने मेवाती घराने के गुरु उस्ताद घघ्घे नज़ीर खाँ को राखी बांधी थी और उस्ताद के बेटे नत्थूलाल ने पंडितजी के पिता को अपना गंडाबंध शागिर्द बनाया था। इन्हीं स्मृतियों से भरे पंडित जसराज की हसरत थी कि वे भोपाल में एक संगीत गुरुकुल की स्थापना करें। म.प्र. के संस्कृति महकमे से लेकर मानव संग्रहालय, सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद और ध्रुपद गुरुकुल संस्थान के बुलावे पर वे संगीत की माधुरी बिखेरने अनेक बार नमूदार हुए। बतौर उद्घोषक पंडितजी को मंच पर कई सभाओं में पुकारने का सौभाग्य मुझे (इस लेखक को) हासिल हुआ और इस दौरान उन जैसी विराट विभूति के बेशुमार जाने-अनजाने पहलुओं को क़रीब से जानने का अवसर भी मिला।

छ: बरस तक वे कलाओं के मरकज़ भारत भवन न्यास के अध्यक्ष रहे। भारत भवन और संस्कृति विभाग ने मिलकर पंडितजी पर एकाग्र जसरंगीका आयोजन किया था जबकि संगीत कला संगम के आमंत्रण पर क़रीब चार दशक पहले जसराज का यहाँ आना सांस्कृतिक मैत्री की मिसाल बन गया।



सरहद पार के कई मुल्कों की अनेक यात्राएँ, संगीत की अनेक नामी कंपनियों की ओर से जारी अलबम, अनेक सुपात्र शिष्यों की पीढिय़ों का निर्माण और विश्व मानव के लिए सद्भाव के संगीत का संदेश, भारत की भूमि पर पैदा हुए पंडित जसराज जैसे संगीत रत्न की वो आभा हैं जिसका शताब्दियों तक धुंधलाना नामुमकिन है।

पंडित जसराज की मान्यता रही कि गायन में मीठा कंठ हो तो अच्छा है परन्तु ज़रुरी नहीं कि इसी से कोई श्रेष्ठ गायक बन जाता है। उस्ताद अब्दुल क़रीम खां साहब, मेरे पिता व चाचा की आवाज़ें अच्छी थीं। वे श्रेष्ठ गायक भी बने परन्तु फिर भी बाज़ी उस्ताद फ़ैयाज़ खां साहब के हाथ रही जिनकी आवाज़ इतनी अच्छी नहीं थी। जब उस्ताद रहमत खां साहब को बचपन में उस्ताद फ़ैयाज़ खां साहब ने गाकर सुनाया तो पहले सुर पर उस्ताद रहमत खां साहब बोले- ठहरो, तुम ईद के बकरे हो क्या? उसे काटते वक़्त जैसी आवाज़ वह करता है, वैसी आवाज़ तुम निकालते हो। बाद में वही महान गायक बने। उस्ताद अब्दुल क़रीम खां साहब लोकप्रिय थे लेकिन उनका गाना सुनने वालों का विशिष्ट श्रोता वर्ग था, पंडित कुमार गंधर्व जैसा। उस्ताद फ़ैयाज़ खां साहब को बहुत से लोगों ने अलग-अलग स्तरों पर सुना, पंडित भीमसेन जोशी की तरह। बस फ़र्क़  इतना था कि समय के साथ उस्ताद फ़ैयाज़ खां साहब का गाना समाप्त हो गया। परन्तु उस्ताद अब्दुल क़रीम खां साहब का गाना आज भी सदाबहार है। 




कालिदास सम्मान की घोषणा के बाद एक समाचार पत्र को दिये साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि मैं अपने रसिकों के प्रति उदार हूँ और बीमार प्रशंसकों के पास जाकर नि:शुल्क गाता हूँ। ऐसा कर मुझे बड़ा ही आत्मिक संतोष मिलता है। मेरे पिता और गुरु ने यह सीख दी। स्मृति से उलझी एक घटना सुनाकर पंडित जसराज ने उक्त तथ्य की पुष्टि की- एक बार जब मैं हैदराबाद में अपना कार्यक्रम दे रहा था, तब एक महिला मुझे आकर मिली। उसने बताया कि उसके पति को मेरा गाना बेहद पसंद है लेकिन वे कैंसर से पीडि़त हैं। इसलिए आज आ नहीं सके। मुझे दूसरे दिन सुबह लौटना था। मैं उसी समय उस बीमार प्रशंसक के घर जाकर गाना सुना आया।

ऐसा ही एक मार्मिक क़िस्सा और, किसी महिला ने टाटा कैंसर अस्पताल से फोन पर बताया कि उनका बेटा वहाँ भर्ती है और मेरा गाना सुनना चाहता है। मैं मुम्बई लौटने पर उसे अस्पताल में अपने स्वर मंडल के साथ गाना सुनाने पहुँचा। मैंने दरबारी गाया। वह 18-19 साल का लडक़ा था। उसे देख मैं बेहद बेचैन हो गया। दरबारी के लिये स्वर साध कर मैंने 30-40 मिनिट गाया। तब उसने निरंजनी नारायणी गाने का आग्रह किया। उसके चेहरे पर संतोष व ख़ुशी देखकर मुझे इतना आनन्द मिला कि मैंने तुरन्त वह भी गाया। तब वह लडक़ा उठा, उसने मेरे पैर छुए और कहा- मेरा जीवन सफल हो गया। अब मुझे मौत आई भी तो ग़म न होगा।







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