संघर्ष की पटकथा : मुक्ति का महायज्ञ
संघर्ष की पटकथा
विनय उपाध्याय
सिद्ध गीतकार और लेखक रामवल्लभ आचार्य की लेखनी से रचा यह एक ऐसा अनुपम रुपक है जिसने रेडियो और दूरदर्शन से लेकर रंगमंच तक ख़ासा रोमांच और उद्वेलन जगाया। आचार्य हिन्दी के आखर जगत में आलोकित एक ऐसे शब्द-शिल्पी के रुप में समादृत हैं जिनके गीत अनूप जलोटा, हरिओम शरण और प्रभंजय चतुर्वेदी से लेकर कल्याण सेन और कीर्ति सूद जैसे जाने-माने गायकों की आवाज़ में प्रसिद्धि के गगन नापते रहे हैं। निश्चय ही रचनात्मक कसौटी पर यह रुपक एक अनुभव समृद्ध लेखक के कला-कौशल का प्रमाण है।
इस रूपक के लंबे पाठ से गुज़रते
हुए उत्सर्ग की गाथाएँ हेरने लगती हैं। ग़ुलामी के कसैले अहसासों को जीते हुए एक
दिन अचानक भारतवासियों की बुझी आँखों में आज़ादी का सपना लहलहाया था। समय ने करवट
ली। एक दिन ऐसा आया जब सारे मुल्क ने आज़ाद हवाओं में साँसें लेना शुरु किया।
लेकिन यह पलक झपकते पूरा होने वाला सपना नहीं था,
इस रोमांच के पीछे बरसों का संघर्ष है। सामूहिक समर्पण और एकता की
मिसालें हैं।
इतिहास के पन्नों पर नज़र
जाती है तो अंग्रेज़ी हुकूमत और ज़ुल्मों-सितम से जुड़ी एक-एक तारीख़ उभरती है।
लेकिन मुक्ति के लिए छटपटाते हमारे मुल्क ने संगठित जन प्रतिरोध का स्वर मुखर
किया। सच्चे राष्ट्रभक्त लामबंद हुए। प्रभावी नेतृत्व प्रकट हुआ हुआ और कश्मीर से
कन्याकुमारी तथा गुवाहाटी से चौपाटी तक स्वाधीनता का आंदोलन हर देशवासी का मक़सद बन
गया। सिलसिला शुरु हुआ 1857 से।
चिन्गारी शोला बनती गई। हौसलों की रोशनी में आज़ादी के अरमान वक़्त की राहों पर क़दम
बढ़ाते रहे। 15 अगस्त 1947 की सुबह
भारत की भाग्य रेखा ने दुनिया के इतिहास में महाविजय की इबारत उकेर दी। ...आज़ादी
का यह संघर्ष, वतन परस्तों का त्याग, संकल्पों
का संदेश आज हमारी धरोहर है। लेकिन क्या हमारी चेतना में कभी हमारा बीता कल कौंधता
है? क्या हम आज़ादी के उसूलों की हिफ़ाज़त के फ़र्ज़ अदा कर रहे हैं?
इसी प्रश्नाकुलता और
बेचैनी की बुनियाद पर रामवल्लभ आचार्य की कलम चल पड़ी। वे काव्य शैली में 1857 से 1947 तक की सैर
कराते ज्वलंत अतीत को उजागर करते हैं।
इस रूपक के लिखे जाने के
संयोग की भी एक रोचक कहानी है। वर्ष 1997-98 को शासन द्वारा स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती वर्ष के रूप में मनाने की
घोषणा की गयी थी। तब साल भर स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित गतिविधियाँ आयोजित करने
का निर्णय लिया गया था। इसी तारतम्य में दूरदर्शन द्वारा कमीशन्ड कार्यक्रमों के
लिये कुछ विषय निर्धारित किये गये थे जिनमें एक विषय स्वतंत्रता संग्राम संबंधी
गीतों की सांगीतिक प्रस्तुति का भी था। प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि से एक दिन
पूर्व सायंकाल आचार्यजी के मित्र ने स्वतंत्रता संग्राम पर केन्द्रित 10 गीत माँगे। अगले दिन सुबह 10 बजे के पूर्व उन्हें
ये गीत देने थे। रामवल्लभजी बताते हैं कि उस रात लगभग दो बजे उनकी नींद खुली और
स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि मन-मस्तिष्क में घूमने लगी। धीरे-धीरे एक के बाद
दूसरे गीत की रचना होती गयी। इस तरह आठ गीत सुबह छह बजे तक लिखा गये। तब दो पूर्व
रचित राष्ट्र भक्ति गीत मिलाकर दस गीत उन्हें समय से पूर्व दे दिये। दूरदर्शन ने
प्रस्ताव जमा कर दिया लेकिन वह प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हुआ। ज़ाहिर है कि आचार्यजी
को निराशा तो हुई किन्तु बाद में इनमें से पाँच गीतों को लेकर स्वतंत्रता के 90 वर्ष के संग्राम पर संगीत रूपक बनाने का विचार उन्हें आया। इस पूरे
इतिहास को मात्र 10-12 मिनिट में समेटना एक चुनौती थी और
चुनौती यह भी थी कि यह सब विश्वसनीय, प्रामाणिक और निर्विवाद
हो। आचार्यजी के अनुसार उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की पुस्तकें पढ़ीं,
नोट्स लिये, घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण संकलित
किया और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों की जानकारी संकलित की। इसके बाद रूपक का एक
ढाँचा तैयार किया। अनुभव किया कि इस संग्राम के मुख्यत: चार पक्ष थे। पहला 1857 की असफल क्रांति का जिसमें विभिन्न राजे-रजवाड़ों का अंग्रेज़ी सत्ता के
विरुद्ध संघर्ष था। दूसरा महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
का अहिंसक आन्दोलन तथा तीसरा विप्लवी क्रान्तिकारियों का सशस्त्र प्रतिरोध था।
चौथा पक्ष था नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिन्द फ़ौज का सैन्य
अभियान।
अन्त में सूत्रधार द्वारा
वर्तमान स्थितियों पर चिंतन की आवश्यकता प्रतिपादित करता यह संगीत रूपक मुकम्मल
हुआ। इसे आकाशवाणी भोपाल के संगीत विभाग को प्रेषित किया। कुछ दिन बाद आचार्यजी को
सूचित किया गया कि 15 अगस्त को
दिनभर जि़ला स्थानों पर होने वाले कार्यक्रम प्रसारित किये जायेंगे अत: इसका
प्रसारण संभव नहीं होगा। कुछ दिन बाद भोपाल के समाचार पत्रों में पं. लालमणि मिश्र
संगीत समारोह में ‘मधुकली वृन्द’ द्वारा
वृन्दगान प्रस्तुति का समाचार पढ़ा तो पं. ओमप्रकाश चौरसिया जी को इस संगीत रूपक
की प्रति उन्होंने दी।
बक़ौल आचार्य, स्वतंत्रता की स्वर्णजयंती के समापन के
अवसर पर आकाशवाणी ने यह पांडुलिपि माँगी और इसके प्रसारण का अनुबंध कर लिया। 12
अगस्त को होने वाले पं. लालमणि मिश्र संगीत समारोह में भी इसकी
प्रस्तुति का रास्ता खुल गया। भोपाल के रवीन्द्र भवन में मधुकली द्वारा इसे
वृन्दगान के रूप में लगभग तीस वृन्द गायकों ने पेश किया और इस प्रस्तुति को व्यापक
सराहना मिली। अनेक लोगों के आग्रह पर इसकी ऑडियो सीडी तथा कैसेट बनवाकर रिलीज़
किये गये। फिर किसी के सुझाव पर इसे रंगकर्मी मनोज नायर की कोरियोग्राफी के साथ
पुन: प्रस्तुत किया गया तो इसका अद्भुुत प्रभाव हुआ। इसके बाद इसकी वीडियो सीडी भी
बनायी गयी। इसकी चर्चा देश भर में हुई और अनेक आयोजनों ने इसकी प्रस्तुति के लिये
चौरसिया जी से संपर्क किया गया। बाद में इसकी प्रस्तुतियाँ भारत भवन भोपाल,
मानव संग्रहालय भोपाल के अलावा सीहोर, सागर एवं
अन्य स्थानों के साथ ही बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के सभागार में भी की गईं।
दूरदर्शन से भी इसका प्रसारण कई बार हुआ।
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