मातृत्व की धन्यता से भरे शिल्प : नर्मदा प्रसाद उपाध्याय
मातृत्व की धन्यता से भरे शिल्प
नर्मदा प्रसाद उपाध्याय
भारत में जब-जब भी स्त्रियों के उत्कीर्णन हुए, शिल्पी ने उस वात्सल्य के भाव को जीवंत रखा, जो स्त्री का मूल भाव है। नायिका हो, अप्सरा हो अथवा शालभंजिका हो या अंबिका, वह मातृत्व भाव अपनी पूरी सौम्यता के साथ इनके चेहरों पर
छलक आया है, जिस भाव के कारण भारतीय परंपरा
स्त्री की पूजा करती है।
जितना साहित्य मातृत्व को लेकर रचा गया, वह इस तथ्य का साक्षी है कि सृजनात्मकता कितनी शक्तिशाली
होती है। मातृत्व सृजन का पर्याय है, लेकिन साहित्य के यह
शब्द उस बेजोड़ शिल्प की बराबरी नहीं कर सके,
जिस शिल्प
में मातृत्व और उसकी परिणति वात्सल्य को उरेहा गया था।
शिल्पांकन की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन है।
इसके प्रमाण सिंधुघाटी की सभ्यता में मिलते हैं, जिसके बारे में अनुमान है कि वह ईसा के तीन हजार शिल्पांकन की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन है। इसके
प्रमाण सिंधुघाटी की सभ्यता में मिलते हैं,
जिसके
बारे में अनुमान है कि वह ईसा के तीन हजार वर्ष पूर्व से पंद्रह सौ वर्ष पूर्व तक
विद्यमान थी। इस सभ्यता से जुड़े स्थलों की खुदाई में मातृका की मूर्ति मिली है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि मातृकाओं की पूजा करने की
अवधारणा काफ़ी पुरानी है। सप्त मातृकाओं के पूजन की परंपरा ईसा से सदियों पहले न
केवल भारत में, बल्कि विश्व की अन्य सभ्यताओं
में विशेष रुप से मेसापोटेमिया की सभ्यता में, विद्यमान थी।
वैदिक युग,
विशेष रूप
से पूर्व मौर्य काल में शिशुनाग वंश (छह सौ बयालीस ईसा पूर्व से तीन सौ बाईस ईसा
पूर्व) के समय में टेराकोटा में मातृका तथा भू-देवी मिली हैं। मौर्यकाल में
अर्थात् तीन सौ बाईस ईसा पूर्व से एक सौ पचासी ईसा पूर्व में मौर्य शासकों के समय
निर्मित यक्ष और यक्षी की प्रतिमाएँ मिली हैं, इनमें पाटलिपुत्र की खुदाई में मिली दीदारगंज की यक्षी विश्व प्रसिद्ध है।
शुंग वंश के शासकों का काल एक सौ पचासी वर्ष ईसा पूर्व से ईसा की पहली शताब्दी तक
फैला हुआ है। इस युग में काफी बौद्ध शिल्प बने। इस काल के शिल्पों में सांची के
शिल्प सुप्रसिद्ध हैं, जिनमें मनोरम
शालभंजिकाएँ उरेही गई हैं। द्राविड़ शासकों के समय में भी ईसा पूर्व अनेक शिल्प
बने, जिनमें उडीसा में खंडगिरि और
उदयगिरि तथा आंध्र में अमरावती के शिल्प
प्रसिद्ध हैं। इन शिल्पों में मातृत्व की अवधारणा को शिल्पित किया गया - है। ईसा
के बाद की शताब्दियों, विशेष रुप से कुषाणों
के समय में जो शिल्प बने, वे अद्भुत हैं, जिन पर गांधार प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इस समय की
शिल्पांकन परंपरा में बौद्ध प्रभाव स्पष्ट हैं, किंतु मातृत्व की अवधारणा के शिल्पांकन की निरंतरता बनी रहती है। परवर्ती
आंध्र शासकों के समय में भी भारत के दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से में जो शिल्प बने, वे विलक्षण हैं। अजंता, कान्हेरी और कारले की गुफाओं के शिल्प अद्वितीय हैं। गुप्त शासकों का काल, जो ईसवी सदी तीन सौ बीस से ईसवी सदी छह सौ तक रहा, भारतीय इतिहास में 'स्वर्ण युग' के नाम से जाना जाता है। इस युग के शासकों का शासन क्षेत्र
भी बड़ा विस्तृत था। इस युग में बहुतायत में मंदिर बने।
चोल शासकों का काल आठ सौ पचास ईसवी से ग्यारह सौ
पचास ईसवी के बीच था। इनके समय में तंजीर में राज-राजेश्वर मंदिर बना, साथ ही अनेक हिंदू देवी-देवताओं के शिल्पांकन हुए। पाल
शासकों का समय सात सौ तीस ईसवी से बारह सौ पचास ईसवी तक था। इस काल में बौद्ध
शिल्प विशेष रुप से बने। पाषाण में शिल्पित तारा की मूर्ति भी मिली है। सेन शासकों
ने भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से में शासन किया। इनके समय में निर्मित गंगा की अनेक
मूर्तियाँ मिली हैं। दसवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी का समय मध्य भारत का ऐसा
गौरवपूर्ण समय था, जब चंदेलों के शासनकाल
में खजुराहो की भव्य मंदिर सरणी बनी। इसमें सर्वाधिक लोकप्रिय और विशाल मंदिर है
कंदरिया महादेव का खजुराहो के मूर्तिशिल्प में मातृत्व, विशेष रूप से माता और शिशु के ऐसे भावप्रवण अंकन मिलते हैं, जिनका विश्व में कोई सानी नहीं है। चंदेलों के समय में
खजुराहो में निरंतर लगभग तीन सौ वर्षों तक की अवधि तक मंदिर बने। लगभग इसी समय
अर्थात् ग्यारहवीं से चौदहवीं सदी के बीच देश के उत्तर-पूर्वी हिस्से अर्थात्
उड़ीसा में भव्य मंदिर बने, जिनमें कोणार्क का
विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर शामिल है।
यह एक छोटी सी झाँकी है उस शिल्पांकन परंपरा की, जो भारत में मुसलमानों के आगमन के पूर्व विकसित हुई थी और
जिसमें मातृत्व की अवधारणा अपने पूरे भाव और भंगिमा के साथ अभिव्यक्त हुई। यह भी एक बेजोड़ तथ्य है कि न केवल हिंदू, बल्कि बौद्ध और जैन शिल्प भी अपनी पूरी उत्कृष्टता के साथ
शिल्पी की छेनियों से अभिव्यक्त हुए। देलवाड़ा और रणकपुर के जैन मंदिरों के भव्य
शिल्पों की विश्व में कोई तुलना नहीं। मध्य भारत में शिल्पांकन की परंपरा निरंतर
बनी रही तथा यक्षी, अप्सरा, शालभंजिका, नायिका तथा अंबिका के
जो शिल्प इस क्षेत्र में बने, वैसे कहीं अन्यत्र नहीं
बने। ग्यारसपुर की शालभंजिका तथा खजुराहो की नायिका तथा माता व शिशु के शिल्प बड़े
प्रसिद्ध हैं। दसवीं सदी से निरंतर ये शिल्प मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में
मिलते हैं। हमारी परंपरा में माता और शिशु के अनेक रुप हैं, जो पूजे जाते हैं,
चाहे सीता
हों, पार्वती हों या शकुंतला हों, इनकी पहचान लव-कुश,
गणेश-कार्तिकेय
और भारत से होती है। जितनी भी देवियाँ हैं,
वे माता
के स्वरुप में ही पूजी जाती हैं और हरेक की अपेक्षा होती है कि वह उनके वात्सल्य
को प्राप्त कर सके। माता के स्वरुप की अवधारणा लक्ष्मी के स्वरूपों में भी की गई
है, उन्हें भू-देवी के रूप में, अन्नपूर्णा के रुप में ऋग्वेद में स्मरण किया गया है और इस
अवधारणा के अनुरुप उनके शिल्पांकन हुए हैं। उन्हें पूर्णेश्वरी के रुप में तथा
वैष्णवी के रुप के शिल्पित किया गया है। बिहार के जयनगर से पूर्णेश्वरी की एक
प्रतिमा मिली है, जो बारहवीं सदी में बनाई गई। यह
पाल शासकों के समय की है तथा अभी विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम लंदन में है।
इसमें प्रसन्न भाव से अपनी गोद में शिशु को लिये चार हाथोंवाली पूर्णेश्वरी विराजी हैं। दसवीं सदी का ही एक
शिल्प, जो कलचुरी काल का है तथा गुर्गी, मध्य प्रदेश में मिला है, अभी भोपाल संग्रहालय
में है। इसमें लेटी हुई मुद्रा में माता यशोदा कृष्ण को स्तनपान करा रही हैं। माता
और शिशु का एक रुप स्कंदमाता के रुप में भी उरेहा गया, यह ईसा की आरंभिक
सदियों में हुआ। इन शिल्पों पर गांधार प्रभाव बड़ा स्पष्ट है। स्कंदमाता का एक
सुंदर शिल्प, यह नस्ली (राजस्थान) से प्राप्त हुआ।
भारत में जब जब भी - स्त्रियों के उत्कीर्णन हुए, तब तब शिल्पी ने
उन्हें उरेहते समय उस वात्सल्य के भाव को जीवंत रखा, जो स्त्री का मूल भाव है। नायिका हो, अप्सरा हो अथवा
शालभंजिका हो या अंबिका, इनको उरेहते समय वह मातृत्व भाव अपनी पूरी सौम्यता
के साथ इनके चेहरों पर छलक आया है, जिस भाव के कारण भारतीय परंपरा स्त्री की पूजा करती
है। शिल्पियों ने विशेष रूप से माता और शिशु के अंकनों के समय यह ध्यान भी दिया कि
यह माता समृद्धि की देवी के रुप में परिलक्षित हो, इसलिए उनके हाथों में फल हैं या आम के फलों से लदी
हुई डाली है। ऐसे शिल्पों का एक संदेश यह भी है कि यह माता केवल अपने शिशु की ही
रक्षक नहीं है, बल्कि समस्त प्रकृति की भी रक्षक है और इसलिए वह एक हाथ से शिशु और दूसरे हाथ
से इस डाली को या फल को थामे हुए है।
जैन परंपरा में माता और शिशु के अंकनों की एक स्थापित परंपरा है। इस परंपरा
में शिशु को गोद में लिये उरेही गई माता को अंबिका कहा जाता है। सनातन परंपरा में
भी अंबिका की आराधना होती है, किंतु उनकी गोद में शिशु नहीं होता। अंबिका समूची
मानवता की माँ के रुप में मान्य की गई हैं। माँ और शिशु के शिल्प के श्रेष्ठ
उदाहरण धारिक, उसियां, मथुरा, एलोरा, देवगढ़, खजुराहो, दिलवाड़ा कुंभारिया और खंडगिरि में हैं। जैसा कि पूर्व में
उल्लेख किया गया, माता और शिशु के अंकनों का मुख्य केंद्र मध्य भारत रहा। इस संबंध में एक रोचक
संदर्भ मिलता है। चौथी शताब्दी में लिखे गए एक जैन ग्रंथ 'स्थानंग सूत्र' में पुंजभद्र नामक
एक यतेंद्र का उल्लेख है, जिसकी चार अग्र महिषी थीं। ‘भगवती सूत्र' नामक एक ग्रंथ के अनुसार
मणिभद्र तथा पुंजभद्र नामक दो यतेंद्र थे तथा चार रानियों में से एक का नाम
बाहुपुत्रिका था। बाहुपुत्रिका ने विशाला नगरी (संभवत: उज्जैन) में एक चैत्य विहार
का निर्माण कराया था। जैन आगमों में यक्ष पूजा के जो उल्लेख मिलते हैं, उनमें मणिभद्र तथा
पूर्णभद्र नामक यक्ष तथा बाहुपुत्रिका नामक यक्षी के विशेष उल्लेख हैं। इन यक्षों
और यक्षियों की पूजा होती थी। यह पूजा अति प्राचीन थी और संभवतः इसी पूजा की
परिणति जैन परंपरा में अंबिका तथा बौद्ध परंपरा में जंभाला तथा हारिती की पूजा में
हुई। मणिभद्र की प्राचीनतम प्रतिमा पवाया से मिली है, जिसे प्राचीन समय
में पद्मावती नगरी के नाम से जाना जाता था । तथा जो आज ग्वालियर के निकट है।
ग्वालियर के निकट जो पुरातात्विक अवशेष मिले हैं, उनसे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि यह क्षेत्र जैन
अंबिका के शिल्प का एक बड़ा केंद्र तथा इन शिल्पों से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि
दसवीं शताब्दी और उसके परवर्ती समय में माता और शिशु के रुप में ऐसी अंबिका का
निर्माण जैन परंपरा में हुआ, जिस पर एक ओर बौद्ध हारिती का प्रभाव था ई तो दूसरी
ओर दुर्गा का । यदि दसवीं शताब्दी के पूर्व क विचार करें तो बाहुपुत्रिका यक्षी के
उस स्वरुप से , अंबिका का उद्भव माना जा सकता है, जो मगध में ए अपने आरंभिक काल में जैन अनुयायियों
के द्वारा पूजी जाती थी ।
माता और शिशु के शिल्प, वे चाहे जिस धर्म के परिप्रेक्ष्य में उरेहे गए हों, उर्वरता और समृद्धि
का द संदेश देते हैं। अंबिका के कई नाम भी प्रचलित रहे, । किंतु इनमें
सर्वाधिक प्रचलित नाम अंबिका ही है। यह 5, भी एक रोचक तथ्य है कि छठवीं शताब्दी ईसवी से नवीं
शताब्दी तक अंबिका का उत्कीर्णन ऋषभनाथ, र पार्श्वनाथ तथा नेमीनाथ के साथ हुआ, किंतु दसवीं , शताब्दी के बाद
उन्हें मुख्य रुप से दो या चार भुजाओं के साथ तीर्थंकर नेमीनाथ के साथ उरेहा गया।
अंबिका का संबंध तंत्र से भी है। 'भैरव पद्मावती कल्प' नामक ग्रंथ में वे तांत्रिक वांडमय' में उनके कई नाम दिए
गए हैं, जिनमें शांकरी, मंत्ररुपा योगेश्वरी, यक्षेश्वरी आदि प्रमुख हैं।
अंबिका के उत्कीर्णन भिन्न-भिन्न स्वरुपों तथा ग्र भिन्न-भिन्न कालखंडों में
हुए हैं। आरंभिक शिल्प तो कम उपलब्ध हैं, किंतु पश्चातवर्ती शिल्प बहुतायत से र माता और शिशु
के रुप में मिलते हैं तथा ये शिल्प किसी धर्म विशेष के शिल्प के रुप में नहीं रह
जाते, बल्कि माता के स्वरुप की विशेषताओं का मानो आख्यान करने लगते हैं। अंबिका के आरंभिक शिल्प छठवीं शताब्दी से मिलते हैं तथा सर्वाधिक प्राचीन
शिल्प गुजरात में बड़ौदा के पास आकोट से मिला है। कर्नाटक के एहोल के मेगुती मंदिर
में (ईसवी सन् 634 का) एक शिल्प उत्खनन में मिला है। इसी काल का एक शिल्प राजस्थान से भी मिला है। नवीं
से सोलहवीं शताब्दी के बीच माता व शिशु के शिल्प गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश तथा
मध्य प्रदेश से मिले हैं। सोलहवीं शताब्दी के अंबिका के शिल्प पालीताना के मंदिरों
में बड़े भावप्रवण ढंग से उरेहे गए हैं। नवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच बिहार, बंगाल तथा उड़ीसा
में बहुतायत से माता व शिशु के शिल्प निर्मित किए गए। इसी अवधि में दक्षिण भारत
में ये शिल्प बहुत बने ।अरकोट, बेलगाम, हुबली, सेडम, मूदबिदरी, नेल्लौर तथा गुलबर्ग
जिले के अनेक स्थानों से ऐसे शिल्प मिले हैं।
मध्य प्रदेश में ये शिल्प खजुराहो के अलावा पवाया, नरसिंहपुर, चंदेरी, कारीतलाई, विदिशा, जबलपुर, उज्जैन, सतना, धुबेला, हिंगलाजगढ़, टीकमगढ़, सिंहपुर आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इनमें खजुराहो के उत्कीर्णन सर्वाधिक
प्रसिद्ध हैं। इन शिल्पों का निर्माण 950 ईसवी से बारहवीं सदी के बीच हुआ। खजुराहो में यक्षी, अंबिका, पद्मावती और शालभंजिका के सुंदर अंकन उपलब्ध हैं। अपनी गोद में एक ओर शिशु को
धारित किए, सिंह की सवारी करती
और चेहरे पर वात्सल्य की वर्षा करती खजुराहो की नायिका का यह रुप अद्भुत है।
खजुराहो के जैन मंदिरों में, विशेष रुप से पार्श्वनाथ मंदिर के दक्षिणी हिस्से में चार भुजा स्वरुपा माता
का अद्भुत रुप दिखाई देता है। खजुराहो की मातृ नायिकाओं के हाथों में कमल भी हैं
तथा आम के वृक्ष की डाली भी । इन शिल्पों की लयात्मकता तथा उनके चेहरे पर बिखरता
लावण्ययुक्त स्मित इतना मनोरम है कि उनके सामने से हटने का मन नहीं करता। उनके
अलंकरण उनके अलंकरण भी बड़े मनोहारी हैं। खजुराहो के आदिनाथ मंदिर में चार भुजा
स्वरुपा अंबिका के चार उत्कीर्णन हैं खजुराहो की यह मातृका माता के सच्चे स्वरुप
की प्रतिनिधि है। सतना के पास से मिली मातृका को तेईस यक्षियों के साथ देखा जा
सकता है।
हिंगलाजगढ़ से जो माता और शिशु के शिल्प मिले हैं, वे दसवीं शताब्दी के हैं। इनमें मातृका को त्रिभंगी मुद्रा में दर्शाया गया है। मातृत्व की अवधारणा को केंद्र में रखकर भारत में पूर्व से पश्चिम तक तथा उत्तर से दक्षिण तक बहुतायत में शिल्प उत्कीर्णन हुए। यह अवधारणा यदि शिल्पी की छेनी से गोलपाड़ा असम में अभिव्यक्त हुई, तो गुजरात के कुंभारिया से लेकर दक्षिण के 1, एहोल तक में ये शिल्प बने। ऐसे में प्रत्येक शिल्प के संबंध में विवरण देना अत्यंत वृहद कार्य है। भारत में मुसलमानों के आगमन के पश्चात मातृत्व की अवधारणा के इस अंकन पर प्रायः विराम लग र गया, किंतु पालीताना जैसे स्थानों में ये उत्कीर्णन सोलहवीं सदी में भी पूरी भव्यता के साथ किए गए। आधुनिक युग में भी सुदूर केरल के कन्नूर में मशहूर शिल्पी कन्हाई कूंचीरमन के द्वारा निर्मित एक भव्य माता और शिशु का शिल्प मौजूद है। दिनांक गी 28 फरवरी, 1978 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय प के प्रांगण में 210 सेमी. ऊँचा काले कांसे का माता के और शिशु का सांकेतिक शिल्प स्थापित किया गया, । इसमें स्त्री के रुप में भारत माता को दर्शाया गया है, पर जो भारतीय गणतंत्र के शिशु को अपनी गोद में लिये हुए हैं, जिसके हाथ में कानून की खुली पुस्तक दर्शाई मातृत्व की यह अवधारणा अमर है। जब तक सृष्टि है, तब तक सृजन है, और इस सृजन की । स्रोतस्विनी माता है, जो समृद्धि और उर्वरता की प्रतीक है। वात्सल्य रस को यदि काव्य में प्रतिष्ठित करने वाले शब्द शिल्पी सूर हैं तो इस रस को छेनियों के माध्यम से पाषाणों में शिल्पित करने वाले ऐसे अनेकों अनाम शिल्पी हैं, जिनके कृतित्व के दर्शन कर आज भी हम स्वयं को कृतार्थ कर लेते हैं।

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