­­लय की ललित कविता है नृत्य – विनय उपाध्याय

 

­­लय की ललित कविता है नृत्य

विनय उपाध्याय



चित्र- विश्वरंग से 

आज विश्व नृत्य दिवस है। कामना यही कि जीवन की आनंदित लय-ताल पर उमंग भरी थिरकनों का उत्सव जाग उठे। विश्व नृत्य दिवस की परिकल्पना में धन्यता का यही भाव है। सुख, सौहार्द और उत्कर्ष की परस्परता में जीवन की सुन्दर छवियों का उद्घाटन ही नृत्य है। वह मन की उमंगों की भाषा है। लय की कोई ललित कविता। देह, मन और हृदय की समग्रता में विराट के प्रति सबसे सच्ची प्रार्थना। जिज्ञासा, प्रयोग, नवाचार और मनोरंजन के बदलते आग्रहों के चलते नृत्य की दुनिया ने भी अपना कलात्मक दामन बहुत पसार लिया। भारत में नृत्य की अनगिनत शैलियां हैं। जनजातीय और लोक समुदायों से लेकर शास्त्र सम्मत नृत्यों की परंपरा का परचम थामने वाली बिरादरी तक रूप-रंग भरती इतनी छटाएं हैं कि बस, निहाल ही हुआ जा सकता है। दिलचस्प यह कि भारतीय नृत्य की संरचना का आधार जीवन के प्रति गहरी आस्था, विश्वास और समर्पण है। यहाँ हर नृत्य किसी अनुष्ठान का अनुकरण है। वह लोकाचार की लालित्यमयी अभिव्यक्ति है। वह 'नटराज' और 'नटवर' जैसे नृत्य देवताओं की पवित्र स्मृतियों में अपने वजूद की मनोरम कल्पनाओं की उड़ान भरता है। प्यार की पैड़ी पर परमात्मा की प्रार्थना बनकर वह थिरकता रहा है।

मृत्युंजय के लिए सारे नृत्य काश आज ऐसी ही महान प्रार्थना बन जाएं।


चित्र - गूगल से साभार 


 

‘पत्रिका’ अख़बार के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित स्तम्भ ‘शब्दों का दरवेश’ से साभार  

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