काशी के कंठ साधक की याद : विनय उपाध्याय

  

काशी के कंठ साधक की याद

विनय उपाध्याय 



चित्र- गूगल से साभार 

संगीत के राग-रास में चारों प्रहर डूबा रहने वाला बनारस अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के दरमियान संगीत की जिन विलक्षण विभूतियों का स्वर्णिम अतीत बना, पंडित राजन मिश्र उसी उजाले की एक सुरीली किरण बनकर प्रकाशित हुए। 1951 में संगीत मनीषी पंडित हनुमान मिश्र की संतान होने का सौभाग्य उन्हें मिला जिनकी खानदान में गणेश मिश्र, सुरसहाय मिश्र और दादा रामदास जैसे गुणी और संगीत के पांडित्य से भरे पुरखों की विरासत रही। वैभव की इसी छाँह में बैठकर राजन मिश्र ने संगीत के गुर सीखे। गुरु की तालीम और उस दौर की आबो-हवा का ही कुछ ऐसा असर था कि किशोर अवस्था में ही राजन मिश्र के कंठ में आरोह-अवरोह की गतियाँ कामयाबी की राहों की आहत बन गयीं। 1956 में भाई साजन मिश्र का जन्म हुआ। कठोर अनुशासन के बीच मुसलसल रियाज़ ने इन दोनों भाइयों को ऐसी कलाकार जोड़ी के रूप में गढ़ा जिनके पास स्वर-संगीत की गहरी समझ के साथ ही बनारस की उन मनोरम अनुगूँजों की सौगातें थीं जिनमें साहित्य और संगीत की आपसदारी आध्यात्मिक आनंद का अलौकिक परिवेश रचने की ताकत बनी। जितना रागदारी में गहरे डूबने का आग्रह, उतना ही उस समंदर से मन रंजन के मानक (मोती) चुन लेने का अहोभाव उनकी गायिकी की पहचान बना। भक्ति का तरल-सरल पवित्र भाव उनके गायन में कुछ इस तरह निखरता कि मंच और महफ़िल नाद ब्रह्म के मंदिर में बदल जाते।

चित्र- गूगल से साभार 


पंडित राजन और साजन की जुगलबंदी का नज़ारा देखते ही बनता। धोती-कुरता धारण कर मंच पर उनकी आमद, मुस्कुराती छवि, नेह भीगा अभिवादन, विनय में डूबा स्वर माहौल में पवित्रता का ऐसा संचार  करता रहा, जहाँ स्वर-देवता को भजने के लिए मानो साक्षात गन्धर्व अवतरित हुए हों! दोनों बंधुओं की अपनी कलात्मक निपुणता, समन्वय, स्वर की लय-गतियों में साथ होने और अभिव्यक्तियों की स्वतंत्र उड़ान भरने की आपसी समझ तथा कौशल ने जुगलबंदी का ऐसा मोहक वितान तैयार किया कि यह विशिष्ट शैली ही उनकी पहचान बन गयी। यहाँ बंदिशों की निराली दुनिया में अनंत की यात्रा का सुख और आनंद। राजनजी की गान-मुद्रा के साथ ही श्रोताओं से संवाद करने की फितरत भी अनूठी होती। वे अपने पूर्वजों की बंदिश का परिचय देते। उसका भाव-विस्तार करते हुए उसके अर्थ और आशयों की सहज व्याख्या करते। स्वयं की रचना होती तो विनम्रता पूर्वक गुरु का आशीर्वाद मानकर उसे प्रस्तुत करते। इस तरह भक्ति और सादगी का गान, गहरा अंतर्बोध और लोक तत्वों का सौंधा स्पर्श उनके कला-चरित्र को नयी आभा से मंडित करता रहा। गौर करने की बात यह कि ख़्याल गायन से लेकर पूरब अंग के टप्पा, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और झूला से लेकर तराना तक समान महारथ उन्हें हासिल थी। भारत सरकार के पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादेमी सम्मान, म.प्र. सरकार के राष्ट्रीय कुमार गन्धर्व सम्मान और तानसेन सम्मानों से विभूषित पंडित राजन मिश्र भारत भवन (भोपाल) के न्यासी भी रहे।


चित्र- गूगल से साभार 

एक उद्घोषक के रूप में मुझे (इस लेखक को) पं, राजन-साजन मिश्र को मंच पर आमंत्रित करने और उनसे संवाद करने के अनेक अवसर मिले। उनके व्यक्तित्व की अनेक छापें और उनके सांगीतिक अनुभव तथा ज्ञान से भरी बातें साझा करने का यह सौभाग्य जब भी मिला वह एक अमिट स्मृति की तरह ठहर सा गया।

मुझे याद है ग्वालियर में तानसेन सम्मान से विभूषित होने के अगले ही दिन भोपाल के करुणाधाम आश्रम के करुणश्वरी मंडप में उनके गायन की सभा थी। आश्रम के वर्तमान पीठाधीश्वर गुरुदेव सुदेशचन्द्र शांडिल्य की उपस्थिति में इस शक्ति पीठ पर विराजते हुए राजन मिश्र ने कहा था- 'आज लग रहा है कि जीवन सफल हो गया। साधना की इस सिद्ध भूमि पर हम जैसे भक्तों की ओर से स्वर के पुष्प अर्पित करने का यह पुण्य अवसर है। उस शाम सचमुच स्वर, आत्मा के आसन पर देवता की तरह विराजे थे।


यह शब्दचित्र रंग संवाद के जुलाई 2021 अंक में प्रकाशित है। 
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