तीजन का तिलिस्म अभी बाकी है - विनय उपाध्याय

 तीजन का तिलिस्म अभी बाकी है

विनय उपाध्याय 


चित्र गूगल से साभार 

रंगभूमि पर रणभूमि की हुंकार भरने वाली मशहूर पंडवानी गायिका तीजन बाई एक मुद्दत बाद भोपाल आयीं तो उन्हें व्हील चेअर पर देखना उनके क़द्रदानों के लिए चौंकाने वाला अहसास था। लेकिन उनकी आमद की आहट हर बार की तरह मसर्रत से भरी थी। जनजातीय संग्रहालय के परिसर में दाखिल होते ही तीजनबाई ने कहा- ‘‘यहाँ गाँव की सौंधी महक बसी है। इस संग्रहालय में आकर अपनी जड़ों और मिट्टी की ताक़त का पता चलता है।’’

उम्र के सातवें दशक से गुज़र रही इस बुजुर्ग छत्तीसगढ़ी गायिका ने कहा कि उनका शरीर अब थक रहा है लेकिन पंडवानी का मंच हमेशा टेरता रहता है। मेरे ख़ून में अचानक जोश लौट आता है। बकौल तीजन- ‘‘मेरे जीवन पर एक फ़िल्म बनने जा रही है। मेरा क़िरदार निभाने के लिए विधा बालन तैयार हुई है।"


चित्र- जनजातीय संग्रहालय  भोपाल के सौजन्य से 


बोल वृंदावन बिहारी लाल की जय... इस उद्घोष के साथ छिड़ने लगता है छत्तीसगढ़ी लय-ताल का अल्हड़ संगीत। हाथ में इकतारा लिए पंडवानी गायिका महाभारत की कथा का प्रसंग सुनाने मंच पर मुस्तैदी से प्रकट होती हैं और अपार जन समुदाय अधीर होकर इस विलक्षण कथाकार को निहारने लगता है। संगीत एक सिरे पर जाकर थमता है और शुरू होती है-पाण्डवों की कथा। भाव-भंगिमाओं और संवादों की ऐसी सहज अदायगी कि देखते-देखते धृतराष्ट्र, भीम, अर्जुन, गांधारी, द्रोपदी और महाभारत के नायक कृष्ण का चरित्र सजीव हो उठते हैं। छत्तीसगढ़ की चौक-चौपाल से लेकर देश-दुनिया के सैकड़ों मंचों पर पंडवानी का परचम लहरा चुकी पद्मभूषण तीजनबाई का फ़न अब किसी से अछूता नहीं रहा लेकिन जीवन की आधी सदी से भी ज्यादा का वक्त पार करने के बाद अब लगता है जैसे उनकी ऊर्जा सिमटने लगी है। कहती हैं-‘अब कुछ थकावट महसूस होती है। मैं चाहती हूँ इस देश को एक और तीजनबाई मिल जाए’।

तीजन बाई के साथ विनय उपाध्याय 

तीजनबाई को पंडवानी करते देखना सदा एक ऐतिहासिक अनुभव होता है। उनकी हुंकार भरती वाणी और देह में जब महाभारत के पन्ने खुलते हैं तो यह किसी आश्चर्य लोक से कम नहीं होता। ज़ाहिर है यह कुव्वत तीजनबाई ने लंबे संघर्ष के बाद अर्जित की है। उन्हें संतोष होता है कि गांव की चौहद्दी तक सिमटी पंडवानी समंदर पार के देशों तक अपनी महक बिखेर चुकी है। पापुलरिटी के दौर में उनकी परंपरा का रंग भी फीका नहीं पड़ा बल्कि सिर चढ़कर हल्ला बोलता रहा है। लेकिन अब उन्हें चिंता है अपनी इस विरासत की। उन्हें रितु वर्मा, मीना साहू और शांति बाई  चेलक से काफ़ी उम्मीदें रहीं। वे चाहती हैं, जल्दी ही इस देश को एक और तीजनबाई मिल जाए। वे बताती हैं कि उनकी प्रस्तुति से आकर्षित होकर कई शहरी लड़कियाँ पंडवानी सीखने को लालायित होती हैं लेकिन लोक कलाओं को समझना आसान है पर आचरण और संस्कारों में ढालना सरल नहीं है। तीजनबाई कहती हैं- इसके लिए भाषा, परिवेश और मिट्टी में रचना-बसना पड़ता है।

हालांकि तीजनबाई इस बात से ख़ुश हैं कि आज छत्तीसगढ़ में पंडवानी गाने वालों की तादाद बढ़ रही है। छोटी-बड़ी कई मंडलियाँ हैं। पर सबको जल्दी ही मंच, पैसा और शोहरत चाहिए। आज स्थिति यह है कि दो सौ से भी ज़्यादा कलाकारों को वे पंडवानी का प्रषिक्षण दे रही हैं लेकिन तीजनबाई के अनुसार यह बताना कठिन है कि आगे चलकर ये क्या गुल खिलाते हैं।

तेरह बरस की किशोर उम्र में तीजनबाई ने पहली बार पंडवानी के सुर साधे और दुर्ग जिले के चनखुरी गाँव में पहला कार्यक्रम दिया। बहुत याद आता है वह समय। कहती हैं- पूरा देश घूम लिया। कई बार विदेशों की सैर कर ली। पंडवानी रौशंन हो गई। मेरे लिए इससे बड़ी ख़ुशी हो नहीं सकती।संघर्ष के दिनों को वे भूलती नहीं है- ‘‘जब तक जली रोटी का अहसास नहीं होगा, भोजन में मिठास नहीं आयेगी।’’ अब तो पंडवानी सबकी जु़बान पर है। ईश्वर  से विनती है कि यह स्थिति बनी रहे।

पद्मश्री के बाद पद्मभूषण और डी.लिट. की उपाधियों से विभूषित तीजनबाई इस बीच एक मज़ेदार वाकया सुनाती हैं। जब उन्हें बिलासपुर के विश्व  विद्यालय से फ़ोन आया कि उन्हें डाक्टरेट की उपाधि दी जा रही है तो वे चिंता में पड़ गयीं। कहा-मुझे डॉक्टर नहीं बनना है। मैं लोगों का कैसे इलाज करूंगी। और फ़ोन काट दिया। फिर लोगों ने समझाया कि यह इलाज करने वाली डाक्टरेट नहीं है सिर्फ़ नाम के आगे वाली डाक्टरेट है, तब माजरा समझ आया।



चित्र गूगल से साभार

बहरहाल पंडवानी, तीजन और छत्तीसगढ़ कुछ इस तरह एकमेक हैं कि दुनिया में ऐसी दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल हैं। महाभारत के आख्यान को लोक शैली में इतनी शिद्दत से कहने का कला-कौशल छत्तीसगढ़ की रंगभूमि के पास ही है। ठेठ छत्तीसगढ़ी वेश-भूषा में तंबूरा हाथ में लिए जब मंच पर तीजनबाई अपनी संगीत मंडली के साथ उतरती हैं तो दर्शकों पर सम्मोहन छा जाता है। महाभारत में मौजूद तमाम भाव-रस तीजन के रोम-रोम में जीवंत हो उठता है। कथानक की सहज, कुटिल और वक्रोक्ति से भरे संवादों का प्रवाह मंच से सीधे दर्शक के मानस से टकराता है। यह शब्द का अतिक्रमण कर महाभारत की कथा एक चरित्र अभिनय से एकाकार होकर वैश्विक अनुभव में बदल जाती है। लोक में गहरी पैठ रखने वाले प्रतिज्ञा, वीरता, त्याग, सेवा जैसे मूल्य अगर इंसानी दुनिया का भरोसा हैं तो महाभारत की कलह-कथा के सार में यही तो संदेश है। पंडवानी इस अर्थ में मनोरंजन और विचार का बखूबी ताना-बाना तैयार करती है। विद्या बालन अभिनीत निर्माणाधीन फ़िल्म इस दिशा में क्या गुल खिलाती है, देखना दिलचस्प होगा।   





चित्र- गूगल से साभार 


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