कविता में ही छुपा होता है उसका संगीत : मंगलेश डबराल

 कविता में ही छुपा होता है उसका संगीत 

मंगलेश डबराल से विनय उपाध्याय की बातचीत का एक अंश 



मंगलेश जी, नमस्कार ! आपका बहुत बहुत स्वागत। आज सभी समकालीन कवियों में आपका विशेष महत्व है। आपकी कविता में एक ऐसा आन्तरिक संगीत चलता रहता है, जो आपकी कविता को ज़्यादा मार्मिक और संवेदनशील बनाता है। क्या आपने कभी संगीत का कोई व्यवस्थित प्रशिक्षण लिया है या ऐसा ही कुछ?

आपके इन शब्दों के लिए धन्यवाद। मुझे नहीं मालूम कि मेरी कविताओं का क्या महत्व है। लेकिन जहाँ तक संगीत की बात है, मेरे पिता ख़ुद गाते थे, नाटकों में अभिनय करते थे, नाटकों का निर्देशन करते थे और हारमोनियम बजाते थे। उन्होंने बाक़ायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी और वे सांस्कृतिक गतिविधियों में काफ़ी सक्रिय थे। हालाँकि हमारे गाँव के आसपास एक बहुत छोटा-सा क़स्बा था, पन्द्रह-बीस दुकानों का, जहाँ मेरे पिता का आयुर्वेदिक औषधालय था। बचपन में मैंने संगीत खूब सुना। पिताजी रोज़ ही हारमोनियम पर सुनाते थे। तो यहाँ से मैं सुनता रहा। खुद मैं कुछ सीख नहीं पाया। सिर्फ़ हारमोनियम पर उँगलियाँ चलाना सीख पाया, लेकिन संगीत के वो संस्कार मेरे भीतर रहे। उसके बाद जब मैं शहरों में आया, मैंने संगीत बहुत सुना ख़ासकर पहाड़ी राग-दुर्गा और पहाड़ में जो राग हैं- वहाँ पाँच सुरों के राग ज्यादा होते हैं, जैसे सारंग है, दुर्गा है या दूसरे राग हैं। मेरे पिता अक्सर इन्हें गाया-गुनगुनाया करते थे। इन सबका असर मेरे मन पर बहुत पड़ा और फिर शहर में आकर भी संगीत को लेकर मेरे अन्दर एक छटपटाहट मौजूद रही। फिर बाद में काफ़ी बड़े-बड़े लोगों को सुना।

आपकी कविताओं को पढ़कर यह लगता है, कि आपको अपने लोकेल की गहरी समझ है। संगीत का भी एक गहरा संस्कार आपके यहाँ मौजूद है। उसी दौर में जबकि कविता बहुत ज़्यादा गद्यात्मक होने लगी थी, आपने संगीत आदि की बात करते हुए उसे नमी प्रदान की।

आपके सवाल में मुझे लगता है कि दो सवाल हैं। देखिए, बाहरी विचार की बहस इस अर्थ में बेमानी है कि बाहर से क्या आया, ये कहना बहुत मुश्किल है। प्याज बाहर से आया है, लीची बाहर से आयी है, चाय बाहर से आयी है, लेकिन आज हम यह नहीं कहते कि चाय बाहर से आयी है। ये सारी चीजें मुझे लगता है कि दुनिया का हिस्सा हैं, सभ्यता का हिस्सा हो चुकी हैं। जो चीजें सभ्यता का हिस्सा बन चुकी हैं, उन चीजों को ये नहीं कहा जा सकता कि ये बाहर से आयी हैं।
            सवाल ये है, मान लीजिए, अगर रूस में ये इस तरह माना जाता है कि रूस में तो मार्क्सवाद बाहर से आया है, तो रूस में कभी क्रान्ति नहीं होती और मुझे लगता है कि कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिए मुझे लगता है कि जो विचार जन्म ले चुका है वो पूरी तरह मनुष्यता की धरोहर है। इसलिए बाहरी-भीतरी का कोई सवाल नहीं है। क्योंकि बाहरी- भीतरी वाली जो पॉलिटिक्स है वो बहुत ख़तरनाक है, उसके नतीजे बहुत ख़तरनाक हैं और जिनको हम आजकल देख रहे हैं हमारे अपने-अपने समाज में। संगीत का जहाँ तक सवाल है, मेरे ख्याल से मेरी कविताओं में संगीत के माध्यम से भी एक सामाजिक सच्चाई की पड़ताल की गयी है। जो इम्प्रेशनिस्टिक कविताएँ हैं, संगीत के बारे में, वो शायद एक-दो कविताओं को छोड़कर राग दुर्गा वगैरह हैं वो इम्प्रेशनिस्टिक की उतनी हैं, लेकिन उसके अलावा जो हैं, उसमें किसी न किसी सामाजिक द्वन्द्व की, सामाजिक सच्चाई की पड़ताल करने की कोशिश है और दूसरा यह कि कोई जानबूझकर तो नहीं किया गया। संगीत बचपन में मेरे जीवन में काफ़ी रहा, इसलिए संगीत उसमें आ गया। मान लीजिये, बचपन में संगीत नहीं होता तो शायद संगीत नहीं आता।




क्या संगीत आरोपित सा लगता है आधुनिक कविता में?
मेरा कहना यह है कि वो एक छन्दमुक्त कविता है। उसके लिए कौन-सा संगीत उपयुक्त होगा, मुझे लगता है कि अभी इसको लेकर हल्का-फुल्का काम हुआ है। लेकिन शायद बहुत ज़्यादा काम किया जाना बाकी है। हमारे बड़े कवि रघुवीर सहाय ने काफ़ी काम किया था। उसके बाद नरेश सक्सेना ने थोड़ा-बहुत काम किया। लेकिन कोई बड़ा, गहरा और स्थायी काम हुआ नहीं है।
मेरे मन में आधुनिक कविता के संगीत की जो बात है, वो यही है कि उस कविता के भीतर से ही वो संगीत उपजेगा। मसलन, रघुवीर सहाय की एक कविता है- 'दे दिया जाता हूँ'। बहुत सुन्दर कविता है। बहुत ही सुन्दर है और वो मुझे बहुत प्रिय है। उसके साथ मैं कल्पना करता हूँ कि एक हल्का-सा सरोद बज रहा हो और वो सरोद आपकी ओर नहीं आ रहा हो, बल्कि आपसे दूर जा रहा हो। इस तरह का संगीत अगर हो, तो मुझे लगता है कि वो उस कविता के साथ न्याय होगा। आधुनिक कविता का गायन कम से कम हो और उसका वाचन सबसे अधिक हो संगीत के भीतर। ऐसी कौन-सी प्रविधि हो सकती है जो कविता के वाचन को सुरक्षित रख सके गायन में।



पूरी बातचीत, किताब 'सफ़ह पर आवाज़' में पढ़ें 



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