सुर से आगे निकल जाऊँ - किशोरी आमोणकर

सुर से आगे निकल जाऊँ 

किशोरी आमोणकर  से विनय उपाध्याय की बातचीत 




'राग को गाना है तो उसके पूरे मूड को पकड़िए। उसे अभिव्यक्त करिए। इसके लिए तो कलाकार के आत्म को शुद्ध होना होगा। राग की शुद्धता कलाकार की शुद्धता पर निर्भर है। नहीं तो राग और उसका वातावरण दिखेगा कैसे ! व्याकरण गाने से राग गाना नहीं होता।' 


स्वर के साथ एक अविरल, अंतहीन, अटूट सिलसिला है जो उनकी आत्मा में लयबद्ध होता उन्हें दिव्य अनुभूतियों के शिखर पर ले जाता। वे राग-स्वरों से रिश्ता बनाती संवेदनाओं की अतल गहराईयों में उतरतीं एक अमूर्त यात्रा करती हैं और आनंद के उस परमतत्व की तलाश करतीं जहाँ अहंकार और विकार की मलिनता का प्रक्षालन संगीत के पावन स्वरों से होता है। संगीत उनके लिए ईश्वर, रंगशाला एक मंदिर की तरह, जहाँ वे स्वर की जोत जलाकर विराट को मनुहारतीं। वे स्वर के साथ आध्यात्मिक उड़ान भरती हैं और इच्छा होती है कि "सुर से आगे निकल जाऊँ!"

हमारे कला समय की विलक्षण गायिका और संगीत विदुषी किशोरी आमोणकर की साधना का सच यही है। अस्सी के आसपास फैल गयी आयु ने भले ही किशोरी की देह को कुछ थका दिया हो लेकिन इसी देह के कंठ से झरते राग-स्वर अब भी उस अनंत को टेरते है जहाँ पहुँचकर समाधि को अनुभव किया जा सकता है।

मौसिकी से सतही आनंद का रिश्ता जोड़ने वालों को एक फनकार की यह फ़ितरत और ज़िद अतिरंजित लग सकती है लेकिन आचरण, अभ्यास और अनुशासन की जमीन पर साँस थामने वाले कलाकार की तल्लीनता ऐसे ही दुर्गम शिखरों के रास्ते नापती है। किशोरी आमोणकर की तल्लीनता और समर्पण का यह सामर्थ्य यक़ीनन उनके बुनियादी संस्कार तालीम और तपस्या का ही नतीजा हैं। उनसे मिलना, वाग्देवी की प्रभा से आलोकित होना है। उनके कला स्वाभिमान और ज्ञान ध्यान से सारी दुनिया परिचित है। स्वाभिमान की हदों से आयोजक भली तरह वाक़िफ़ हैं और ज्ञान के उच्च धरातल से संगीत के विद्यार्थी और जिज्ञासु । लेकिन अतिरिक्त मान-पान की उसक और तमाम पूर्वाग्रहों को किनारा कर किशोरी ताई ने जब भारत भवन (भोपाल) की महिमा' श्रृंखला की पहली सभा की शोभा बनने पर हामी भरी तो आयोजकों की बांछें खिल गयीं। एक मुद्दत बाद भोपाल में किशोरीजी की सुरीली दस्तक से रसिक बिरादरी ख़ुश थी।



याद आता है कि भारत भवन में पहला प्रवास 1995 में जयपुर घराने पर केन्द्रित संगीत समारोह के निमित्त हुआ था जबकि 2007 में इस कलाघर के ही आग्रह पर विशेष रूप से सुबह और शाम की सभाओं में गायन के लिए वे प्रस्तुत हुई थीं। एक लंबे अंतराल के बाद 'महिमा' की सभा के लिए वे राजी हुई शुरू के दो प्रवासों में 'ताई' को साधना आयोजक के लिए थोड़ा कठिन था लेकिन अबकी दादर (मुंबई) से उड़ान भरते ही वे बेहद तरत-सरत मिजास थी। तीन दिन रहीं। जब एक शाम का कुछ वक्त बातचीत के लिए मैंने चाहा तो ह राजी हो गयीं। होटल जहाँनुमा में गुफ्तगू का दौर देर तक चला। साथ रहे सुकवि और भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ल संगीत के दार्शनिक पहलुओं से लेकर निजी जीवन के कई पोशीदा घटना-प्रसंगों तक संवाद बहता चला गया। 

मसलन यही कि क्रिकेट उन्हें बिलकुल पसंद नहीं लेकिन वे टेबल टेनिस की चैंपियन रहीं। तेज धावक रहीं। केरम बहुत अच्छा खेलती हैं और कई बार अपनी पोती (तेजस्वी) से बाजी जीत लेती हैं। रसोई में उनका मन खूब रमता है। चपाती सुडौल बने इस बात का खास ख्याल रखती हैं और सब्जी को कलात्मक ढंग से काटना उन्हें अच्छा लगता है। रांगोली बहुत सुन्दर बनाती हैं। बताती हैं कि एक बार उन्होंने 'शीरी-फ़रहाद' की तस्वीर रांगोली पर उकेरी। जब एक फ़ारसी राहगीर ने उसे देखा तो मुग्ध हो गया और उसने अपने गले की माला मुझे भेंट कर दी। बक़ौल किशोरीजी उन्हें मध्यप्रदेश की चन्देरी कॉटन साडियाँ बेहद पसंद हैं। जयपुरी कोटा भी खरीदती हैं। फेरेनहाइट परफ्यूम की महक से उनका गहरा रिश्ता है। लड्डू का जायका लगभग रोज लेती हैं और ख़ुद बनाकर खिलाने में ख़ुश होती है। बागवानी का बेहद शौक़ है। वनस्पतियों से इतना लगाव है कि उनसे रोज़ बातें करती हैं। मुंबई से अन्यत्र प्रवास पर जाने के पहले गमलों-क्यारियों से कहकर विदा लेती हैं। बताती हैं कि एक बार बिना बताए चली गई तो कुछ दिन बाद लौटकर देखा हरीभरी बेल सूख गयी थी। किशोरीजी रोज सुबह-शाम दो घंटे भगवान की पूजा करती हैं। ख़ुद अपने हाथों से माला बनाती हैं और भगवान का संपूर्ण श्रृंगार करती हैं। शोलापुर के राघवेन्द्र स्वामी उनके आध्यात्मिक गुरू हैं जिन्होंने उन्हें एक रात स्वप्न में दर्शन दिये। गुरू की कृपा को वे सर्वोपरी मानती हैं। पिता का निधन तब हो गया जब वे महज छः साल की थी। माँ की छत्र-छाया और उनके कठोर अनुशासन में किशोरी की परवरिश हुई। 



माँ श्रीमती मोंगूबाई कुर्डीकर ने अपने गुरु उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ से अपने समय में जो सीखा-संजोया, वक्त आने पर अपनी किशोरी बेटी पर उस पूंजी को न्योछावर कर दिया। माँ ने कठिन अनुशासन, धीरज और शुद्धता के साथ सुर को बरतने और आत्मसात करने के जो गुरु-मंत्र दिये, किशोरीजी ने पूरी निष्ठा से उन्हें अपनाया हिन्दुस्तानी संगीत के प्रतिष्ठित जयपुर घराने की शैली से शुरूआती नाता जोड़ा, अपनी मौलिक संकल्पनाओं का मुरीला विन्यास तैयार किया और अपनी गायिकी की सर्वथा निजी शैली का आविष्कार किया। किशोरीजी ने संगीत चिंतन की भी अपनी एक धारा प्रवाहित की है। उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्तियों और निष्कर्षो को संगीत जगत ने प्रामाणिक तथा उपयोगी माना है।

इन तमाम उपलब्धियों के लिए किशोरीजी को अनेक महत्वपूर्ण सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है जिनमें पद्मविभूषण सहित संगीत नाटक अकादेमी पुस्कार, श्रीमंत भारती तीर्थ महास्वामी द्वारा प्रदत्त गान सरस्वती, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का कला शिरोमणि सम्मान, पंडित भीमसेन जोशी स्मृति सम्मान और महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रदत्त महाराष्ट्र गौरव सम्मान खास हैं। मध्यप्रदेश के संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय है कि उन्हें इस राज्य के संस्कृति विभाग द्वारा स्थापित राष्ट्रीय तानसेन सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। भारत के लगभग सभी स्थापित समारोहों के अलावा किशोरीजी पेरिस, अमेरिका, ब्रिटेन, बेल्जियम, स्विटजरलैण्ड और दुबई सहित दुनिया के अनेक मुल्कों की महफिलों में अपनी अद्वितीय गायिकी से श्रोताओं को मुग्ध कर चुकी हैं। उनके गायन की दर्जनों ऑडियो कैसेट्स- सीडीज और वीडियो रेकार्डिंग जारी की गई हैं। कुछ फ़िल्मों में भी उन्होंने पार्श्व गायन किया है लेकिन सिनेमा के लिए गाना उन्हें ज्यादा रास नहीं आया।

ये सच है कि किशोरी आमोणकर ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को हमारे समय में मान- महिमा से मंडित किया है। जयपुर-अतरौली संगीत घराने की परंपरा को अपनी प्रयोगशील गायिकी में महफूज रखा। विरासत में मिली बंदिशों को अनेक महफ़िलों में गाया और अपनी स्वर-रचनाओं से संगीत के अद्भुत संज्ञान का उदाहरण प्रस्तुत किया।


किशोरीजी स्वर में आकंठ डूबी एक जीवित किंवदंति है। स्वर के जरिये अपनी आत्मा के रहस्य को बूझने का जतन करती हैं। उनके अनुसार मेरे लिए स्वर ब्रह्म है। मैं इसके साथ मूर्त से अमूर्त की यात्रा पर निकल पड़ती हूँ। जब तक देह है, तब तक सुर हमारा है लेकिन • हमारी मृत्यु के बाद भी वह इस संसार में कायम रहता है। मेरा साफ़ मानना है कि किसी भी विषय से आत्मा की अनुभूति होना ही अध्यात्म है। मैं पूरे समय संगीत के विश्व में विचरण करती हूँ। मैं सुर से परे जाना चाहती हूँ। सन्नाटा मेरे जीवन में है ही नहीं क्योंकि सन्नाटे का भी सुर है और सुर हमेशा मेरे पास है।

प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए किशोरीजी ने अपने गहरे अनुभव से अर्जित सच का उजास बिखेरा मेरे लिए संगीत एक सिक्के की तरह है जिसके दो पहलू हैं। एक हैं संगीत का कलात्मक पक्ष और दूसरा है संगीत के माध्यम से सत्य की खोज और उसका प्रसार। कहा जाता है कि कला में सच का निवास है जिसका यह अर्थ निकलता है कि कला और सत्य दो भिन्न वस्तुएँ हैं या साफ शब्दों में, वे वाक़ई एक-दूसरे से भिन्न हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि रूप के बिना कला का अस्तित्व संभव नहीं है और रूप चाहे वह किसी भी तरह का हो सीमा रेखाओं द्वारा निर्धारित होता है। रूप एक ऐसी चीज है जो फौरन दिखाई दे जाती है लेकिन वह किन चीजों से बना है यह मालूम करने में वक्त लगता है। रूप की अन्तर्वस्तु का अध्ययन नितान्त आवश्यक है क्योंकि बिना अन्तर्वस्तु के रूप का अस्तित्व ही संभव नहीं है और अन्तर्वस्तु की गहराई से छानबीन करके ही हम यह जान सकते हैं कि इसके अस्तित्व के कौन से कारण हैं और इसकी आवश्यकता क्या है। अपने विविध मनोभावों, अधिकांशतः अपने सुख और दुःख की असंख्य दशाओं को अभिव्यक्त करने की हमारी आवश्यकता ही इसका कारण है।

संगीत में हमारा गुरु हमें इस कला के अनुशासन की विधिवत शिक्षा देता है, वह हमें सिखाता है कि हम कैसे अपने गायन या वादन को एक सौन्दर्यात्मक रूप दे सकें। उसके मार्गदर्शन और अपनी साधना से हम कला के इस माध्यम पर अधिकार प्राप्त करते हैं।

किशोरीजी बताती हैं कि मेरी भी शिक्षा यहीं से शुरू हुई थी और मैं तब से श्रृंगार, करुण, वीर तथा अन्य रसों को अधिक स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त करने के तरीकों की खोज करती रही हूँ। लगभग सारा जीवन संगीत सीखने और सुनने के बाद मैंने एक नयी राह खोजना शुरू किया। यह ठीक है कि बुद्धि का अन्य क्षेत्रों की तरह संगीत में भी स्थान है। लेकिन संगीत के क्षेत्र में बुद्धि का कार्य विभिन्न मनोदशाओं की संगीतात्मक अभिव्यक्ति का अध्ययन करना ही है। अपनी इस यात्रा के दौरान मुझे रसों के और संगीत में उनकी अभिव्यक्ति के बारे में एक अधिक साफ़ दृष्टि प्राप्त हुई। 


धीरे-धीरे मैंने यह महसूस किया कि अलग-अलग शब्दों के अर्थ का किसी संगीत रचना की रूह का एहसास नहीं करा सकता। दरअसल ये दो चीजें एकदम अलग- अलग है। शायद सुगम संगीत में शब्दों के द्वारा एक संगीत रचना की आत्मा सम्प्रेषित की जा सकती है लेकिन शास्त्रीय संगीत में यह सम्प्रेषण केवल स्वरों के द्वारा ही संभव है। इसका कारण यह है कि शब्दों के अर्थ निश्चित हैं जबकि हरेक स्वर का अपना एक विशिष्ट चरित्र होता है सामान्यतः हम सरगम में से वह एक स्वर चुनते हैं जो हमारे मनोभावों के अनुरूप होता है यह स्वर-विशेष संगीत रचना की रूह का जीव-स्वर होता है। इस स्वर के तत्व को स्पष्ट करने के लिए हमें सरगम से कुछ अन्य स्वर भी चुनने पड़ते हैं जो इस जीव-स्वर को पोषित करते हैं और इसे स्वयं को पूरी तरह व्यक्त करने योग्य बनाते हैं। इस तरह हम रसों की असंख्य बारीकियों और उनकी संगीतात्मक अभिव्यक्तियों को खोज सकते हैं। इससे संगीतकार के मन में संगीत के माध्यम से अपने व्यक्तिगत संवेगों को अभिव्यक्त करने की लालसा उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

ये संवेग अधिक प्रामाणिक और गहरे होते हैं क्योंकि ये संगीतकार के निजी सुख-दुःख से उत्पन्न होते हैं और क्योंकि संगीतकार इनमें ज्यादा गहराई से निमग्न होता है, ये सत्य के अधिक निकट होते हैं। इस तरह लीन हो जाना कला के क्षेत्र में अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। किन्तु यह तभी संभव हो सकता है जब संगीत के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाने वाला संवेग संगीतकार को अच्छी तरह से मालूम हो। उदाहरण के लिए राग बागेश्वरी के स्वरों और इसकी लयरचना के अध्ययन से एक करुण मनोदशा का पता चलता है। गुरु इस राग की विभिन्न रचनाओं के अस्थायी व अन्तरा के माध्यम से हमें इस मनोदशा को अभिव्यक्त करने में प्रशिक्षित करता है। इन रचनाओं के शब्द हमें इस मनोदशा के मर्म से तत्काल तादात्म्य स्थापित करने में सहायक होते हैं। साथ ही साथ संगीतकार की भावनात्मक अनुभूति, बिना उसके जाने ही, राग की प्रस्तुति पर, जो उसने अपने गुरु से सीखी है, अपना रंग चढ़ाकर उसे सूक्ष्मरूप से बदल देती है।

मेरा तजुर्बा है कि राग एक वैयक्तिक व्यग्रता का स्वर धारण कर लेता है जो श्रोता के मर्म को छू लेता है। हालाँकि श्रोता संगीतकार की निजी अनुभूति से अवगत नहीं होता किन्तु संगीत रचना की प्रस्तुति श्रोता को अपने भोगे हुए दुःख का स्मरण कराती है। यह श्रोता के । हृदय में स्वानुभूति से उत्पन्न करुण रस प्रवाहित कर देती है। इस जगह पर राग का रूप अपनी सहजता के कारण लगभग अदृश्य हो जाता है। कठिन साधना से राग का विन्यास अत्यन्त सुगम हो जाता है। यह विन्यास परम्परा से उत्पन्न होता है। लेकिन जो पारम्परिक है वह अनिवार्य रूप से शास्त्रीय नहीं है। जो पारम्परिक है वह तकनीकी दृष्टि से बिल्कुल सही हो सकता है। लेकिन इससे सिर्फ माध्यम के आयाम ही स्पष्ट हो सकते हैं, न कि वह सत्य जो इनमें निहित है।


राग को गाना है तो उसके पूरे मूड को पकड़िए। उसे अभिव्यक्त करिए। इसके लिए तो कलाकार के आत्म को शुद्ध होना होगा तभी राग अपनी शुद्धता में अपने वातावरण को व्यक्त कर पायेंगी? कलाकार अच्छा होगा तभी राग की प्रस्तुति अच्छी होगी। कला अच्छी होगी। व्याकरण गाने से राग गाना नहीं होता। राग की शुद्धता कलाकार की शुद्धता पर निर्भर है। नहीं तो उसे राग और उसका वातावरण दिखेगा कैसे!

देखिए, आदमी एक परिवार में जन्म लेता है, परिवेश के अनुसार बड़ा होता है और फिर उस अनुकूल या प्रतिकूल परिवेश में उसका निजी व्यक्तित्व विकसित होता है। घरानों और उनमें विकसित कलाकारों के विकास की कहानी भी इसी तरह की है। एक कलाकार एक व्यक्तित्व है उसके अन्तस में जो है वह उस घराने के परिवेश में बाहर आता है।

मेरे अपने संगीत चिंतन और मनन की अलग प्रक्रिया है। बहुत दिनों तक सोचती रहती हूँ। कोई स्वर कई दिनों तक मेरे साथ रहता है और मैं उससे बतियाती रहती हूँ। उसकी सोहबत में उसे बहुत गहरे में जानने की मेरी चेष्टा होती है। मैंने ऐसे ही तजुरबों का संग्रह किया है। किताब छपकर आयी है उसकी। उसका नाम है- 'स्वरार्थ रमणी'। यह मराठी में है। मैं इसका हिन्दी अनुवाद भी चाहती हूँ। इस काम को वो ही कर सकता है जो संगीत के साथ-साथ हिन्दी और मराठी को भी जानता हो। मराठी भी इस पुस्तक में थोड़ी क्लिष्ट है यानी संस्कृतनिष्ठ है। इस किताब में मेरे पचास सालों के गायन अनुभवों की कथा है और स्वर चिंतन भी। इस सूचना के साथ किशोरीजी जोड़ती हैं कि दुर्भाग्य से संगीत की गहरी समझ रखने वाले सह्दय समीक्षकों की बहुत कमी है जो सही परिप्रेक्ष्य में गायन-वादन और उसके आसपास उभर रहे चिंतन को ठीक ढंग से रेखांकित कर सके। पर इसके लिए कौन तैयार है?

अपने गान व्यक्तित्व से जुड़े कई अनछुए प्रसंगों को याद करते हुए किशोरीजी उस स्मृति चित्र को रखती है, जिसमें उनके गुरु की एक निराली छवि उभर कर आती है। उन्होंने बताया कि वीणा की संगत में उन्होंने कभी नहीं गाया। लेकिन वीणा के प्रति उनके मन में गहरा मान रहा। वे वीणा को संगीत की धरोहर मानती रहीं। इस तारतम्य में वे गुरु स्वामी राघवेन्द्रजी का जिक्र करती हैं जो वीणा वादन करते थे। उन्हें इस तरह देखना-सुनना अलौकिक अनुभव होता था।










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*किताब 'सफ़ह पर आवाज़' में प्रकाशित वार्ता-आलेख 






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